दक्षिण चीन सागर के विवादित थॉमस शोअल और स्प्रैटली द्वीप समूह के जलक्षेत्र में फिलीपींस और चीनी तट रक्षक जहाजों के बीच हुई हिंसक सीधी टक्कर ने पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में युद्ध का सायरन बजा दिया है। चीनी नौसैनिक जहाजों द्वारा फिलीपींस की रसद आपूर्ति नौकाओं पर वाटर कैनन की भारी बौछार, सैन्य-ग्रेड लेजर का प्रयोग और जहाजों को जानबूझकर टक्कर मारने की घटना ने स्थिति को बेकाबू बना दिया है। मनीला ने अपने दूतावास से चीनी राजदूत को तलब कर सख्त चेतावनी दी है, जबकि चीन ने पलटवार करते हुए इसे अपनी समुद्री सीमाओं का उल्लंघन करार दिया है।
इस घटनाक्रम ने वॉशिंगटन को सीधे तौर पर इस युद्ध की विभीषिका में घसीट लिया है। अमेरिका और फिलीपींस के बीच दशक पुरानी 'पारस्परिक रक्षा संधि' (MDED) लागू है, जिसके तहत फिलीपीन सेना या जहाजों पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में अमेरिका को सैन्य हस्तक्षेप करना अनिवार्य हो जाता है। पेंटागन ने इंडो-पैसिफिक कमांड को हाई अलर्ट पर रखते हुए दक्षिण चीन सागर की ओर अपने दो स्ट्राइक एयरक्राफ्ट कैरियर बेड़ों को रवाना कर दिया है। इस कदम ने बीजिंग और वाशिंगटन को सीधे सैन्य टकराव के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
दक्षिण चीन सागर का यह जलमार्ग अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक जीवनरेखा की तरह है, जहाँ से हर साल 3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का समुद्री व्यापार गुजरता है। इस क्षेत्र में चीन के एकतरफा और आक्रामक दावों ने वियतनाम, मलेशिया, ताइवान और इंडोनेशिया जैसे पड़ोसी आसियान (ASEAN) देशों में भी भारी दहशत पैदा कर दी है। यदि इस समुद्री रास्ते पर सैन्य संघर्ष छिड़ता है, तो वैश्विक आपूर्ति शृंखला पूरी तरह से ठप्प हो जाएगी, जिससे दुनिया भर में इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और कच्चे माल की भीषण किल्लत हो जाएगी।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में, यह घटनाक्रम नई दिल्ली के लिए अत्यंत संवेदनशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। भारत का लगभग 55 प्रतिशत से अधिक व्यापार मलक्का जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर से होकर ही गुजरता है। भारत ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में 'नौवहन की स्वतंत्रता' (Freedom of Navigation) और '1982 संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि' (UNCLOS) के पूर्ण पालन का समर्थन किया है। चीन की यह मनमानी भारत के पूर्वोत्तर व्यापारिक हितों और 'एक्ट ईस्ट नीति' (Act East Policy) के लिए एक सीधा भू-राजनीतिक खतरा है।
सामरिक मोर्चे पर, भारत ने फिलीपींस के साथ अपने रक्षा संबंधों को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। भारत द्वारा फिलीपींस को अपनी सबसे शक्तिशाली 'ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल' (Brahmos Missile) प्रणाली की सफल आपूर्ति के बाद, फिलीपीन तटरक्षक बल अब चीन के आक्रामक जहाजों को करारा जवाब देने में सक्षम हुआ है। भारत का यह साहसिक कदम यह दर्शाता है कि नई दिल्ली अब बीजिंग को उसी की भाषा में जवाब देने से पीछे नहीं हटने वाली है, भले ही वह चीन का पिछवाड़ा माना जाने वाला दक्षिण चीन सागर ही क्यों न हो।
कूटनीतिक स्तर पर, भारत ने 'क्वाड' (QUAD) साझेदारों—अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और नियम-आधारित व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। भारतीय नौसेना के युद्धपोत इस क्षेत्र में मित्र देशों के साथ लगातार संयुक्त युद्धाभ्यास कर रहे हैं। भारत का यह अडिग और निर्भीक रुख यह साबित करता है कि वह दक्षिण चीन सागर में चीन के एकाधिकार को चुनौती देने वाले देशों के साथ एक मजबूत ढाल बनकर खड़ा है।
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