पश्चिम एशिया में भीषण युद्ध और लाल सागर के असुरक्षित होने के बीच ‘इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (IMEC) को पुनर्जीवित करने के लिए एक अभूतपूर्व कूटनीतिक हलचल शुरू हुई है। फ्रांस के विशेष दूत और भारतीय रणनीतिकारों के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठकों के बाद ओमान, मिस्र, ग्रीस और साइप्रस जैसे प्रमुख देशों ने इस महत्वाकांक्षी कॉरिडोर में शामिल होने के लिए सीधी रुचि दिखाई है।
पारंपरिक स्वेज नहर और लाल सागर के मार्गों पर लगातार मंडराते सुरक्षा खतरों के बीच यह वैकल्पिक गलियारा अब केवल एक बुनियादी ढांचा परियोजना नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार की जीवन रेखा बनने की ओर अग्रसर है। भारत के पश्चिमी तट से शुरू होकर अरब खाड़ी और यूरोप को जोड़ने वाले इस बहु-विध परिवहन नेटवर्क (Multi-modal Transport Network) को जल्द से जल्द चालू करने के लिए खाका तैयार किया जा रहा है।
व्यापारिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह कॉरिडोर पूरी क्षमता से शुरू होता है, तो भारत और यूरोप के बीच माल ढुलाई के समय में 40% की भारी कटौती होगी। साथ ही, माल ढुलाई की लागत में भी भारी कमी आएगी, जिससे स्वेज नहर की एकाधिकार वाली निर्भरता खत्म हो जाएगी।
हालांकि, इस मार्ग के मध्य-पूर्वी हिस्से (विशेषकर इज़राइल और जॉर्डन के रेलवे लिंक) में जमीनी संघर्ष एक बड़ा रोड़ा बने हुए हैं। इसी वजह से अब कॉरिडोर के 'ईस्टर्न लेग' (भारत से खाड़ी देश) और समुद्री रास्तों को पहले चरण में ही चालू करने की नई योजना पर काम चल रहा है।
ग्लोबल सप्लाई चेन को नया आकार देने वाला यह कॉरिडोर आने वाले दशक में वैश्विक व्यापार का नया धुरा साबित हो सकता है। यूरोपीय संघ और भारत की यह साझा पहल चीन की 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) को सीधी टक्कर देने के लिए पूरी तरह तैयार दिख रही है।
भारतीय परिपेक्ष्य:
यह विकास भारत की भू-राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को दुनिया में अभूतपूर्व मजबूती प्रदान करता है। भारत इस कॉरिडोर का शुरुआती बिंदु है, जिससे भारतीय विनिर्माण क्षेत्र और निर्यातकों को यूरोपीय बाजारों तक बहुत तेजी से और सस्ती दर पर पहुंच मिलेगी। चीन के बीआरआई (BRI) के मुकाबले भारत का यह मॉडल पारदर्शी और बहुपक्षीय है, जो भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) का निर्विवाद केंद्र बनाने में मदद करेगा।
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