ईस्ट एशिया की राजनीति में एक बार फिर बारूद की गंध तैरने लगी है। बीजिंग ने अचानक ताइवान जलडमरूमध्य और द्वीप के पूर्वी तटीय इलाकों में अब तक का सबसे बड़ा संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है। लाइव-फायर ड्रिल, एयर-स्पेस ब्लॉकैड और नौसैनिक घेराबंदी के इस प्रदर्शन ने वाशिंगटन से लेकर टोक्यो तक खतरे की घंटी बजा दी है। बीजिंग का यह आक्रामक रुख पश्चिमी देशों द्वारा ताइवान को दी जा रही नई सुरक्षा तकनीकों के जवाब के रूप में देखा जा रहा है।
इस युद्धाभ्यास में चीन की वायुसेना और नौसेना के दर्जनों उन्नत फाइटर जेट्स और एयरक्राफ्ट कैरियर शामिल हैं, जिन्होंने ताइवान के हवाई रक्षा पहचान क्षेत्र (ADIZ) को लगातार पार किया है। ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने अपने बलों को उच्च अलर्ट पर रख दिया है, जबकि अमेरिका की इंडो-पैसिफिक कमांड ने इस क्षेत्र में अपने हमलावर बेड़ों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। क्षेत्र में सैन्य टकराव का जोखिम पिछले कुछ वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।
भारत के लिए ताइवान जलडमरूमध्य का यह तनाव कई स्तरों पर गंभीर प्रभाव डालता है। भारत का लगभग 55 प्रतिशत से अधिक समुद्री व्यापार मलक्का जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर के रास्तों से होकर गुजरता है। इस इलाके में किसी भी प्रकार की नौसैनिक नाकाबंदी या सैन्य संघर्ष का सीधा अर्थ है—भारत के पूर्वोत्तर एशियाई देशों (जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान) के साथ होने वाले अरबों डॉलर के व्यापार पर अचानक ब्रेक लग जाना।
इसके अलावा, दुनिया भर की सेमीकंडक्टर और माइक्रोचिप निर्माण की धुरी ताइवान है। भारत वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और स्मार्टफोन निर्माण का बड़ा केंद्र बन रहा है, जो काफी हद तक ताइवानी चिप्स पर निर्भर है। यदि ताइवान जलडमरूमध्य में संघर्ष छिड़ता है, तो भारत के ऑटोमोबाइल और टेक उद्योग को रातों-रात कलपुर्जों की भयंकर कमी का सामना करना पड़ सकता है, जिससे घरेलू बाजार में महंगाई का बड़ा विस्फोट हो सकता है।
सामरिक दृष्टि से, चीन का पूर्वी तट पर उलझना भारत के लिए एक कूटनीतिक गुंजाइश भी पैदा करता है। जब भी चीन अपनी पूर्वी सीमाओं या ताइवान पर दबाव बढ़ाता है, उसकी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर ध्यान देने की क्षमता बंट जाती है। हालांकि, भारत को सतर्क रहना होगा क्योंकि चीन की यह आक्रामक नीति बहु-आयामी है और वह भारत-प्रशांत क्षेत्र में क्वाड (QUAD) देशों की एकजुटता को परखने की कोशिश कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को फिर से पुनर्गठित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। भारत के पास 'चिप डिज़ाइन' और सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन में तेजी लाने का यह एक बड़ा अवसर भी है, लेकिन अल्पकालिक रूप से देखें तो ताइवान के आसपास बढ़ता यह सैन्य तनाव भारतीय बाजारों और वैश्विक स्थिरता के लिए एक बेहद नाजुक घड़ी प्रस्तुत कर रहा है।
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