भारत और कनाडा के रिश्तों में जमी दशकों पुरानी बर्फ अब अचानक पिघलती हुई नजर आ रही है। महीनों के राजनयिक तनाव, तीखे बयानों और निष्कासनों के बाद, दोनों देश अब शांतिपूर्वक टेबल पर लौट आए हैं। ओटावा और नई दिल्ली के बीच उच्च स्तरीय वार्ता के नए दौर की शुरुआत हो चुकी है, जिसके तहत दोनों देश बृहद आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) को अंतिम रूप देने की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं।
कनाडा का एक हाई-प्रोफाइल ट्रेड मिशन भारत के प्रमुख औद्योगिक शहरों—मुंबई और बेंगलुरु में डेरा डाले हुए है। इस मिशन का मुख्य मकसद एयरोस्पेस, क्लीन टेक्नोलॉजी, लाइफ साइंसेज और आईटी सेक्टर में भारत के साथ अरबों डॉलर के समझौतों को अंजाम देना है। पर्दे के पीछे चल रही इस कूटनीति ने ओटावा के कट्टरपंथी हलकों में तहलका मचा दिया है।
राजनीतिक विश्लेषक इस मोड़ को कनाडा की मजबूरी और भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत का परिणाम मान रहे हैं। कनाडा में घरेलू आर्थिक मंदी और महंगाई के दबाव ने वहां की सरकार को यह अहसास करा दिया है कि एशिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था भारत को नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित हो सकता है।
भारत के परिपेक्ष्य में यह वार्ता बेहद महत्वपूर्ण है। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा चिंताओं से बिना कोई समझौता किए कनाडा को व्यापारिक और कूटनीतिक मोर्चे पर बैकफुट पर ला खड़ा किया है। इस समझौते से भारतीय आईटी कंपनियों, स्टार्ट-अप्स और छात्रों के लिए कनाडा में नए दरवाजे खुलेंगे।
इसके साथ ही, भारत-कनाडा के बीच रिश्तों की यह री-बूटिंग चीन को भी कड़ा संदेश देती है। इंडो-पैसिफिक रीजन में भारत की केंद्रीय भूमिका को अब पश्चिमी देश दरकिनार नहीं कर सकते।
हालांकि, भारतीय खुफिया और कूटनीतिक एजेंसियां ओटावा के रुख पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। जब तक कनाडा अपनी धरती से भारत विरोधी गतिविधियों पर पूरी तरह लगाम नहीं लगाता, तब तक नई दिल्ली पूरी तरह से ढील देने के मूड में नहीं है। व्यापार अपनी जगह है, लेकिन देश की संप्रभुता और सुरक्षा सबसे ऊपर है।
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