रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग अब एक नए और बेहद खतरनाक चरण में प्रवेश कर चुकी है। नाटो (NATO) सहयोगियों ने यूक्रेन को लंबी दूरी की उन्नत मिसाइलें प्रदान करने और उन्हें रूसी क्षेत्र के गहराई में स्थित ठिकानों पर इस्तेमाल करने की हरी झंडी देने की तैयारी कर ली है। ब्रिटेन और फ्रांस की ओर से 'स्टॉर्म शैडो' और अमेरिका की 'ATACMS' मिसाइलों के उपयोग की अनुमति संबंधी चर्चाओं के बीच, यूक्रेन ने दावा किया है कि वह रूसी सैन्य बुनियादी ढांचे और तेल रिफाइनरियों को पूरी तरह ध्वस्त करने में सक्षम हो जाएगा।
नाटो के इस कदम पर क्रेमलिन ने बेहद आक्रामक और सख्त रुख अपनाया है। रूसी राष्ट्रपति भवन के प्रवक्ता ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर पश्चिमी मिसाइलों से रूस की मुख्य भूमि पर हमला किया गया, तो इसे नाटो की युद्ध में सीधी भागीदारी माना जाएगा। रूसी रक्षा मंत्रालय ने संकेत दिया है कि रूस अपनी परमाणु रणनीति (Nuclear Doctrine) में संशोधन करने जा रहा है और वह गैर-परमाणु हमलों के जवाब में भी सामरिक परमाणु हथियारों (Tactical Nuclear Weapons) के इस्तेमाल का अधिकार सुरक्षित रखता है। इस बयान ने पूरे यूरोप में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है।
यूरोपीय देशों में इस समय हाई-अलर्ट की स्थिति है। पोलैंड और बाल्टिक देशों ने अपनी सीमाओं पर सैन्य तैनाती बढ़ा दी है, जबकि जर्मनी में ब्लैकआउट और आपातकालीन तैयारियों के निर्देश जारी किए जा रहे हैं। वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि यदि नाटो मिसाइलों का सीधा इस्तेमाल रूसी धरती पर होता है, तो यह संघर्ष यूक्रेन की सीमाओं से बाहर निकलकर सीधे रूस और नाटो के बीच तीसरे विश्व युद्ध (World War III) का रूप ले सकता है, जिसकी विभीषिका की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
भारत के लिए यह अंतरराष्ट्रीय संकट कूटनीतिक संतुलन की एक कठिन परीक्षा है। भारत लगातार 'युद्ध के मैदान में शांति नहीं खोजी जा सकती' के सिद्धांत पर अडिग रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि "यह युद्ध का युग नहीं है" और भारत संवाद व कूटनीति के जरिए शांति समाधान का पक्षधर है। भारत ने रूस से अपनी पुरानी और मजबूत रणनीतिक साझेदारी को बरकरार रखते हुए यूक्रेन के साथ भी अपने मानवीय और कूटनीतिक संबंधों को बेहतर ढंग से संतुलित किया है, जिसे वैश्विक स्तर पर सराहा जा रहा है।
हालांकि, आर्थिक मोर्चे पर यह युद्ध भारत को प्रभावित कर रहा है। रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया था, लेकिन अब पश्चिमी देश भारतीय कंपनियों पर द्वितीयक प्रतिबंध (Secondary Sanctions) लगाने का दबाव बना रहे हैं। इसके अलावा, युद्ध के लंबे खिंचने से वैश्विक उर्वरक (Fertilizer) आपूर्ति और खाद्यान्न सुरक्षा पर नकारात्मक असर पड़ रहा है, जो भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। भारत इस स्थिति में बेहद सावधानी से कदम बढ़ा रहा है।
संक्षेप में, रूस और नाटो के बीच बढ़ता यह टकराव वैश्विक स्थिरता को पूरी तरह हिला चुका है। यूक्रेन युद्ध का अंत कूटनीतिक मेज पर ही संभव है, लेकिन दोनों पक्षों के कड़े रुख से शांति की संभावनाएं धुंधली होती जा रही हैं। भारत जैसे गुटनिरपेक्ष और शांतिप्रिय देश के लिए यह आवश्यक है कि वह वैश्विक मंचों पर शांति की आवाज बुलंद रखे और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखे, ताकि आने वाले समय में देश पर इसके बुरे प्रभाव न पड़ें।
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