अफ़्रीकी महाद्वीप के रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण 'हॉर्न ऑफ अफ्रीका' क्षेत्र में चीन ने एक नया सैन्य बेस बनाने की गुप्त तैयारी पूरी कर ली है। अंतर्राष्ट्रीय सेटेलाइट तस्वीरों के माध्यम से लीक हुई जानकारी के अनुसार, जीबूती के बाद अब चीन अटलांटिक महासागर से सटे एक अफ़्रीकी देश में अपना पूर्ण विकसित नौसैनिक अड्डा स्थापित करने जा रहा है। इस खबर ने पेंटागन और यूरोपीय रक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है, क्योंकि इससे चीन को अटलांटिक महासागर में सीधे सैन्य उपस्थिति मिल जाएगी।
चीन की इस चाल को उसकी 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के अगले खूनी अध्याय के रूप में देखा जा रहा है। चीन ने पिछले एक दशक में अफ़्रीकी देशों को अरबों डॉलर का कर्ज देकर उन्हें अपने 'डेट ट्रैप' (कर्ज के जाल) में फंसा लिया है। अब जब ये देश कर्ज चुकाने में असमर्थ हो रहे हैं, तो चीन उनकी सामरिक संपत्तियों, बंदरगाहों और सैन्य ठिकानों पर कब्जा जमा रहा है। यह अफ्रीका के पुन औपनिवेशीकरण की एक नई और खतरनाक शुरुआत मानी जा रही है।
पश्चिमी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि इस नए नौसैनिक बेस पर चीन अपनी परमाणु पनडुब्बियों और विमान वाहक पोतों को तैनात करने की योजना बना रहा है। इससे वह अमेरिका और यूरोप जाने वाले सभी प्रमुख समुद्री व्यापारिक मार्गों पर सीधे नज़र रख सकेगा। अमेरिकी प्रशासन ने अफ़्रीकी नेताओं को चेतावनी दी है कि चीन के साथ यह साझेदारी उनकी संप्रभुता के लिए घातक साबित होगी, लेकिन आर्थिक तंगी से जूझ रहे कई देश चीन के इस जाल से निकलने में असमर्थ दिख रहे हैं।
भारत के परिप्रेक्ष्य में अफ़्रीकी महाद्वीप में बढ़ता चीनी प्रभाव बेहद चिंताजनक है। हिंद महासागर में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भारत के लिए अफ्रीका एक अत्यंत महत्वपूर्ण साझेदार रहा है। चीन के नए सैन्य अड्डों से भारत के पश्चिमी समुद्री तटों की सुरक्षा पर सीधा खतरा पैदा हो सकता है। हिंद महासागर में 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (मोतियों की माला) की तर्ज पर अब चीन अटलांटिक और पश्चिमी हिंद महासागर को भी घेरने की कोशिश कर रहा है।
हालाँकि, भारत इस चीनी खतरे का मुकाबला अपनी 'नरम शक्ति' (Soft Power) और विकास आधारित पहलों से कर रहा है। भारत अफ्रीका को बिना किसी शोषणकारी शर्त के शिक्षा, स्वास्थ्य, आईटी और कृषि क्षेत्र में मदद दे रहा है। 'भारत-अफ्रीका मंच शिखर सम्मेलन' और वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ के माध्यम से भारत ने अफ़्रीकी देशों को चीन के कर्ज जाल के प्रति आगाह किया है। भारत को अब अपनी नौसैनिक गश्त को अफ़्रीकी तटों तक और अधिक विस्तार देना होगा।
यह वैश्विक भू-राजनीति का एक ऐसा मोड़ है जहाँ अफ्रीका महाद्वीप महाशक्तियों की नई जंग का मैदान बन गया है। चीन की आक्रामक नीतियां और अमेरिका की रक्षात्मक प्रतिक्रिया के बीच भारत एक निष्पक्ष और विश्वसनीय भागीदार के रूप में उभरा है। यदि भारत और उसके सहयोगी देश समय रहते इस अफ़्रीकी मोर्चे पर चीन को नहीं रोक पाते, तो वैश्विक समुद्री सुरक्षा का संतुलन हमेशा के लिए बदल जाएगा।
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