ताइवान जलडमरूमध्य में चीन की नौसेना के अचानक बड़े युद्धाभ्यास से दक्षिण चीन सागर में भारी तनाव व्याप्त हो गया है। चीनी सेना 'पीपुल्स लिबरेशन आर्मी' (PLA) ने इस इलाके को तीन तरफ से घेरकर मिसाइल परीक्षण शुरू कर दिया है। इस दौरान चीन की एक अत्याधुनिक परमाणु संचालित हमलावर पनडुब्बी (SSN) के ताइवान के करीब संदिग्ध परिस्थितियों में जलमग्न होने और उससे संपर्क टूटने की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खबरें आ रही हैं। अमेरिकी पैसिफिक फ्लीट ने अपनी युद्धपोत टुकड़ियों को तुरंत सतर्क कर दिया है, जिससे इस क्षेत्र में सीधे सैन्य टकराव की आशंका काफी बढ़ गई है।
ताइवान की राष्ट्रपति ने देश की सेना को हाई-अलर्ट पर रखते हुए स्पष्ट किया है कि संप्रभुता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। दूसरी ओर, चीन के रक्षा मंत्रालय ने इस युद्धाभ्यास को अपनी नियमित सैन्य ड्रिल करार दिया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि ताइवान पर मनोवैज्ञानिक और कूटनीतिक दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति है। अमेरिका ने अपने नौसैनिक बेड़े 'USS रोनाल्ड रीगन' को फिलीपींस सागर की ओर रवाना कर दिया है, जिससे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बारूद की गंध साफ महसूस की जा रही है।
इस तनाव का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक जहाजों के आवागमन पर पड़ने लगा है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक ताइवान जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंका से क्रूड ऑयल और वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित होने के कगार पर है। ताइवान में दुनिया की सबसे बड़ी सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनी TSMC स्थित है; ऐसे में यदि इस क्षेत्र में कोई बड़ा संघर्ष होता है, तो वैश्विक टेक उद्योग और ऑटोमोबाइल सेक्टर पूरी तरह ठप हो सकता है, जिसके झटके दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को लगेंगे।
भारतीय परिपेक्ष्य में, यह घटनाक्रम नई दिल्ली के लिए बेहद संवेदनशील और रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत का लगभग 55 प्रतिशत समुद्री व्यापार इंडो-पैसिफिक और दक्षिण चीन सागर के रास्तों से होकर गुजरता है। यदि इस क्षेत्र में चीन की दादागिरी और सैन्य उपस्थिति इसी तरह बढ़ती रही, तो भारत की समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक हितों को सीधा खतरा उत्पन्न होगा। भारतीय नौसेना ने भी हिंद महासागर में अपनी गश्त और निगरानी बढ़ा दी है, ताकि किसी भी अप्रत्याशित परिस्थिति का तुरंत मुकाबला किया जा सके।
कूटनीतिक स्तर पर, भारत हमेशा से 'ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता' का समर्थक रहा है। भारत के विदेश मंत्रालय ने सभी पक्षों से संयम बरतने और अंतरराष्ट्रीय कानूनों, विशेष रूप से UNCLOS का पालन करने की अपील की है। चीन यदि ताइवान में उलझता है, तो वह भारत की वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। इसलिए, भारत के सैन्य रणनीतिकार इस पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर बनाए हुए हैं और ताइवान संकट को भारत की सुरक्षा प्राथमिकताओं से जोड़कर देख रहे हैं।
कुल मिलाकर, ताइवान जलडमरूमध्य का यह नया संकट वैश्विक व्यवस्था को एक बेहद खतरनाक मोड़ पर ले आया है। अमेरिका, चीन और उनके सहयोगियों के बीच बढ़ता यह तनाव किसी भी क्षण एक बड़े युद्ध का रूप ले सकता है। भारत को इस स्थिति में अपनी आर्थिक सुरक्षा और रक्षा तैयारियों का संतुलन बनाते हुए रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी होगी। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि यह गतिरोध कूटनीतिक बातचीत से शांत होता है या फिर दुनिया एक और बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्ष के मुहाने पर खड़ी नजर आएगी।
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