कड़ाके की ठंड की दस्तक के साथ ही क्रेमलिन ने यूरोप के खिलाफ अपना सबसे अचूक कूटनीतिक और आर्थिक हथियार निकाल लिया है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूरोपीय संघ के देशों को दी जाने वाली बची-कुची प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को 'तकनीकी खराबी' का हवाला देकर पूरी तरह से निलंबित करने का संकेत दिया है। इस घोषणा के सामने आते ही यूरोपीय शेयर बाजारों में हाहाकार मच गया और गैस के वायदा दामों में 40 प्रतिशत तक की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है।
यूरोपीय देशों की संसद में आपातकालीन बैठकें बुलाई जा रही हैं, क्योंकि जर्मनी, फ्रांस और इटली जैसे औद्योगिक दिग्गजों के पास सर्दियों के मौसम के लिए पर्याप्त ऊर्जा भंडार मौजूद नहीं है। रूस ने साफ कर दिया है कि जब तक उस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध हटाए नहीं जाते, तब तक गैस की एक बूंद भी पश्चिम की ओर नहीं बहेगी। पश्चिमी मीडिया इसे रूस का 'एनर्जी ब्लैकमेल' बता रहा है, जबकि मास्को का कहना है कि यह पश्चिमी देशों की अपनी गलत नीतियों का नतीजा है।
इस गैस संकट ने यूरोपीय उद्योगों को तालाबंदी के कगार पर पहुंचा दिया है। उर्वरक, स्टील और केमिकल जैसे बड़े उद्योग अपनी उत्पादन क्षमता में कटौती करने को मजबूर हैं। आम जनता के बीच बिजली के बिलों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी को लेकर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं। यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी में मंदी का खतरा गहरा गया है, जिससे पूरे यूरोपीय संघ के बिखरने की आशंका जताई जाने लगी है।
भारत के लिए रूस के इस कदम के कई मायने हैं और यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक रणनीतिक अवसर भी बन सकता है। पश्चिमी देशों द्वारा रूसी तेल और गैस का बहिष्कार किए जाने के बाद से भारत रियायती दरों पर रूसी क्रूड ऑयल खरीदकर अपने विदेशी मुद्रा भंडार की बचत कर रहा है। यदि यूरोप में गैस संकट बढ़ता है, तो रूस भारत जैसे विश्वस्त साझेदारों को और अधिक ऊर्जा संसाधन उपलब्ध कराने के लिए बाध्य होगा।
दूसरी तरफ, यूरोप में औद्योगिक मंदी आने से भारत के निर्यात (जैसे टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स और आईटी सेवाएं) पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। हालांकि, भारत के रिफाइनिंग उद्योग ने इस संकट के बीच यूरोपीय बाजारों को प्रसंस्कृत ईंधन बेचकर भारी मुनाफा कमाया है। भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह अपनी राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा, चाहे पश्चिमी देशों का कितना भी राजनीतिक दबाव क्यों न हो।
रूस का यह दांव यह साबित करता है कि आधुनिक युद्ध केवल टैंकों और मिसाइलों से नहीं, बल्कि संसाधनों की आपूर्ति रोककर भी जीते जा सकते हैं। भारत इस वैश्विक ऊर्जा उथल-पुथल के बीच खुद को 'ग्लोबल साउथ' का मजबूत नेता बनाकर पेश कर रहा है, जो सभी के लिए सस्ती और सुलभ ऊर्जा की मांग करता है। आने वाले महीने यह तय करेंगे कि यूरोप इस ऊर्जा युद्ध को झेल पाता है या फिर उसे मास्को के सामने घुटने टेकने पड़ेंगे।
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