अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर एक बार फिर से भारी भूचाल आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मियों और आगामी व्हाइट हाउस शिखर वार्ता के बीच वाशिंगटन और बीजिंग के उच्च अधिकारियों ने एक अति-गुप्त समझौते की रूपरेखा तैयार की है। इस वार्ता का मुख्य केंद्र बिंदु वैश्विक सप्लाई चेन पर नियंत्रण और दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Magnets) के निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को हटाना है। बीजिंग की ओर से अचानक से अमेरिकी कोयले और कृषि उत्पादों की भारी खरीद के प्रस्ताव ने यूरोपीय संघ और पश्चिमी सहयोगियों के कान खड़े कर दिए हैं।
इस गुप्त कूटनीतिक हलचल का सबसे बड़ा कारण दोनों महाशक्तियों की घरेलू आर्थिक चुनौतियाँ हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी आर्थिक नीतियों और मध्यकालीन चुनाव रणनीति को साधने के लिए चीन के साथ व्यापारिक युद्ध को तुरंत विराम देना चाहते हैं। वहीं दूसरी ओर, चीन के टेक क्षेत्र पर अमेरिकी तकनीकी पाबंदियों का बुरा असर पड़ रहा था। दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे हुई इस बैठक की खबर लीक होते ही टोक्यो से लेकर ब्रुसेल्स तक के रक्षा मंत्रालयों में हड़कंप मच गया है, क्योंकि किसी ने भी इतनी जल्दी दो धुर विरोधियों के हाथ मिलाने की उम्मीद नहीं की थी।
पश्चिमी देशों के मीडिया आउटलेट्स में इस सौदेबाजी की कड़ी आलोचना हो रही है। यूरोपीय नेताओं का मानना है कि अमेरिका अपने आर्थिक लाभ के लिए ताइवान और इंडो-पैसिफिक की सुरक्षा प्रतिबद्धताओं से ध्यान हटा रहा है। वहीं, चीनी रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह समझौता वाशिंगटन की घटती वैश्विक साख का सीधा प्रमाण है। यदि यह द्विपक्षीय समझौता अंतिम रूप लेता है, तो वैश्विक व्यापार की दिशा हमेशा-हमेशा के लिए बदल जाएगी और छोटे देशों पर महाशक्तियों की आर्थिक निर्भरता और अधिक बढ़ जाएगी।
भारतीय दृष्टिकोण से इस अमेरिकी-चीनी 'डील' का सीधा असर भारत की विदेश नीति और आर्थिक हितों पर पड़ना तय है। भारत पिछले कुछ समय से 'चाइना प्लस वन' नीति का सबसे बड़ा लाभार्थी बनकर उभर रहा था, जहाँ वैश्विक कंपनियां चीन से निकलकर भारत में अपने विनिर्माण प्लांट लगा रही थीं। यदि वाशिंगटन और बीजिंग के बीच व्यापारिक संबंध फिर से सामान्य होते हैं, तो भारत की ओर आने वाले विदेशी निवेश की गति में कुछ समय के लिए सुस्ती आ सकती है। इसके अलावा, इंडो-पैसिफिक में क्वाड (Quad) की आक्रामकता पर भी अमेरिकी ढिलाई का प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल सकता है।
हालाँकि, भारतीय रणनीतिकारों के लिए इस स्थिति में एक बड़ा मौका भी छुपा हुआ है। भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच प्रस्तावित ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अब और तेजी से गति मिल सकती है। अमेरिका के अविश्वसनीय रुख को देखते हुए यूरोप अब भारत जैसे पारदर्शी और लोकतांत्रिक देश की ओर अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए तेजी से कदम बढ़ाएगा। भारत अपनी स्वतंत्र और स्वदेशी आर्थिक नीतियों के बल पर इस महाशक्ति संतुलन का पूरा फायदा उठाने के लिए तैयार दिख रहा है।
अंततः, यह नया समीकरण यह साबित करता है कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही कोई स्थायी दुश्मन, सिर्फ स्थायी हित होते हैं। भारत के लिए आवश्यक है कि वह अपनी सीमा सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता पर किसी भी विदेशी शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय अपनी घरेलू क्षमताओं का तेजी से विस्तार करे। आने वाले महीनों में नई दिल्ली की कूटनीतिक परीक्षा यह देखने योग्य होगी कि वह इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में अपने राष्ट्रीय हितों को कैसे सर्वोपरि रखती है।
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