मध्य पूर्व के आसमान में देर रात लड़ाकू विमानों की गर्जना और मिसाइलों के भयानक धमाकों ने पूरे क्षेत्र को एक पूर्ण सैन्य युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। वर्षों से पर्दे के पीछे से लड़ा जा रहा छद्म युद्ध (Proxy War) अब पूरी तरह से प्रत्यक्ष और भीषण सैन्य टकराव में बदल चुका है। दो प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियों ने एक-दूसरे के रणनीतिक सैन्य ठिकानों, हवाई अड्डों और कमान केंद्रों पर सीधे बैलिस्टिक मिसाइलों और सुसाइड ड्रोनों से ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए हैं, जिससे पूरे मध्य पूर्व की पुरानी सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई है।
इस आकस्मिक और प्रत्यक्ष सैन्य टकराव ने पूरे खाड़ी क्षेत्र में भारी तबाही और दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। सीरिया, लेबनान, इराक और लाल सागर के गलियारों से होते हुए यह जंग अब सीधे मुख्य भूभाग तक पहुँच गई है। पश्चिमी शक्तियाँ अपने-अपने सहयोगियों के बचाव में अत्याधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम और फाइटर जेट्स भेज रही हैं, लेकिन हमलों की तीव्रता इतनी अधिक है कि कोई भी इलाका खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा है। वाशिंगटन और यूरोपीय संघ ने दोनों देशों से तुरंत युद्धविराम की अपील की है, लेकिन दोनों पक्षों के तेवर देखकर लगता है कि यह जंग अब अंतिम अंजाम तक पहुंचे बिना रुकने वाली नहीं है।
इस भयंकर सैन्य संघर्ष का सबसे खौफनाक असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जहाँ से दुनिया के कुल कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है, पर मिसाइल हमलों की सीधी आशंका से अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। कच्चे तेल के दाम अचानक 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गए हैं। यदि यह समुद्री रास्ता युद्ध के कारण पूरी तरह बंद होता है, तो पूरी दुनिया को एक अभूतपूर्व ऊर्जा संकट और आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ेगा।
भारत के लिए यह खबर सीधे तौर पर उसकी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और आंतरिक बजट के लिए एक बड़ा प्रहार है। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी मध्य पूर्व के देशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी सी भी वृद्धि भारत में पेट्रोल-डीजल के दामों को बढ़ा सकती है, जिससे देश के भीतर माल ढुलाई महंगी होगी और आम नागरिक को भारी महंगाई का सामना करना पड़ेगा। इसके साथ ही, भारत का आयात बिल बढ़ने से रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो सकता है।
इसके अलावा, खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा भारत सरकार के लिए सबसे बड़ी और तात्कालिक चिंता बन गई है। इन प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा (Remittance) भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा सहारा है। युद्ध की स्थिति में इन लाखों नागरिकों की जान-माल की रक्षा करना, उनका सुरक्षित पुनर्वास सुनिश्चित करना और उनके परिवारों की मदद करना नई दिल्ली के लिए एक बहुत बड़ा कूटनीतिक और लॉजिस्टिक मिशन बन जाता है।
कूटनीति के मोर्चे पर, भारत की भूमिका यहाँ बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। भारत के संबंध इस संघर्ष में आमने-सामने खड़े दोनों कट्टर दुश्मन देशों के साथ बेहद गहरे, रणनीतिक और दोस्ताना हैं। नई दिल्ली ने हमेशा 'संयम' और 'कूटनीतिक वार्ता' का रास्ता अपनाने का आह्वान किया है। भारत इस गंभीर संकट में एक विश्वसनीय शांतिदूत बनकर उभरा है, और दोनों पक्षों को सीधे संवाद की मेज पर लाने के लिए पर्दे के पीछे से अपनी कूटनीतिक क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल कर रहा है, जिससे दुनिया भर की नजरें भारत की भावी भूमिका पर टिकी हैं।
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