पूर्वी यूरोप और रूस-नाटो मोर्चे पर स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने नाटो (NATO) देशों को चेतावनी जारी की है कि यदि रूस के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाके 'कलिनिनग्राद' (Kaliningrad) पर कोई भी आक्रामक हमला या उकसावा होता है, तो रूस अपनी रक्षा के लिए "हर प्रकार के हथियारों" का इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा। पुतिन का यह बयान सीधे तौर पर सामरिक परमाणु हथियारों (Tactical Nuclear Weapons) के इस्तेमाल का संकेत माना जा रहा है।
कलिनिनग्राद, पोलैंड और लिथुआनिया के बीच स्थित रूस का एक ऐसा छोटा सा इलाका (Exclave) है, जो चारों तरफ से नाटो सदस्यों से घिरा हुआ है और बाल्टिक सागर में रूस की सीधी नौसैनिक मौजूदगी का मुख्य केंद्र है। हाल के हफ्तों में नाटो बलों ने कलिनिनग्राद की सीमाओं के बिल्कुल पास बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास आयोजित किए हैं। रूस ने इन अभ्यासों को सीधा उकसावा करार देते हुए बाल्टिक सागर में अपनी परमाणु क्षमता वाली इस्कंदर मिसाइलों की तैनाती और नौसैनिक गश्त बढ़ा दी है।
इस तीखी जुबानी जंग के बाद पोलैंड, एस्टोनिया और बाल्टिक देशों ने अपनी सीमाओं पर अलर्ट बढ़ा दिया है। यूरोपीय संघ के अधिकारियों को डर है कि इस इलाके में हुई एक छोटी सी गलतफहमी भी नाटो और रूस के बीच सीधे युद्ध को भड़का सकती है। नाटो के अनुच्छेद 5 (Article 5) के तहत यदि किसी एक नाटो देश पर हमला होता है, तो पूरा गठबंधन युद्ध में कूद पड़ेगा, जिससे तीसरे विश्व युद्ध का खतरा मंडराने लगा है।
भारतीय परिपेक्ष्य में, रूस और नाटो के बीच बढ़ता यह तनाव भारत की विदेश नीति के लिए एक और संतुलन साधने की परीक्षा है। भारत के रूस के साथ ऐतिहासिक और मजबूत रणनीतिक व रक्षा संबंध हैं, जबकि पश्चिमी देशों के साथ भारत के आर्थिक व तकनीकी रिश्ते अत्यधिक गहराई में हैं। भारत हमेशा से ही इस बात पर कायम रहा है कि किसी भी विवाद का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि वार्ता और कूटनीति से होना चाहिए।
यदि यूरोपीय मोर्चे पर तनाव बढ़ता है, तो इससे वैश्विक खाद्यान्न, ऊर्जा और उर्वरक (Fertilizer) आपूर्ति श्रृंखला एक बार फिर बुरी तरह प्रभावित होगी, जिससे भारत जैसे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर सीधा दबाव पड़ेगा। भारत इस स्थिति में निष्पक्ष रहकर दोनों पक्षों से शांति की अपील कर रहा है और वैश्विक शांति वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए तत्पर है।
संक्षेप में, कलिनिनग्राद को लेकर उठी यह नई चिंगारी यूरोप में शांति के बचे-कुचे रास्तों को भी बंद कर सकती है। परमाणु महाशक्तियों के बीच यह सीधा गतिरोध पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है। भारत को अपने आर्थिक व कूटनीतिक हितों की रक्षा करते हुए रणनीतिक स्वायत्तता के रास्ते पर आगे बढ़ते रहना होगा।
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