अमेरिकी वाशिंगटन में नीतिगत फेरबदल और आने वाले चुनाव की गहमागहमी के बीच वैश्विक व्यापार में एक बड़ा उबाल देखने को मिल रहा है। अमेरिका ने अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था और उद्योगों की सुरक्षा के नाम पर चीन, यूरोप और विकासशील देशों से आने वाले सामानों पर भारी कस्टम ड्यूटी (Tariffs) लगाने की रणनीति की घोषणा की है। अमेरिका के इस कठोर 'संरक्षणवादी' (Protectionist) रुख से वैश्विक शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई है और एक नए वैश्विक ट्रेड वार (Trade War) की आशंका काफी गहरी हो गई है।
अमेरिकी नीतियों के जवाब में, दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के संगठन 'ब्रिक्स' (BRICS) ने डॉलर के वर्चस्व को खत्म करने के लिए अपने प्रयासों को दोगुना कर दिया है। ब्रिक्स देशों ने एक नई साझा भुगतान प्रणाली 'BRICS Pay' को तेजी से लागू करने का फैसला किया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार अमेरिकी डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में किया जा सके। रूस और चीन इस 'डी-डॉलराइजेशन' (Dedollarization) अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं, जिससे अमेरिकी मुद्रा की वैश्विक दादागिरी पर सीधा प्रहार हो रहा है।
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (IMF और विश्व बैंक) ने चेतावनी दी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का दो धड़ों में बंटना - एक तरफ डॉलर आधारित पश्चिमी गुट और दूसरी तरफ ब्रिक्स आधारित गैर-पश्चिमी गुट - दुनिया के लिए भारी आर्थिक मंदी ला सकता है। डॉलर की तरलता में कमी और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बढ़ते कर्ज के बोझ ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को आशंकित कर दिया है। यूरोपीय यूनियन और अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी देश भी वाशिंगटन की इस नई व्यापार नीति से बेहद असहज और चिंतित महसूस कर रहे हैं।
भारतीय परिपेक्ष्य में, ब्रिक्स का यह नया आर्थिक मोड़ और अमेरिकी ट्रेड वार एक दोहरी चुनौती और बड़ा अवसर दोनों लेकर आया है। भारत के लिए अमेरिकी बाजार बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए अगर अमेरिका भारतीय सामानों पर भारी शुल्क लगाता है, तो भारतीय आईटी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को नुकसान हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ, 'डी-डॉलराइजेशन' और स्थानीय मुद्रा में व्यापार की पहल से भारत को अपना रुपया (INR) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इसका उपयोग बढ़ाने का एक बड़ा मौका मिल रहा है।
भारत ने चतुराई से अपनी विदेश नीति को इस तरह से आकार दिया है कि वह ब्रिक्स का एक संस्थापक और मजबूत सदस्य होने के साथ-साथ अमेरिका के साथ भी मजबूत आर्थिक और तकनीकी संबंध बनाए रखे। भारत ने साफ किया है कि वह डॉलर को अचानक पूरी तरह खारिज करने के पक्ष में नहीं है, बल्कि अपनी मुद्रा 'रुपये' का वैश्वीकरण करना चाहता है। रूस और यूएई के साथ रुपये में व्यापार की शुरुआत करके भारत ने अपनी आर्थिक दूरदर्शिता का प्रमाण पहले ही दे दिया है, जिससे वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान भी भारत सुरक्षित रहे।
निष्कर्ष यह है कि वैश्विक आर्थिक शक्ति का केंद्र अब पश्चिम से पूर्व की ओर खिसक रहा है। अमेरिका की आक्रामक व्यापार नीतियां और ब्रिक्स का पलटवार दुनिया के वित्तीय नक्शे को फिर से लिख रहे हैं। भारत को इस बदलते आर्थिक परिदृश्य में बेहद संतुलन और सतर्कता के साथ अपनी नीतियां बनानी होंगी, ताकि वह वैश्विक ट्रेड वार के असर से बचते हुए दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के अपने लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल कर सके।
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