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अमेरिका का इराक से ऐतिहासिक पूर्ण सैन्य वापसी का बड़ा ऐलान

पश्चिम एशिया के सामरिक संतुलन को हिलाकर रख देने वाले एक फैसले में अमेरिका ने इराक से अपनी बची हुई सेना की पूर्ण वापसी का ऐलान कर दिया है। लंबे समय से चल रही सैन्य मौजूदगी को खत्म करने के इस फैसले ने पेंटागन और मध्य पूर्व के सुरक्षा गलियारों में खलबली मचा दी है

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
03 Oct 2026
Solar farm during sunset

पश्चिम एशिया के सामरिक संतुलन को हिलाकर रख देने वाले एक फैसले में अमेरिका ने इराक से अपनी बची हुई सेना की पूर्ण वापसी का ऐलान कर दिया है। लंबे समय से चल रही सैन्य मौजूदगी को खत्म करने के इस फैसले ने पेंटागन और मध्य पूर्व के सुरक्षा गलियारों में खलबली मचा दी है। यह घोषणा न केवल इराक के राजनीतिक भविष्य को प्रभावित करेगी, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र में वैश्विक शक्तियों की भूमिका को एक नया मोड़ देगी।  

अमेरिका के इस कदम से मध्य पूर्व में दशकों पुराने अमेरिकी वर्चस्व का एक अध्याय समाप्त होता दिख रहा है। बगदाद में राजनीतिक अस्थिरता और क्षेत्रीय शक्तियों के बढ़ते दबाव के बीच यह निर्णय लिया गया है। हालांकि, वाशिंगटन का कहना है कि वह आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए अपने सहयोगियों के साथ खुफिया रणनीतिक साझेदारी जारी रखेगा, लेकिन जमीन पर सैनिकों की अनुपस्थिति एक बड़ा शक्ति-शून्य (Power Vacuum) पैदा कर सकती है।

इस बड़े फैसले का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव ईरान और चीन की क्षेत्रीय रणनीतियों पर पड़ेगा। बगदाद पर तेहरान का प्रभाव पहले से ही काफी मजबूत रहा है, और अमेरिकी सैनिकों की वापसी से ईरान को अपने प्रभाव क्षेत्र को और आगे बढ़ाने का सीधा मौका मिल सकता है। वहीं, बीजिंग भी अपनी 'बेल्ट एंड रोड' पहल के जरिए मध्य पूर्व में आर्थिक और ढांचागत विस्तार की नई संभावनाओं को तलाश रहा है।

क्षेत्रीय समीकरणों में इस अचानक आए खालीपन से सीरिया और कुर्दिस्तान के इलाकों में भी नया शक्ति-संतुलन बनेगा। स्थानीय सुरक्षा बल अब अपने दम पर सुरक्षा स्थिति संभालने की चुनौती से जूझ रहे हैं, जबकि अन्य वैश्विक शक्तियां इस स्थिति का कूटनीतिक लाभ उठाने की होड़ में लग गई हैं। यह कदम पश्चिमी शक्तियों की मध्य पूर्व नीति में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है।  

भारतीय परिपेक्ष्य में विश्लेषण:

भारत के लिए मध्य पूर्व में स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। इराक भारत के लिए कच्चे तेल का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता रहा है। अमेरिकी सैनिकों की वापसी से यदि क्षेत्र में अस्थिरता या शिया-सुन्नी संघर्ष बढ़ता है, तो इससे तेल आपूर्ति और भारत की ऊर्जा दरों पर सीधा असर पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, खाड़ी देशों में लाखों भारतीय कार्यरत हैं, जिनकी सुरक्षा और आर्थिक हित इस क्षेत्र की शांति पर निर्भर करते हैं। नई दिल्ली को अब बगदाद के साथ-साथ तेहरान और अन्य क्षेत्रीय साझेदारों के साथ अपने द्विपक्षीय कूटनीतिक तंत्र को और अधिक मजबूत करना होगा।  

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