अफ़्रीकी महाद्वीप का साहेल क्षेत्र (Sahel Region) एक बार फिर वैश्विक राजनीति का नया बारूदखाना बन गया है। हाल ही में एक और अफ्रीकी देश में तख्तापलट के बाद पश्चिमी समर्थित सरकार को उखाड़ फेंका गया है और नई सैन्य जुंटा (Junta) ने पश्चिमी देशों के सैनिकों को देश छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया है। इसके तुरंत बाद, रूस के सुरक्षा ठेकेदारों और चीनी नौसेना ने उस इलाके में अपनी उपस्थिति मजबूत करते हुए नए सैन्य ठिकाने और रणनीतिक बंदरगाह बनाने की घोषणा कर दी है, जिससे पश्चिमी खेमे में खलबली मच गई है।
अमेरिका और यूरोपीय संघ ने इस नए सैन्य उभार को अपनी वैश्विक सुरक्षा और ऊर्जा हितों के लिए बड़ा झटका माना है। साहेल और पश्चिम अफ्रीका का यह इलाका दुर्लभ खनिजों (Critical Minerals), यूरेनियम और सोने के समृद्ध भंडारों से भरा हुआ है। रूस और चीन अब इन संसाधनों पर सीधा नियंत्रण हासिल करने की होड़ में हैं। पश्चिमी देशों को डर है कि इस सैन्य बदलाव से क्षेत्र में आतंकवादी गुटों का दबदबा बढ़ेगा, जिससे यूरोप की ओर अवैध प्रवासियों का अब तक का सबसे बड़ा सैलाब उमड़ सकता है।
चीन इस इलाके में केवल सैन्य रूप से ही नहीं, बल्कि अपने विशाल बुनियादी ढांचा निवेश (BRI) और बंदरगाहों के नेटवर्क के जरिए पैर पसार रहा है। अटलांटिक महासागर के अफ्रीकी तटों पर चीनी नौसैनिक अड्डे की संभावना ने वाशिंगटन को अत्यधिक तनाव में डाल दिया है। वहीं, रूस वहां सुरक्षा और सैन्य हार्डवेयर की गारंटी देकर पश्चिमी प्रभाव को पूरी तरह मिटाने के एजेंडे पर काम कर रहा है। इस तरह अफ्रीका महाद्वीप एक बार फिर 'शीत युद्ध 2.0' का नया मैदान बन चुका है।
भारतीय परिपेक्ष्य में, अफ्रीका का यह घटनाक्रम भारत के 'ग्लोबल साउथ' (Global South) के नेतृत्व और रणनीतिक आर्थिक हितों से सीधे जुड़ा हुआ है। भारत ने हाल के वर्षों में अफ्रीकी संघ (African Union) को G20 में शामिल कराकर अफ्रीका के साथ अपने ऐतिहासिक और मजबूत संबंधों को नया आयाम दिया था। लेकिन वहां बढ़ता रूस-चीन का एकाधिकार और अस्थिरता भारतीय कंपनियों के भारी निवेश और ऊर्जा सुरक्षा के लिए चुनौतियां खड़ी कर रही है।
भारत अपनी कूटनीति के तहत अफ्रीका में किसी सैन्य गुटबाजी का हिस्सा बनने के बजाय विकास साझेदारी, क्षमता निर्माण, कृषि और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में मदद कर रहा है। अफ्रीका में रहने वाले लाखों भारतीय मूल के लोगों की सुरक्षा भी भारत सरकार की प्राथमिकता है। भारत चाहता है कि अफ्रीका के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल अफ्रीकी लोगों के विकास के लिए हो, न कि विदेशी शक्तियों की औपनिवेशिक जंग के लिए।
निष्कर्ष यह है कि अफ्रीका में जारी यह नई ग्रेट गेम वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल रही है। यदि अफ्रीका में तख्तापलट और विदेशी सैन्य हस्तक्षेप का यह दौर इसी तरह जारी रहा, तो यह न केवल महाद्वीप को लंबे संकट में धकेल देगा बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को भी बाधित करेगा। भारत को अपनी गुटनिरपेक्ष और विश्वसनीय छवि के बल पर अफ्रीका के साथ अपने व्यापारिक और कूटनीतिक धागे को और मजबूती से थामे रखना होगा।
#AfricaGeopolitics #SahelCrisis #ChinaRussiaInAfrica #GlobalSouth #IndiaAfricaTies #CriticalMinerals #MilitaryCoup #ForeignPolicy