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अफ्रीका का सैन्य तख्तापलट: क्या साहेल रीज़न से उखड़ जाएंगे पश्चिमी झंडे?

पश्चिम और मध्य अफ्रीका के 'साहेल क्षेत्र' (Sahel Region) में नाइजर, माली और बुर्किना फासो के बाद एक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश में हुए अचानक सैन्य तख्तापलट (Military Coup) ने यूरोपीय संघ और अमेरिका की नींद उड़ा दी है।

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
29 Sep 2026
Solar farm during sunset

पश्चिम और मध्य अफ्रीका के 'साहेल क्षेत्र' (Sahel Region) में नाइजर, माली और बुर्किना फासो के बाद एक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश में हुए अचानक सैन्य तख्तापलट (Military Coup) ने यूरोपीय संघ और अमेरिका की नींद उड़ा दी है। तख्तापलट करने वाले विद्रोही सैन्य जनरलों ने सत्ता पर कब्जा करते ही अपने देश में मौजूद पश्चिमी देशों के सभी सैन्य अड्डों को तुरंत बंद करने और विदेशी सैनिकों को 48 घंटे के भीतर देश छोड़ने का कड़ा अल्टीमेटम जारी कर दिया है। राजधानी की सड़कों पर उमड़ी हजारों की भीड़ ने विदेशी झंडों को जलाकर नए सैन्य शासन का जोरदार समर्थन किया है।

​यह तख्तापलट केवल एक देश की सत्ता का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह पूरे अफ्रीकी महाद्वीप से पश्चिमी औपनिवेशिक प्रभाव के अंत की ओर एक बड़ा और ऐतिहासिक संकेत है। साहेल क्षेत्र दशकों से फ्रांस और अमेरिका का एक प्रमुख सैन्य गढ़ रहा है, जहाँ से वे जिहादी आतंकवाद और अवैध प्रवासन पर नकेल कसते रहे थे। लेकिन अब तख्तापलट करने वाले देशों ने एक नया सुरक्षा गठबंधन (Alliance of Sahel States) बना लिया है, जिसने पश्चिमी ताकतों के साथ अपने सभी सुरक्षा और आर्थिक समझौतों को पूरी तरह रद्द करने का ऐलान कर दिया है।

​इस भू-राजनीतिक खालीपन (Geopolitical Vacuum) का सीधा और त्वरित फायदा रूस के सैन्य समूह 'वैगनर/अफ्रीका कोर' और चीन के आर्थिक बुनियादी ढाँचे ने उठाया है। रूसी सैन्य सलाहकार और हथियार अब साहेल क्षेत्र में नई सेनाओं की सुरक्षा की कमान संभाल रहे हैं, जबकि चीन वहाँ की यूरेनियम, सोने और दुर्लभ खनिजों की खदानों पर अपने वित्तीय नियंत्रण का विस्तार कर रहा है। पश्चिमी देशों के लिए अफ्रीका के इस सोने और यूरेनियम समृद्ध क्षेत्र से बेदखल होना उनके आर्थिक और रक्षा हितों पर एक बहुत बड़ा आघात है।

​भारतीय परिप्रेक्ष्य में, अफ्रीकी महाद्वीप का यह नया राजनीतिक परिदृश्य भारत की 'इंडो-अफ़्रीका पार्टनरशिप' और 'ग्लोबल साउथ' (Global South) की कूटनीति के लिए एक बहुत बड़ा रणनीतिक परीक्षण है। अफ्रीका भारत का एक बेहद पुराना, विश्वस्त और महत्वपूर्ण साझेदार रहा है, जहाँ भारत ने अवसंरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल क्रांति (जैसे UPI और टेली-मेडिसिन) में अरबों डॉलर का निवेश किया है। पश्चिम विरोधी और सैन्य सरकारों का बढ़ता प्रभुत्व भारतीय निवेश और वहाँ रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के लिए एक नई चुनौती पेश करता है।

​हालाँकि, पश्चिमी देशों के विपरीत, भारत की अफ्रीका नीति कभी भी 'सैन्य हस्तक्षेप' या 'औपनिवेशिक दोहन' पर आधारित नहीं रही है। भारत ने हमेशा अफ्रीका को एक बराबर का दर्जा दिया है, जैसा कि भारत की अध्यक्षता में 'अफ्रीकी संघ' (African Union) को G20 में स्थायी सदस्यता दिलाकर साबित किया गया था। यही कारण है कि अफ्रीकी महाद्वीप के नए सैन्य शासक भी भारत को एक मित्रवत, निष्पक्ष और गैर-आक्रामक विकास साझेदार के रूप में देखते हैं और भारतीय कंपनियों के साथ अपने व्यापारिक संबंध जारी रखना चाहते हैं।

​कूटनीतिक स्तर पर, भारत इस क्षेत्र में शांति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की बहाली की वकालत कर रहा है, लेकिन साथ ही अफ्रीका के आंतरिक मामलों में विदेशी सैन्य हस्तक्षेप का विरोध भी करता है। भारत अपनी रणनीतिक गहराई का उपयोग करते हुए साहेल देशों को खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और कौशल विकास में मदद दे रहा है। भारत का यह सकारात्मक और संवेदनशील दृष्टिकोण यह साबित करता है कि वह अफ्रीका के इस नए दौर में पश्चिमी देशों की गलतियों से इतर अपनी एक मजबूत और स्वतंत्र जगह बना रहा है।

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