भारत की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के आसपास के इलाके में आज का यह काला दिन देश के न्यायिक इतिहास के सबसे हिंसक और शर्मनाक अध्यायों में दर्ज हो गया है। चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे इस राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन के समर्थन में जब देश के युवा और वरिष्ठ अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट परिसर से शांतिपूर्ण मार्च निकालते हुए जंतर-मंतर की ओर बढ़ रहे थे, तब अचानक दिल्ली पुलिस और वकीलों के बीच खूनी भिड़ंत हो गई। पुलिस ने कानून की रक्षा करने की शपथ लेने वाले इन वकीलों पर बिना किसी रहम के बेरहमी से लाठियां भांजीं और कई महिला वकीलों को हिरासत में ले लिया।
इस अमानवीय और क्रूर पुलिस कार्रवाई के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने आपातकालीन बैठक बुलाई और इस घटना की तीव्र शब्दों में भर्त्सना करते हुए सीधे देश के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में तत्काल संज्ञान लेने की गुहार लगाई है। वकीलों का गुस्सा इस बात पर सातवें आसमान पर पहुंच गया कि जो लोग संविधान और न्याय की रक्षा के लिए सड़क पर उतरे थे, उन पर खाकी वर्दीधारियों ने अपराधियों जैसा सलूक किया। इस हिंसक झड़प के दौरान कई पुलिसकर्मियों और वकीलों के सिर फट गए और वे गंभीर रूप से घायल हो गए।
घटनास्थल पर मौजूद चश्मदीदों के अनुसार, वकीलों का यह मार्च पूरी तरह अनुशासित और शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहा था, लेकिन पुलिस ने बिना किसी पूर्व चेतावनी के उन पर अचानक लाठीचार्ज कर दिया। बैरिकेड्स तोड़ने की कोशिश करते ही पुलिस ने पानी की बौछारें छोड़ दीं और अधिवक्ताओं को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, जिससे सड़क पर भगदड़ मच गई। वकीलों के गाउन पहने लोग सड़कों पर गिर पड़े और चारों तरफ चीख-पुकार मच गई, जिसने देश की न्यायिक राजधानी की साख को गहरा धक्का पहुंचाया है।
मानवीय संवेदनाओं को पूरी तरह झकझोर देने वाली यह घटना इस बात का जीता-जाता प्रमाण है कि जब व्यवस्था अपने ही देश के नागरिकों, बुद्धिजीवियों और न्याय के रखवालों पर लाठियां बरसाने पर उतर आए, तो फिर आम इंसान न्याय की आस किससे लगाएगा? जरा सोचिए उन महिला वकीलों पर क्या बीती होगी, जिन्हें सड़क पर इस तरह घसीटा गया और जबरन हिरासत की गाड़ियों में डाला गया। यह सिर्फ वकीलों की गिरफ्तारी का मामूली मामला नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबसे भयानक संकेत है कि सत्ता के खिलाफ उठने वाली हर निष्पक्ष आवाज को कुचलने के लिए किस हद तक जाया जा सकता है।
इस हिंसक झड़प के बाद देश भर के वकीलों और बार काउंसिलों में भारी रोष व्याप्त हो गया है, और कई राज्यों की अदालतों में वकीलों ने काम का बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया है। उनका कहना है कि जिस देश में वकीलों और न्यायविदों को ही सड़कों पर इस प्रकार पीटा जाने लगे, वहां कानून के राज की बात करना केवल एक छलावा मात्र रह जाता है। इस घटना ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच चल रहे तनाव को एक बार फिर से सतह पर ला दिया है, जिसके गंभीर परिणाम आने वाले समय में देखने को मिलेंगे।
देश के नागरिकों के मन में अब यह गंभीर सवाल उठ रहा है कि क्या आम आदमी की कानूनी सुरक्षा और न्याय का अधिकार भी अब सुरक्षित रह गया है। जब न्याय के पहरेदार ही इस तरह सत्ता की लाठियों का शिकार होने लगेंगे, तो लोकतंत्र की नींव अपने आप हिल जाएगी। यह काला दिन भारतीय इतिहास में एक ऐसे मील के पत्थर के रूप में दर्ज हो गया है जो हमेशा याद दिलाता रहेगा कि तानाशाही और दमन के आगे किस तरह न्याय की आवाज को दबाने की कोशिश की गई थी।
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