बर्फ की मोटी चादर से ढके ग्रीनलैंड को लेकर डेनमार्क और अमेरिका के बीच एक ऐसा ऐतिहासिक और रणनीतिक समझौता हुआ है जिसने रूस और चीन के नक्शों पर खलबली मचा दी है। कोपेनहेगन ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि कर दी है कि उसने अमेरिका के साथ 'ग्रीनलैंड आर्कटिक सुरक्षा पैक्ट' पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस समझौते के तहत अमेरिकी सेना को ग्रीनलैंड में अपने नए राडार और एयरबेस स्थापित करने की पूर्ण छूट मिल गई है, जिससे पूरा उत्तरी ध्रुव (North Pole) अब वाशिंगटन की सीधी मिसाइल जद में आ गया है।
इस सौदे की सबसे बड़ी वजह ग्रीनलैंड में मौजूद दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) का अकूत भंडार है। ग्रीनलैंड की स्थानीय खनन कंपनियों ने भी अमेरिका के साथ मिलकर अपने रेयर-अर्थ माइनिंग प्रोजेक्ट को दोगुना करने का ऐलान कर दिया है। चीन, जो अब तक दुनिया के रेयर-अर्थ मैग्नेट और खनिजों की सप्लाई पर 80 प्रतिशत से अधिक कब्जा जमाए बैठा था, उसके इस एकाधिकार को तोड़ने के लिए वाशिंगटन ने यह बड़ा दांव खेला है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस कदम को उत्तरी ध्रुव का 'सैनिकीकरण' करार देते हुए आर्कटिक महासागर में अपनी परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती बढ़ाने के आदेश जारी कर दिए हैं। रूस का मानना है कि ग्रीनलैंड में अमेरिकी सेना का विस्तार उसकी उत्तरी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है। इस नए आर्कटिक तनाव ने यूरोप के देशों में भी एक नई शीतयुद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है।
भारतीय दृष्टिकोण से देखें तो आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका का यह आक्रामक कदम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और पर्यावरण के लिहाज से बहुत असर डालेगा। भारत 'आर्कटिक काउंसिल' में एक पर्यवेक्षक देश है और उत्तरी ध्रुव में हो रहे जलवायु परिवर्तन का सीधे तौर पर भारत के मानसून चक्र से गहरा संबंध है। इसके अलावा, रेयर-अर्थ खनिजों पर चीन की निर्भरता कम होने से भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक वाहन (EV) उद्योगों को भी भविष्य में नए और सुरक्षित आपूर्ति के विकल्प मिल सकते हैं।
भारत के पास भी आर्कटिक में वैज्ञानिक और रणनीतिक शोध को बढ़ाने का एक बड़ा मौका है। भारत लगातार रूस के साथ मिलकर 'उत्तरी समुद्री मार्ग' (Northern Sea Route) के माध्यम से अपना व्यापार बढ़ाने पर काम कर रहा है। अमेरिका और डेनमार्क का यह नया समझौता इस बात का संकेत है कि भविष्य में महाशक्तियों के बीच की असली लड़ाई बर्फ से ढके इस संसाधन-समृद्ध क्षेत्र में लड़ी जाएगी।
संक्षेप में कहें तो ग्रीनलैंड अब केवल एक बर्फीला द्वीप नहीं रहा, बल्कि 21वीं सदी की नई तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुका है। भारत को इस नए आर्कटिक समीकरण में अपने वैज्ञानिक और कूटनीतिक पदचिह्नों को और अधिक मजबूती से छापना होगा ताकि वैश्विक संसाधन आवंटन में उसकी अनदेखी न हो सके।
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