सऊदी अरब के रियाद में एक बेहद गोपनीय और रणनीतिक सैन्य बैठक ने अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में सनसनी फैला दी है। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य प्रमुखों ने अचानक एक आपातकालीन बैठक आयोजित की है। लाल सागर और अदन की खाड़ी में हुथी विद्रोहियों द्वारा बढ़ते हमलों और सऊदी सीमा पर बढ़ते खतरों को देखते हुए इस त्रिपक्षीय सैन्य गुटबंदी को इस्लामिक दुनिया के एक नए 'मिलिट्री ब्लॉक' के रूप में देखा जा रहा है।
इस बैठक का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि सऊदी अरब अपनी तेल आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए तुर्की की आधुनिक ड्रोन तकनीक और पाकिस्तानी सेना के थल-बल का सहारा लेने की तैयारी में है। हाल ही में यमन सीमा पर हुए हवाई अभियानों में 150 से अधिक मौतों के बाद सऊदी अरब अपने लाल सागर के तेल टर्मिनलों को पूरी तरह से री-रूट कर रहा है। इस नए तीन-पक्षीय सुरक्षा तंत्र के बनने से अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों का इस क्षेत्र पर वर्चस्व घटता नजर आ रहा है।
तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन और पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व का रियाद के साथ यह नया रक्षा गठजोड़ खाड़ी के शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है। तुर्की जहां अफ्रीका और खाड़ी में अपने सैन्य ठिकाने मजबूत कर रहा है, वहीं पाकिस्तान अपनी गिरती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए सऊदी अरब को अपने परमाणु और सैन्य सुरक्षा छत्र के नीचे लाने की एवज में भारी भरकम आर्थिक मदद की उम्मीद कर रहा है।
भारत के रणनीतिकारों के लिए तुर्की और पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ यह नया सैन्य समीकरण एक बड़ी चिंता का विषय है। पाकिस्तान और तुर्की दोनों ही अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अक्सर भारत-विरोधी रुख अपनाते रहे हैं। हालांकि भारत के सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ गहरे आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं, लेकिन पाकिस्तान का सऊदी रक्षा तंत्र के करीब जाना भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक नया सिरदर्द पैदा कर सकता है।
भारत को अब सऊदी अरब के साथ अपनी रक्षा वार्ता को और अधिक आक्रामक बनाना होगा ताकि रियाद-इस्लामाबाद-अंकारा की यह तिकड़ी भारत के रणनीतिक हितों पर कोई चोट न पहुंचा सके। भारत का लक्ष्य मध्य पूर्व में अपनी मजबूत आर्थिक साख और ऊर्जा साझेदारियों के बल पर इस सैन्य गुटबंदी के असर को बेअसर करना होगा। भारत-यूएई का मजबूत व्यापारिक रिश्ता इस दिशा में एक बड़ा सहारा बन सकता है।
यह त्रिपक्षीय बैठक साबित करती है कि मध्य पूर्व की बदलती भू-राजनीति में सुरक्षा के नए केंद्र बन रहे हैं। भारत को खाड़ी देशों में अपनी खुफिया और नौसैनिक उपस्थिति को मजबूत रखना होगा। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि पश्चिमी देश इस नए तीन-देशीय रक्षा समझौते पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।
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