यूरोपीय महाद्वीप में भू-राजनीतिक समीकरण एक बार फिर तेजी से बदल रहे हैं। आने वाले शीतकालीन सत्र को देखते हुए यूरोपीय देशों के भीतर ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा बजट और सुरक्षा नीतियों पर भारी मतभेद उभरकर सामने आ रहे हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष के लंबे खिंचने और अमेरिकी घरेलू राजनीति में उठते सवालों के बीच, यूरोपीय यूनियन (EU) के सदस्य देश अब अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को लेकर चिंतित हो गए हैं।
यूरोप के कई देशों में बढ़ती महंगाई और ऊर्जा लागत के कारण जन आक्रोश देखने को मिल रहा है। इसके साथ ही, नाटो (NATO) के भीतर रक्षा खर्च के योगदान को लेकर चल रही खींचातान ने स्थिति को और पेचीदा बना दिया है। यूरोपीय देश अब यह महसूस कर रहे हैं कि वे अपनी सुरक्षा के लिए हमेशा के लिए वाशिंगटन के भरोसे नहीं रह सकते, और उन्हें अपने स्वयं के रक्षा उत्पादन और विविध ऊर्जा स्रोतों को तुरंत मजबूत करना होगा।
भारत के लिए यूरोप में आ रहा यह राजनीतिक और आर्थिक बदलाव एक बड़ा कूटनीतिक और व्यापारिक अवसर पेश करता है। जब से यूरोपीय देशों ने रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम की है, तब से भारतीय रिफाइनरियों से प्रसंस्कृत (रिफाइंड) ईंधन और पेट्रोलियम उत्पादों की मांग यूरोप में रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ गई है। भारत वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख 'एनर्जी हब' के रूप में उभरा है जो यूरोपीय बाजारों की कमी को पूरा कर रहा है।
इसके अतिरिक्त, यूरोप का अपनी रक्षा प्राथमिकताओं को बदलना भारतीय रक्षा निर्यात के लिए नया द्वार खोल रहा है। 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत निर्मित तोपें, गोला-बारूद, ड्रोन और सैन्य पुर्जों में यूरोपीय देशों की रुचि बढ़ी है। भारत के फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के साथ रणनीतिक संबंध अब केवल खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह 'सह-विकास और सह-उत्पादन' (Co-development) की दिशा में बढ़ रहे हैं।
कूटनीतिक स्तर पर, यूरोप अब भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक अपरिहार्य साझेदार मानता है। चीन पर अपनी अति-निर्भरता को कम करने (De-risking) की रणनीति के तहत यूरोपीय कंपनियां अपने मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स भारत में स्थानांतरित कर रही हैं। यह 'ग्लोबल वैल्यू चेन' में भारत की स्थिति को मजबूत कर रहा है, जिससे देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।
यूरोप का यह नया संकट यह सिद्ध करता है कि आज की वैश्विक दुनिया में कोई भी देश अलग-थलग नहीं रह सकता। भारत की गुटनिरपेक्ष और हित-आधारित विदेश नीति (Strategic Autonomy) इस अनिश्चित दौर में सबसे सफल साबित हुई है, जिससे भारत पूर्व और पश्चिम दोनों धड़ों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए संबंध मजबूत कर पा रहा है।
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