मध्य पूर्व का नक्शा एक बार फिर रक्तपात और बारूद के धुएँ में छिपता नजर आ रहा है। ईरान के सर्वोच्च कमांडर ने सीरिया और लेबनान सीमा पर इजराइली ठिकानों पर अब तक के सबसे बड़े समन्वित हमले का आदेश जारी कर दिया है। तेहरान ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि उसके परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की कोशिश की गई, तो तेल अवीव को नक्शे से मिटा दिया जाएगा। इस अल्टीमेटम के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में रेड अलर्ट घोषित कर दिया गया है और अमेरिकी सेना ने अपने विमान वाहक पोतों को लाल सागर की ओर मोड़ दिया है।
अंतर्राष्ट्रीय थिंक-टैंक्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने इस बार अपनी सबसे घातक हाइपरसोनिक मिसाइलों 'फतेह-2' का बेड़ा अग्रिम मोर्चों पर तैनात कर दिया है। यह मिसाइल इजराइल के आयरन डोम और अमेरिका के पैट्रियट डिफेंस सिस्टम को भी चकमा देने में सक्षम मानी जाती है। दूसरी तरफ, इजराइल के प्रधानमंत्री ने भी स्पष्ट कर दिया है कि उनकी सेना किसी भी हमले का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है और इस बार निशाना सीधे तेहरान के सामरिक केंद्र होंगे।
इस तनाव की वजह से लाल सागर और होर्मुज की जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों का आवागमन लगभग बंद हो चुका है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में कोहराम मच गया है और अंतर्राष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमतें कुछ ही घंटों में आसमान छूने लगी हैं। यदि होर्मुज की खाड़ी पूरी तरह बंद हो जाती है, तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की किल्लत और भयानक महंगाई का दौर शुरू हो जाएगा, जिससे पश्चिमी देश भी कांप रहे हैं।
भारत के दृष्टिकोण से मध्य पूर्व का यह संकट बेहद संवेदनशील और चिंताजनक है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल इसी क्षेत्र से आयात करता है। यदि खाड़ी युद्ध का रूप लेती है, तो भारत में ईंधन के दाम बेतहाशा बढ़ सकते हैं, जिससे देश की आर्थिक वृद्धि दर पर सीधा असर पड़ेगा। इसके अलावा, खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भारत सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है।
कूटनीतिक रूप से भारत के लिए यह स्थिति किसी भूलभुलैया से कम नहीं है। भारत के इजराइल के साथ मजबूत रक्षा और रणनीतिक संबंध हैं, जबकि ईरान के साथ 'चाबहार बंदरगाह' और 'उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे' जैसे बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। भारत को यहाँ बहुत ही सधे हुए कदमों से चलना होगा ताकि उसके हित दोनों तरफ सुरक्षित रहें। नई दिल्ली ने दोनों पक्षों से तत्काल संयम बरतने और कूटनीति के रास्ते पर लौटने की अपील की है।
अंततः, यह संघर्ष केवल दो देशों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के आर्थिक संतुलन को हिलाने की क्षमता रखता है। भारत अपने आंतरिक बाजारों को स्थिर रखने के लिए रूस और अन्य गैर-खाड़ी देशों से तेल आयात बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। लेकिन अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो भारत की मुद्रा और राजकोषीय घाटे पर गहरा दबाव पड़ना तय है। पूरे विश्व की नजरें अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।
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