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ट्रंप का ईरान पर यू-टर्न

फारस की खाड़ी और सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य के पास युद्ध के मुहाने पर खड़े अमेरिका और ईरान के बीच आज अचानक एक नाटकीय मोड़ आया है। वाशिंगटन से एक ऐसी सनसनीखेज घोषणा सामने आई है जिसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों और कूटनीतिज्ञों को अवाक कर दिया है

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
10 Oct 2026
Solar farm during sunset

फारस की खाड़ी और सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य के पास युद्ध के मुहाने पर खड़े अमेरिका और ईरान के बीच आज अचानक एक नाटकीय मोड़ आया है। वाशिंगटन से एक ऐसी सनसनीखेज घोषणा सामने आई है जिसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों और कूटनीतिज्ञों को अवाक कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मीडिया के सामने आकर स्पष्ट शब्दों में ऐलान किया है कि आगामी अमेरिकी मिडटर्म चुनावों तक अमेरिका ईरान या उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के खिलाफ किसी भी नए सीधे सैन्य हमले की पहल नहीं करेगा।

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, पिछले 48 घंटों में गुप्त बैकचैनल माध्यमों और मध्यस्थ देशों के जरिए तेहरान और वाशिंगटन के बीच अति-गोपनीय संदेशों का गहन आदान-प्रदान हुआ है। अमेरिकी घरेलू राजनीति में इस बात का गहरा डर बैठ गया था कि यदि मध्य पूर्व में कोई लंबा और विनाशकारी युद्ध छिड़ गया, तो अमेरिका में ईंधन के दाम आसमान छू जाएंगे और अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ जाएगी। इस राजनीतिक मजबूरी के चलते ट्रंप प्रशासन को अपने आक्रामक तेवर फिलहाल ठंडे करने पड़े हैं, हालांकि फारस की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना का विशाल बेड़ा अभी भी अपनी पूरी ताकत के साथ मुस्तैद खड़ा है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो यह खबर नई दिल्ली और खाड़ी क्षेत्र में रहने वाले भारतीयों के लिए किसी बड़ी राहत से कम नहीं है। यदि होर्मुज की खाड़ी में युद्ध की आग भड़क उठती, तो भारत की 80 फीसदी से अधिक ऊर्जा आपूर्ति पूरी तरह ठप हो जाती और खाड़ी देशों में कार्यरत करीब 85 लाख भारतीयों का जीवन भीषण संकट में पड़ जाता। भारत ने हमेशा से ही पश्चिम एशिया में सैन्य टकराव के बजाय शांतिपूर्ण संवाद और कूटनीतिक वार्ताओं का पुरजोर समर्थन किया है, जिससे इस नवीनतम विराम के बाद भारत-पश्चिम एशिया-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEEC) की बहाली की उम्मीदों को भी एक बार फिर नया जीवन मिला है।

इस घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट होता है कि महाशक्तियां भी घरेलू राजनीतिक चक्रव्यूह और आर्थिक वास्तविकताओं के आगे विवश हो जाती हैं। ईरान और अमेरिका के बीच इस अस्थायी संघर्ष-विराम ने तात्कालिक तौर पर एक बड़े क्षेत्रीय महायुद्ध टालने में मदद की है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव की सुई अभी भी किसी भी समय घूम सकती है। भारत के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह इस नाजुक दौर में अपनी ऊर्जा कूटनीति को संतुलित रखे और पश्चिम एशिया के सभी प्रमुख देशों के साथ अपने प्रगाढ़ संबंधों को बनाए रखते हुए अपनी आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा को पूरी तरह सुरक्षित रखे।

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