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यूरोपीय संघ में बजट घमासान

यूरोपीय महाद्वीप के राजनीतिक और आर्थिक केंद्र ब्रसेल्स से आज एक ऐसी सनसनीखेज खबर सामने आई है जिसने यूरोपीय संघ (EU) की कथित एकता की नींव को अंदर से हिला कर रख दिया है। यूरोपीय आयोग द्वारा पेश किए गए नए और बेहद कड़े वित्तीय वर्ष के बजट तथा रक्षा खर्च बढ़ाने से जुड़े प्रस्तावों पर जर्मनी, फ्रांस और पूर्वी यूरोपीय देशों के बीच खुली और तीखी तनातनी शुरू हो गई है

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
10 Oct 2026
Solar farm during sunset

यूरोपीय महाद्वीप के राजनीतिक और आर्थिक केंद्र ब्रसेल्स से आज एक ऐसी सनसनीखेज खबर सामने आई है जिसने यूरोपीय संघ (EU) की कथित एकता की नींव को अंदर से हिला कर रख दिया है। यूरोपीय आयोग द्वारा पेश किए गए नए और बेहद कड़े वित्तीय वर्ष के बजट तथा रक्षा खर्च बढ़ाने से जुड़े प्रस्तावों पर जर्मनी, फ्रांस और पूर्वी यूरोपीय देशों के बीच खुली और तीखी तनातनी शुरू हो गई है। हंगरी और स्लोवाकिया ने यूरोपीय संघ के इन प्रस्तावों को सिरे से खारिज करते हुए इस पर वीटो करने की खुली धमकी दी है, जिससे ब्रसेल्स के गलियारों में अभूतपूर्व वित्तीय संकट खड़ा हो गया है।  

यूरोपीय संघ का यह नया बजट प्रस्ताव मुख्य रूप से यूक्रेन को अनिश्चितकाल तक दी जाने वाली अरबों डॉलर की सैन्य सहायता, यूरोपीय महाद्वीप के भीतर रक्षा उत्पादन को रातों-रात बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारी फंड जुटाने पर केंद्रित है। लेकिन जर्मनी और नीदरलैंड जैसे अमीर देश अपने घरेलू करदाताओं के खून-पसीने की कमाई से अन्य देशों के कर्ज चुकाने और अंधाधुंध रक्षा बजट बढ़ाने का कड़ा विरोध कर रहे हैं। इसके विपरीत, पूर्वी यूरोपीय देश रूस के बढ़ते खतरे को देखते हुए तत्काल और बड़ा रक्षा बजट आवंटित करने की मांग पर अड़े हैं।  

मानवीय और सामाजिक नजरिए से देखा जाए तो इस आर्थिक घमासान का सीधा और क्रूर असर यूरोप के आम नागरिकों पर पड़ रहा है। एक तरफ जहां महंगाई आसमान छू रही है और आम जनता का जीवन यापन मुश्किल होता जा रहा है, वहीं सरकारें अपनी तिजोरी का सारा पैसा युद्ध के हथियारों और विदेशी लड़ाइयों में झोंक रही हैं। यूरोपीय सड़कों पर आम आदमी महंगाई और टैक्स के बोझ के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहा है, जबकि राजनेता ब्रसेल्स के बंद कमरों में बैठकर अपनी महात्वाकांक्षाओं के खेल खेल रहे हैं।  

भारतीय अर्थव्यवस्था और कूटनीति के नजरिए से यूरोपीय संघ का यह आंतरिक संघर्ष बहुत गहरे मायने रखता है। यूरोप भारत का एक बहुत बड़ा और पुराना व्यापारिक साझीदार है, और भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वार्ताओं पर इन अंदरूनी राजनीतिक और आर्थिक खींचतान का बुरा असर पड़ रहा है। यदि यूरोपीय देश अपनी आंतरिक मंदी और बजट संकट से इसी तरह जूझते रहेंगे, तो भारतीय निर्यातकों के लिए यूरोपीय बाजारों में अपनी पकड़ मजबूत रखना और अधिक कठिन हो जाएगा।

यह विवाद इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि पश्चिमी देश अब अनिश्चितकाल तक युद्ध और बाहरी आर्थिक संकटों का भारी बोझ उठाने की स्थिति में नहीं हैं। यूरोपीय जनता के बीच बढ़ता असंतोष अब वहां की सरकारों की विदेश नीतियों को बदलने के लिए मजबूर कर रहा है। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए यह एक बड़ा सबक है कि वह पश्चिमी बाजारों पर अपनी निर्भरता को सीमित करते हुए ग्लोबल साउथ और एशियाई देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को तेजी से विविधतापूर्ण बनाए।

आने वाले समय में यूरोपीय संघ का यह वित्तीय संकट केवल आंकड़ों की लड़ाई नहीं रहेगा, बल्कि यह इस बात का फैसला करेगा कि क्या यूरोपीय संघ का यह विशाल राजनीतिक प्रयोग अपने ही अंतर्विरोधों के बोझ तले बिखर जाएगा। जब महाद्वीप के सबसे अमीर देश ही आपस में आर्थिक मदद को लेकर लड़ने लगेंगे, तो वैश्विक स्तर पर उनकी साख और ताकत का कमजोर होना तय है। दुनिया इस बात को बहुत गौर से देख रही है कि ब्रसेल्स की यह अंतर्कलह यूरोप को किस नए राजनीतिक संकट में धकेलती है।

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