Cult Current
राजनीति

जंतर-मंतर बना रणक्षेत्र: राजधानी में उबाल!

राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर एक बार फिर देश की सबसे बड़ी राजनीतिक हलचल और उग्र प्रदर्शन का केंद्र बन चुका है। चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विभिन्न संगठनों, छात्र यूनिटों (जैसे CJP और SFI) द्वारा बुलाए गए ‘जंतर-मंतर 2.0’ प्रदर्शन के आह्वान ने दिल्ली पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की नींद उड़ा दी है।

Ajay Poddar 'Anmol'
Ajay Poddar 'Anmol'
11 Oct 2026
Solar farm during sunset

लोकतंत्र की धमनियों पर पहरा: छावनी में बदला जंतर-मंतर

देश की राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर इन दिनों भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे भीषण, विस्फोटक और अभूतपूर्व उथल-पुथल का केंद्र बन चुका है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, विवादास्पद चुनावी और प्रशासनिक सुधारों (SIR) तथा चुनावी पारदर्शिता की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP), वामपंथी छात्र संगठनों (SFI, AISF) और विभिन्न विपक्षी दलों द्वारा आहूत 'जंतर-मंतर 2.0' महा-आंदोलन ने पूरे देश के प्रशासनिक ढांचे को हिला कर रख दिया है। इस विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार ने जिस कड़े सुरक्षा बंदोबस्त का सहारा लिया, उसने राजधानी को एक दुर्जेय सैन्य किले में तब्दील कर दिया है।

सड़कों पर केवल भारी पुलिस बल ही तैनात नहीं किया गया, बल्कि प्रदर्शनकारियों के वाहनों और मार्च को रोकने के लिए बेरिकेट्स के साथ-साथ खतरनाक स्पाइक स्ट्रिप्स (कील वाली पट्टियां) तक बिछा दी गईं। सुरक्षा एजेंसियों द्वारा उठाए गए इन अदम्य और कठोर कदमों ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता और विरोध के बीच की यह जंग अब एक निर्णायक मोड़ पर आ चुकी है। आम नागरिकों से लेकर देश भर से आए राजनीतिक कार्यकर्ताओं के दिलों में इस बात को लेकर भारी गुस्सा है कि आखिर एक लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने के अधिकार का इस प्रकार गला क्यों घोंटा जा रहा है।

राजधानी के भीतर प्रवेश के तमाम प्रमुख रास्तों को सील कर दिए जाने के बाद, हालात इतने बिगड़ गए कि दिल्ली के कई प्रमुख मेट्रो स्टेशनों को अनिश्चितकाल के लिए बंद करना पड़ा और यातायात व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई। आम जनता को ऑफिस जाने, अपने गंतव्य तक पहुंचने और रोजमर्रा के कामकाज को निपटाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। जगह-जगह लगे लंबे ट्रैफिक जाम और पुलिस की कड़े पहरे वाली चेकिंग ने दिल्ली की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है, जिससे हर आम आदमी के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या देश की राजधानी अब आम नागरिकों के लिए असुरक्षित होती जा रही है?

मुख्य नेताओं की ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां और पुलिसिया दमन

इस आंदोलन का सबसे सनसनीखेज और राजनीतिक भूचाल लाने वाला पहलू प्रमुख राष्ट्रीय चेहरों और छात्र नेताओं की बड़े पैमाने पर की गई गिरफ्तारियां और हिरासत है। CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके, सौरभ दास, आशुतोष रंका जैसे प्रमुख युवा नेताओं को पुलिस ने उस वक्त हिरासत में ले लिया जब वे इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए दिल्ली पहुंचे थे। इसके अलावा, तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन, राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास तथा CPI(M) और विभिन्न छात्र इकाइयों के शीर्ष नेताओं को भी दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा घेरा तोड़ते हुए हिरासत में ले लिया।

प्राप्त आधिकारिक और जमीनी रिपोर्टों के मुताबिक, दिल्ली भर में विभिन्न अभियानों के दौरान 5,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों, छात्रों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया और उन्हें शहर के अलग-अलग अस्थायी डिटेंशन सेंटरों में बस भरकर ले जाया गया। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि यह सीधे तौर पर तानाशाही का रवैया है, जहां आवाज़ उठाने वालों की स्वतंत्रता को जेल की सलाखों के पीछे कुचला जा रहा है। गिरफ्तार किए गए नेताओं को अलग-अलग गोपनीय स्थानों पर रखे जाने की खबरों ने राजनीतिक तापमान को और अधिक भड़का दिया है।

गिरफ्तारी के इस सिलसिले के बाद भी आंदोलन की आग ठंडी होने के बजाय और अधिक भड़क उठी है। CJP और अन्य छात्र संगठनों (जैसे SFI की संयुक्त सचिव आइशी घोष) ने दो टूक शब्दों में ऐलान कर दिया है कि भले ही उनके शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया हो, लेकिन यह युवा और जन-आंदोलन अपने तय रास्ते पर बिना रुके और बिना झुके आगे बढ़ता रहेगा। नेताओं की गैर-मौजूदगी में भी देश के कोने-कोने से युवा जंतर-मंतर की ओर कूच करने के लिए लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, जिससे पुलिस प्रशासन के पसीने छूटे हुए हैं।

कनॉट प्लेस में झड़पें और कनाट प्लेस का नया रणक्षेत्र

जब पुलिस ने जंतर-मंतर के मुख्य स्थल को पूरी तरह सील कर दिया और वहां किसी भी व्यक्ति के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, तो आंदोलनकारियों ने रणनीति बदलते हुए दिल्ली के दिल यानी कनॉट प्लेस (Connaught Place) और आसपास के व्यापारिक हubs को ही अपना नया विरोध स्थल बना लिया। देखते ही देखते कनॉट प्लेस के इन खुले परिसरों में छोटे-छोटे विरोध समूहों ('कई जंतर-मंतर' जैसी स्थिति) का प्रकटीकरण होने लगा, जिससे सुरक्षा बलों के होश उड़ गए।

इस दौरान स्थिति तब और अधिक हिंसक और तनावपूर्ण हो गई जब कनॉट प्लेस के इन इलाकों में कुछ दक्षिणपंथी समूहों और समर्थकों के लोग अचानक सामने आ गए। पुलिस कार्रवाई का समर्थन करने वाले इन समूहों और सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी झड़पें हुईं, हूटिंग हुई और प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने तथा कथित तौर पर पीछा करने की घटनाएं कैमरे में कैद हो गईं। इन वीडियो फुटेज और झड़पों के सामने आने के बाद देश की राजनीतिक फिज़ा में ज़बरदस्त उबाल आ गया है।

कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और अन्य विपक्षी दलों ने इन झड़पों की कड़ी निंदा करते हुए आरोप लगाया है कि सत्ताधारी पार्टी समर्थकों द्वारा पुलिस की मौजूदगी में विरोध प्रदर्शनकारियों पर हमले कराए जा रहे हैं, जो कानून के शासन पर सीधा तमाचा है। दूसरी तरफ, व्यापार मंडलों और स्थानीय दुकानदारों ने इस बात को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है कि इस प्रकार के लगातार टकराव और सड़कों पर हंगामे से उनके कारोबार की कमर टूट रही है और राजधानी की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट की दखल और आपातकालीन सुनवाई

जंतर-मंतर के इस पूरे संग्राम और दिल्लीभर में यातायात के ठप होने, मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद रहने तथा बड़े पैमाने पर लोगों की अवैध हिरासत के खिलाफ अब देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) का दरवाजा खटखटाया गया है। दिल्ली की बंदिशों, अघोषित परिवहन शटडाउन और पुलिस ज्यादतियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक अवमानना याचिका (Contempt Plea) के साथ-साथ बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिकाएं भी दायर की गई हैं।

अदालत ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए एक विशेष रविवार की सुनवाई (Sunday Special Hearing) तय की है, जिसमें यह तय किया जाएगा कि लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन और प्रशासन द्वारा जनता की आवाजाही रोकने के ये कदम कितने संवैधानिक हैं। मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं (जैसे OHCHR) ने भी दिल्ली में हो रही इन ताबड़तोड़ गिरफ्तारियों और हिरासत पर गहरी चिंता व्यक्त की है, जिसके जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का हवाला दिया है।

सर्वोच्च अदालत के इस हस्तक्षेप ने राजनीतिक गलियारों में एक नई उम्मीद जगाई है। एक तरफ जहाँ सरकार अपनी सुरक्षात्मक प्राथमिकताओं और कानून-व्यवस्था का हवाला दे रही है, वहीं दूसरी तरफ न्यायपालिका के इस रुख पर सबकी निगाहें टिकी हैं कि क्या वह नागरिकों के विरोध प्रदर्शन के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कोई कड़ा निर्देश जारी करती है या नहीं।

भारतीय परिप्रेक्ष्य: लोकतंत्र की साख और संस्थाओं की विश्वसनीयता का संकट

यह पूरा घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप और संस्थागत गरिमा के लिहाज से बेहद दूरगामी और गंभीर परिणाम देने वाला है। एक तरफ जहां निर्वाचन आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर आम जनता और राजनीतिक दलों के एक बड़े वर्ग द्वारा गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार द्वारा असहमति की हर एक आवाज़ को बलपूर्वक दबाने की प्रवृत्ति ने लोकतांत्रिक मूल्यों के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव आयोग और देश के मुख्य चुनाव आयुक्त की स्वायत्तता देश की रीढ़ मानी जाती रही है। जब जनता या युवा वर्ग इस संस्था की पारदर्शिता पर संदेह व्यक्त करते हुए सड़कों पर उतरता है, तो यह केवल एक प्रशासनिक असंतोष नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास का संकट होता है। ऐसे में, सरकार और प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह दमनकारी नीतियों के बजाय संवाद के रास्ते को अपनाए, ताकि देश की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल न हो।

इसके साथ ही, यह आंदोलन इस बात का भी प्रतीक है कि देश का युवा अब चुप बैठने वाला नहीं है। रोजगार, पारदर्शिता, स्वतंत्र चुनाव और संवैधानिक अधिकारों के मुद्दे पर यह युवा ऊर्जा आने वाले समय में देश की राजनीति की दिशा तय करने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाएगी। जंतर-मंतर की यह सुलगती आग यह स्पष्ट चेतावनी देती है कि लोकतंत्र की ताकत दमन से नहीं, बल्कि जनभावनाओं के प्रति संवेदनशीलता से ही सुरक्षित रह सकती है।

#JantarMantar2 #GyaneshKumar #ElectionCommission #CJPProtest #DelhiPolice #SupremeCourt #IndianPolitics #DemocracyCrisis #AbhijeetDipke #TMCDettained

लेखन– अजय पोद्दार "अनमोल"