जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तरी ध्रुव (आर्कटिक क्षेत्र) में सदी की सबसे तेजी से पिघलती बर्फ ने दुनिया के नक्शे पर एक नया भू-राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है। आर्कटिक के नीचे छिपे विशाल तेल, प्राकृतिक गैस, और दुर्लभ खनिजों के अटाह भंडार पर दावा ठोकने के लिए तटीय देशों (रूस, अमेरिका, कनाडा, नॉर्वे और डेनमार्क) के बीच भीषण प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है। इसके साथ ही, 'नॉर्दर्न सी रूट' (NSR) का खुलना अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
इस नए समुद्री मार्ग से यूरोप और पूर्वी एशिया के बीच की दूरी लगभग 40 प्रतिशत कम हो जाएगी, जिससे स्वेज़ नहर या मलक्का जलडमरूमध्य पर दुनिया की निर्भरता काफी कम हो सकती है। इसी रणनीति के तहत उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में नए सैन्य अड्डों की स्थापना, आइसब्रेकर जहाजों की तैनाती और गहरे समुद्र में ड्रिलिंग अभियानों को अभूतपूर्व गति दी जा रही है, जिसने पूरे आर्कटिक को सैन्यीकरण की ओर धकेल दिया है।
भारत के लिए आर्कटिक में हो रही यह हलचल दूर की कौड़ी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर प्रासंगिक है। भारत ने हाल के वर्षों में अपनी 'आर्कटिक नीति' की घोषणा की है और वह आर्कटिक काउंसिल में एक पर्यवेक्षक (Observer) देश है। भारत का मुख्य हित इस क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान से जुड़ा है, क्योंकि आर्कटिक के मौसम में आने वाले बदलावों का सीधा संबंध भारतीय मानसूनी चक्र और हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से है।
व्यापारिक दृष्टिकोण से, यदि नॉर्दर्न सी रूट पूरी तरह चालू हो जाता है, तो भारतीय मालवाहक जहाजों के लिए उत्तरी देशों तक माल पहुंचाना काफी सस्ता और तेज हो सकता है। इसके अतिरिक्त, भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए आर्कटिक के विशाल तेल और गैस भंडार एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकते हैं। भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की ऊर्जा कंपनियां पहले से ही रूस के सुदूर उत्तरी क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन परियोजनाओं में निवेश कर रही हैं।
हालांकि, भारत के सामने रणनीतिक चुनौती भी है। यदि आर्कटिक पर किसी एक महाशक्ति या गठबंधन का एकाधिकार हो जाता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र के स्वतंत्र संचालन (Freedom of Navigation) के नियमों के खिलाफ होगा। भारत का हमेशा से मानना रहा है कि आर्कटिक की प्राकृतिक संपदा पूरी मानवता की साझा विरासत (Global Commons) होनी चाहिए, न कि केवल कुछ तटीय देशों के नियंत्रण में।
जलवायु परिवर्तन का यह भयावह पहलू एक तरफ जहां पर्यावरण संकट उत्पन्न कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ संसाधनों की नई जंग को जन्म दे रहा है। भारत को इस ध्रुवीय कूटनीति में अपनी वैज्ञानिक और आर्थिक मौजूदगी को और मजबूत करना होगा ताकि वह भविष्य के इस सबसे बड़े ऊर्जा केंद्र में अपनी प्रभावी हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सके।
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