अफ्रीकी महाद्वीप का विशाल भूभाग अब केवल राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र नहीं रहा, बल्कि भविष्य की ग्रीन टेक्नोलॉजी और रक्षा उद्योग के लिए आवश्यक 'क्रिटिकल मिनरल्स' (दुर्लभ खनिजों) का मुख्य युद्धक्षेत्र बन चुका है। मध्य और पूर्वी अफ्रीका के खनिज-समृद्ध देशों में हाल के दिनों में लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के खनन अधिकारों को लेकर वैश्विक महाशक्तियों के बीच कूटनीतिक और आर्थिक खींचतान अपने चरम पर पहुंच गई है।
पश्चिमी ब्लॉक (अमेरिका और यूरोपीय संघ) ने अफ्रीका में अपने बुनियादी ढांचे के निवेश को दोगुना कर दिया है, ताकि वहां के खनिजों पर चीन के एकाधिकार को तोड़ा जा सके। चीन पिछले दो दशकों से अफ्रीका के अधिकांश माइंस और प्रोसेसिंग प्लांट्स पर अपना नियंत्रण जमाए बैठा था। लेकिन अब अफ्रीका के स्थानीय देश भी अपनी शर्तों पर सौदेबाजी कर रहे हैं और केवल कच्चा माल निर्यात करने के बजाय देश के भीतर ही प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की मांग कर रहे हैं।
भारत के लिए यह 'मिनरल वॉर' बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत अपनी इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) नीति, सौर ऊर्जा लक्ष्यों और रक्षा उत्पादन को तेजी से आगे बढ़ा रहा है। भारत को अपनी बैटरियों, फाइटर जेट्स और गाइडेंस सिस्टम के लिए कोबाल्ट, लिथियम और निकल की भारी जरूरत है। यदि भारत इन दुर्लभ खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला सुनिश्चित नहीं करता है, तो उसकी भविष्य की हरित क्रांति और सैन्य आधुनिकीकरण की गति धीमी पड़ सकती है।
इसी रणनीति के तहत, भारत ने अपने सार्वजनिक उपक्रम 'खान विदेश इंडिया लिमिटेड' (KABIL) के माध्यम से अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों में खनिज संपत्तियों के अधिग्रहण की प्रक्रिया तेज कर दी है। अफ्रीका के साथ भारत के ऐतिहासक रूप से मधुर और द्विपक्षीय संबंध रहे हैं, जहां भारत शोषणकारी नीतियों के बजाय 'क्षमता निर्माण' (Capacity Building) और 'स्थानीय विकास' पर जोर देता है। यह दृष्टिकोण अफ्रीकी देशों को काफी पसंद आ रहा है।
अफ्रीका में भारत का बढ़ता प्रभाव चीन के 'डेट-ट्रैप' (कर्ज जाल) कूटनीति का एक मजबूत विकल्प पेश कर रहा है। भारत वहां केवल खनिजों का दोहन नहीं कर रहा, बल्कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा क्षेत्र में भी अफ्रीका का साथ दे रहा है। इससे अफ्रीकी देशों के साथ भारत के व्यापारिक संबंध नए मुकाम पर पहुंच रहे हैं, जो संयुक्त राष्ट्र (UN) सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के दावे को भी मजबूती प्रदान करता है।
संक्षेप में, 21वीं सदी का नया 'ऑयल' वास्तव में यह 'क्रिटिकल मिनरल्स' ही हैं। जो देश इन संसाधनों की प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन पर नियंत्रण रखेगा, वही वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करेगा। इस नए संसाधन युद्ध में भारत की दूरदर्शी नीतियां देश को आने वाले दशकों में ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रही हैं।
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