हॉर्न ऑफ अफ्रीका और लाल सागर की बदलती भू-राजनीति के बीच वाशिंगटन ने एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा कूटनीतिक फैसला लिया है। अमेरिका ने इरिट्रिया की सेना और वहां की सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टी पर पिछले कई सालों से लगाए गए सभी कड़े आर्थिक और सैन्य प्रतिबंधों को अचानक से पूरी तरह हटा लिया है। पेंटागन और अमेरिकी विदेश विभाग का यह यू-टर्न लाल सागर में बढ़ते हुथी हमलों और चीन के बढ़ते अफ्रीकी प्रभाव को बेअसर करने की एक सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है।
इरिट्रिया, जो रणनीतिक रूप से लाल सागर के तट पर बसा एक अत्यंत महत्वपूर्ण देश है, लंबे समय से पश्चिमी देशों के निशाने पर था। लेकिन अब जब बाबल-अल-मंदेब और लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों का निकलना दूभर हो गया है, अमेरिका को अफ्रीका के इस तटीय देश की नौसैनिक मदद की सख्त जरूरत महसूस होने लगी है। इस फैसले के बाद इरिट्रिया के बंदरगाहों का इस्तेमाल अब अमेरिकी और पश्चिमी गठबंधन के युद्धपोतों द्वारा गश्त और ईंधन आपूर्ति के लिए किया जा सकेगा।
इस घटनाक्रम से हॉर्न ऑफ अफ्रीका के पड़ोसियों—विशेषकर इथियोपिया में बेचैनी बढ़ गई है। इथियोपिया के टिग्रे क्षेत्र में फिर से गृहयुद्ध की चिंगारी भड़क उठी है। ऐसे में इरिट्रिया को अमेरिका का खुला समर्थन मिलने से क्षेत्रीय शक्तियों का संतुलन बिगड़ने की पूरी संभावना है। अफ्रीका के कई देश इसे अमेरिका की स्वार्थी कूटनीति का सबसे ताजा उदाहरण बता रहे हैं, जो अपने व्यापारिक हितों के लिए रातों-रात किसी भी देश को अपना सहयोगी बना सकता है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में अफ्रीका के इस रणनीतिक कोने में अमेरिका और इरिट्रिया का करीब आना भारतीय नौसेना के संचालन के लिए एक राहत भरा संकेत हो सकता है। भारत का भी एक बड़ा व्यापारिक बेड़ा लाल सागर से गुजरता है जो बार-बार हमलों का शिकार हो रहा है। इरिट्रिया में अमेरिकी और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा का ढांचा मजबूत होने से भारतीय जहाजों को भी इस खतरनाक समुद्री मार्ग पर अतिरिक्त सुरक्षा छत्र मिल सकेगा।
कूटनीतिक रूप से भारत को अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र में अपने पैर और मजबूती से जमाने होंगे। भारत के इथियोपिया और इरिट्रिया दोनों के साथ व्यापारिक और मानवीय संबंध हैं। भारत को यह ध्यान रखना होगा कि पश्चिमी देशों का यह नया रुख इस क्षेत्र में किसी नए गृहयुद्ध को न भड़का दे, क्योंकि इससे भारत के व्यापारिक रास्तों पर दीर्घकालिक असर पड़ेगा।
यह कूटनीतिक बदलाव साबित करता है कि जब बात वैश्विक समुद्री व्यापार की सुरक्षा पर आती है, तो महाशक्तियां अपने सारे पुराने मतभेद दरकिनार कर देती हैं। भारत को भी अफ्रीकी देशों के साथ अपनी स्वतंत्र और विकास-केंद्रित रणनीतिक साझेदारी को नया आयाम देना होगा ताकि हिंद महासागर से लाल सागर तक उसकी पकड़ मजबूत बनी रहे।
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