संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में उस समय हड़कंप मच गया जब रूस ने परमाणु हथियारों पर नियंत्रण रखने वाली अंतिम ऐतिहासिक संधि 'न्यू स्टार्ट' (New START Treaty) और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के साथ जारी डेटा शेयरिंग प्रोटोकॉल को अनिश्चित काल के लिए पूरी तरह निलंबित करने की आधिकारिक घोषणा कर दी। पश्चिमी देशों द्वारा यूक्रेन को लगातार दिए जा रहे घातक दूरगामी मिसाइल हथियारों और रूसी क्षेत्र में बढ़ते हमलों का कड़ा जवाब देते हुए मॉस्को ने साफ कर दिया है कि जब तक पश्चिमी देश उसकी सुरक्षा चिंताओं को स्वीकार नहीं करते, तब तक परमाणु हथियारों की किसी भी सीमा या निरीक्षण को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
मॉस्को का यह साहसिक और आक्रामक कदम दरअसल दशकों पुरानी वैश्विक परमाणु सुरक्षा प्रणाली के ढहने का आधिकारिक ऐलान है। रूस द्वारा अपने नए परमाणु मिसाइल साइलो (Silos) के विस्तार और रणनीतिक बलों को 'हाई कॉम्बैट रेडीनेस' पर रखने के आदेश ने पूरे यूरोप और उत्तरी अमेरिका में भारी दहशत फैला दी है। पेंटागन और नाटो (NATO) मुख्यालय में आपातकालीन बैठकें बुलाई गई हैं, क्योंकि इस संधि के खत्म होने का सीधा मतलब है कि अब अमेरिका और रूस के बीच अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBMs) और परमाणु वॉरहेड्स की संख्या पर कोई वैधानिक प्रतिबंध नहीं रह गया है।
इस घटनाक्रम ने दुनिया को 20वीं सदी के उस भयानक 'परमाणु शीत युद्ध' (Nuclear Cold War) के दौर में वापस धकेल दिया है जहाँ एक भी गलतफहमी पूरी मानवता का विनाश कर सकती है। पश्चिमी रक्षा विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि रूस की देखा-देखी अब अन्य परमाणु संपन्न देश भी अपने परमाणु भंडारों के आधुनिकीकरण और नए वॉरहेड्स के निर्माण की अंधी दौड़ में कूद पड़ेंगे। परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के विचार को इस फैसले से इतना गहरा झटका लगा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामरिक संतुलन पूरी तरह डगमगा गया है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में, रूस और पश्चिम के बीच बढ़ा यह 'परमाणु तनाव' भारत की अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक अत्यंत नाजुक चुनौती पेश करता है। भारत, जिसके दो पड़ोसी देश (चीन और पाकिस्तान) पहले से ही तेजी से अपने परमाणु हथियारों के बेड़े को बढ़ा रहे हैं, के लिए वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण संधियों का टूटना एक चिंताजनक मोड़ है। महाशक्तियों के बीच इस बेकाबू परमाणु होड़ से दक्षिण एशिया में भी शक्ति संतुलन बिगाड़ने और रणनीतिक अनिश्चितता पैदा होने का सीधा खतरा बढ़ जाता है।
हालाँकि, भारत की अपनी 'नो फर्स्ट यूज़' (No First Use) की जिम्मेदार परमाणु नीति और स्वदेशी 'न्यूक्लियर ट्रायड' (land, air, and sea-based nuclear launch capability) की क्षमता भारत को किसी भी बाहरी दबाव या परमाणु ब्लैकमेलिंग से सुरक्षित रखती है। भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए अपनी मिसाइल रक्षा प्रणालियों और अग्नि-5 जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षणों के जरिए अपनी निवारक क्षमता (Deterrence) को लगातार मजबूत कर रहा है।
कूटनीतिक मोर्चे पर, भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से दुनिया के सभी परमाणु संपन्न देशों से 'संयम' बरतने और परमाणु जोखिमों को कम करने के लिए तत्काल बातचीत की मेज पर लौटने का पुरजोर आह्वान किया है। भारत का यह रुख यह रेखांकित करता है कि वह किसी भी नए परमाणु युद्ध के पक्ष में नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदार और न्यायसंगत वैश्विक सुरक्षा संरचना के निर्माण का समर्थन करता है जहाँ शक्ति के जोर पर नहीं, बल्कि नियम-आधारित व्यवस्था से शांति स्थापित हो।
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