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संयुक्त राष्ट्र वीटो पर ऐतिहासिक फैसला: भारत की स्थाई सदस्यता का रास्ता साफ?

संयुक्त राष्ट्र संघ (UNGA) के जारी सत्र में एक ऐसा ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिला है जिसने 80 साल पुराने वैश्विक शक्ति संतुलन को हिलाकर रख दिया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के दो स्थाई सदस्यों—फ्रांस और ब्रिटेन

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
30 Sep 2026
Solar farm during sunset

संयुक्त राष्ट्र संघ (UNGA) के जारी सत्र में एक ऐसा ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिला है जिसने 80 साल पुराने वैश्विक शक्ति संतुलन को हिलाकर रख दिया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के दो स्थाई सदस्यों—फ्रांस और ब्रिटेन—ने नरसंहार और गंभीर मानवीय संकटों के मामलों में अपनी 'वीटो पावर' का इस्तेमाल स्वेच्छा से निलंबित करने के प्रस्ताव का आधिकारिक समर्थन कर दिया है। इस अभूतपूर्व कदम के साथ ही सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन और भारत जैसे उभरते हुए शक्तिशाली देशों को स्थाई सदस्यता देने की मांग ने अब तक का सबसे उग्र रूप ले लिया है।

वर्षों से वीटो पावर के दुरुपयोग के कारण सुरक्षा परिषद कई वैश्विक संकटों को सुलझाने में पूरी तरह से विफल साबित हो रही थी। संयुक्त राष्ट्र महासचिव के कार्यकाल के अंतिम चरण में इस सुधारवादी प्रस्ताव का पारित होना बहुपक्षवाद के लिए एक नया जीवनदान माना जा रहा है। ब्रिटेन और फ्रांस के इस फैसले के बाद अब सारा दबाव अमेरिका, रूस और चीन पर आ गया है, जो लंबे समय से सुरक्षा परिषद में किसी भी नए देश के प्रवेश को रोकने के लिए वीटो का सहारा लेते रहे हैं।  

विश्व स्तर पर इस घटनाक्रम को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अब तक का सबसे बड़ा कूटनीतिक सुधार माना जा रहा है। जी-4 देशों (भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील) ने एक सुर में मांग उठाई है कि सुरक्षा परिषद का वर्तमान ढांचा आज की वास्तविकताओं से पूरी तरह कट चुका है। जब तक दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले महाद्वीपों और अर्थव्यवस्थाओं को इसमें न्यायसंगत प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, तब तक संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता और विश्वसनीयता शून्य बनी रहेगी।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह घटनाक्रम भारत की दशकों पुरानी कूटनीतिक लड़ाई की सबसे बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। भारत शांति सेना (UN Peacekeeping) में दुनिया का सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा है और अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था तथा परमाणु शक्ति के बल पर स्थाई सदस्यता का सबसे प्रबल दावेदार है। वीटो पावर पर लगने वाले इन नए अंकुशों से चीन द्वारा भारत के खिलाफ बार-बार किए जाने वाले नकारात्मक वीटो के इस्तेमाल की धार बेहद कुंद हो जाएगी।

भारत के विदेश मंत्रालय ने इस ऐतिहासिक पहल का स्वागत करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि आधा-अधूरा सुधार भारत को स्वीकार्य नहीं होगा। भारत अब बिना किसी शर्त के सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट और पूर्ण अधिकारों की मांग पर अड़ा हुआ है। ग्लोबल साउथ के 100 से अधिक देशों का समर्थन भारत के पक्ष में खड़ा है, जिससे नई दिल्ली की अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति इस समय अपने सबसे मजबूत मुकाम पर पहुंच गई है।

यदि आने वाले समय में सुरक्षा परिषद में यह ऐतिहासिक सुधार लागू होता है, तो वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में भारत की भूमिका निर्णायक हो जाएगी। भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अंतर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में अपनी प्रभावी छाप छोड़ सकेगा। यह बदलाव यह साबित करता है कि अब वैश्विक मंचों पर भारत की आवाज को दबाना या नजरअंदाज करना किसी भी महाशक्ति के लिए संभव नहीं रह गया है।

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