हॉर्न ऑफ अफ्रीका (Horn of Africa) के मुहाने पर बसे छोटे लेकिन सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण देश 'जिबूती' के तटीय इलाकों में एक नए और अभूतपूर्व सैन्य जमावड़े ने लाल सागर और हिंद महासागर के रणनीतिकारों के रडार पर रेड अलर्ट जारी कर दिया है। जिबूती दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहाँ अमेरिका, चीन, फ्रांस और जापान जैसे कट्टर विरोधी देशों के नौसैनिक सैन्य अड्डे महज कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर आमने-सामने स्थित हैं। अब चीन द्वारा अपने यहाँ मौजूद पहले विदेशी नौसैनिक अड्डे (Doraleh Multipurpose Port) का अचानक विस्तार करने और विशाल एयरक्राफ्ट कैरियर तथा परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती के बाद वाशिंगटन में हड़कंप मच गया है।
चीन का यह नया सैन्य विस्तार बाब-अल-मंदेब (Bab-el-Mandeb) जलडमरूमध्य पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने का एक प्रत्यक्ष प्रयास माना जा रहा है। यह समुद्री संकरा रास्ता लाल सागर को सीधे अरब सागर से जोड़ता है, जहाँ से पूरी दुनिया का तेल और व्यापारिक जहाजों का बेड़ा गुजरता है। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने आरोप लगाया है कि चीनी नौसेना जिबूती से गुजरने वाले पश्चिमी जहाजों की जासूसी कर रही है और उनके संचार प्रणालियों को जाम करने के लिए उच्च-क्षमता वाले लेजर और ई-वारफेयर उपकरणों का इस्तेमाल कर रही है।
जिबूती में बढ़ते इस बहुराष्ट्रीय सैन्य जमावड़े ने क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री सुरक्षा के लिए एक बेहद खतरनाक बारूदी स्थिति पैदा कर दी है। एक छोटे से क्षेत्र में इतनी सारी वैश्विक महाशक्तियों की नौसेनाओं, लड़ाकू विमानों और मिसाइल प्रणालियों की मौजूदगी का मतलब है कि एक छोटी सी नौसैनिक झड़प या तकनीकी चूक भी सीधे एक बड़े वैश्विक सैन्य संघर्ष का रूप ले सकती है। जिबूती सरकार भारी कर्ज और किराए के एवज में इन महाशक्तियों को अपनी जमीन का इस्तेमाल करने दे रही है, जिससे यह पूरा इलाका एक नए 'शीत युद्ध' का मुख्य केंद्र बन चुका है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में, जिबूती में चीन का यह आक्रामक नौसैनिक विस्तार भारत की उत्तरी हिंद महासागर सुरक्षा और 'सागर' (SAGAR - Security and Growth for All in the Region) नीति के लिए एक बहुत बड़ी सीधी सामरिक चुनौती है। भारत की पश्चिमी समुद्री सीमा और अरब सागर में होने वाले तेल आयात का मार्ग इसी जिबूती तट के पास से गुजरता है। बीजिंग द्वारा इस क्षेत्र में अपनी सैन्य जमावट को मजबूत करना भारत को घेरने की उसकी पुरानी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) रणनीति का ही एक हिस्सा है।
इस चीनी चुनौती का माकूल जवाब देने के लिए भारत ने भी अपनी नौसैनिक उपस्थिति को कई गुना बढ़ा दिया है। भारतीय नौसेना ने जिबूती के पास 'ऑपरेशन संकल्प' और समुद्री डाकू-रोधी (Anti-Piracy) अभियानों के तहत अपने फ्रिगेट्स और टोही विमान P-8I की तैनाती बढ़ा दी है। इसके अलावा, भारत ने जिबूती के पड़ोसी देश मॉरीशस (अगालेगा द्वीप) और सेशेल्स में अपने नौसैनिक बुनियादी ढांचे को बेहद मजबूत किया है, जिससे भारतीय नौसेना पूरे पश्चिमी हिंद महासागर पर चौबीसों घंटे निगरानी रखने में सक्षम हो गई है।
कूटनीतिक रूप से, भारत ने जिबूती, फ्रांस और अमेरिका के साथ त्रिपक्षीय और बहुपक्षीय सुरक्षा ढाँचों को मजबूत किया है, जिससे भारतीय नौसेना को मित्र देशों के अड्डों से रसद आपूर्ति और ईंधन भरने (Logistics Support Agreements) की सुविधा मिल रही है। भारत का यह दूरदर्शी कदम यह सुनिश्चित करता है कि चीन चाहे जितने भी सैन्य अड्डे बना ले, हिंद महासागर में भारत का प्रभुत्व और उसकी त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता हमेशा सर्वोच्च और अक्षुण्ण बनी रहेगी।
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