लैटिन अमेरिकी महाद्वीप में राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय केंद्र बिंदु बन गई है। दक्षिण अमेरिका के 'लिथियम त्रिकोण' (अर्जेंटीना, बोलीविया और चिली) में स्थित प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर स्थानीय सरकारों और अंतरराष्ट्रीय खनन निगमों के बीच मतभेद सतह पर आ गए हैं। कई स्थानीय देशों ने अपनी हरित संपदा और लिथियम खनिजों का 'राष्ट्रीयकरण' करने या उन पर कड़े टैक्स लगाने के संकेत दिए हैं, जिससे वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा बाजार में खलबली मच गई है।
दुनिया के कुल लिथियम भंडार का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इसी क्षेत्र में केंद्रित है। इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और स्मार्टफोन की बैटरियों के निर्माण के लिए लिथियम सबसे अपरिहार्य तत्व है। पश्चिमी देशों की ऑटोमोबाइल कंपनियां और एशियाई मैन्युफैक्चरिंग दिग्गज इस इलाके में अरबों डॉलर का निवेश कर चुके हैं, लेकिन स्थानीय सरकारों की नई नीतियों के कारण कई बहुराष्ट्रीय परियोजनाओं के अटकने या खटाई में पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
भारत के लिए लैटिन अमेरिका का यह घटनाक्रम बेहद संवेदनशील है, क्योंकि भारत अपने विशाल ऑटोमोबाइल उद्योग को तेजी से 'इलेक्ट्रिक व्हीकल' (EV) इकोसिस्टम में बदल रहा है। भारत में टाटा, महिंद्रा जैसी प्रमुख कंपनियां और कई नए स्टार्टअप्स इलेक्ट्रिक वाहनों के उत्पादन में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे हैं। यदि लिथियम की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति बाधित होती है या उसकी कीमतें बेतहाशा बढ़ती हैं, तो भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियां और बैटरियां काफी महंगी हो जाएंगी, जिससे हरित परिवहन का सपना धीमा पड़ सकता है।
इस स्थिति से निपटने के लिए, भारत की खनिज कंपनी KABIL (खान विदेश इंडिया लिमिटेड) ने अर्जेंटीना में लिथियम ब्लॉक के अधिग्रहण और खोज के लिए रणनीतिक समझौते किए हैं। भारत की नीति लैटिन अमेरिका में केवल संसाधनों के दोहन की नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर टिकाऊ विकास करने की है। यह दृष्टिकोण भारत को इस क्षेत्र में अन्य आक्रामक महाशक्तियों के मुकाबले एक नैतिक और विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार बनाता है।
कूटनीतिक दृष्टिकोण से, नई दिल्ली अब लैटिन अमेरिका और कैरिबियाई देशों (GRULAC) के साथ अपने राजनीतिक और व्यापारिक संबंधों को नए पंख लगा रही है। भारत इन देशों के साथ द्विपक्षीय प्राथमिक व्यापार समझौतों (PTA) और मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को तेजी से आगे बढ़ा रहा है ताकि कृषि उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स और खनिज आपूर्ति बिना किसी बाधा के जारी रह सके।
21वीं सदी का यह नया 'संसाधन राष्ट्रवाद' (Resource Nationalism) पूरी दुनिया के लिए एक सीख है कि केवल तकनीक का होना काफी नहीं है, जब तक कि आपके पास कच्चे माल की सुरक्षित आपूर्ति न हो। भारत इस वैश्विक बदलाव को भांपते हुए अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षित करने के लिए सही दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
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