दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) ने CUET के जरिए 60% सीटें भरीं। अदिति महाविद्यालय और भगिनी निवेदिता कॉलेज (BNC) में बाकी 40% सीटें खाली पड़ी हैं। इसलिए डीयू ने एक दुर्लभ कदम उठाया: उसने दोनों कॉलेजों को कक्षा 12वीं के बोर्ड अंकों के आधार पर प्रवेश लेने की अनुमति दी।
लगभग 2,000 सीटें खाली पड़ी थीं। क्यों? क्योंकि CUET शहरी, अंग्रेजी-प्रधान और कोचिंग से संचालित परीक्षा है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी छात्रों को कभी इसकी सही जानकारी ही नहीं मिली। बावना की एक छात्रा ने कहा, "हमारे शिक्षकों ने हमें कभी CUET के बारे में नहीं बताया।" एक अन्य छात्रा कला वर्ग (Humanities) के लिए आवेदन नहीं कर सकी क्योंकि उसके स्कूल में आर्ट्स विषय ही नहीं था।
यह केंद्रीकरण की सीमा को उजागर करता है। CUET का उद्देश्य कट-ऑफ की होड़ और "बोर्ड अंकों के पक्षपात" को समाप्त करना था। इसके बजाय, इसने एक नया पक्षपात पैदा कर दिया: उन छात्रों के खिलाफ जिनकी पहुँच टेस्ट कोचिंग और सही जानकारी तक नहीं है।
डीयू के अधिकारी ने साफ कहा: "बाहरी इलाकों के कॉलेजों को CUET के जरिए छात्र नहीं मिल रहे थे।" इसलिए समाधान स्थानीय स्तर पर जाना था। अदिति और BNC अब ऑनलाइन और ऑफलाइन बोर्ड अंकों के जरिए सीटें भर रहे हैं।
क्या यह पुरानी व्यवस्था पर लौटना है? नहीं। यह एक सुधार है। भारत इतना विविध है कि यहाँ केवल एक परीक्षा काम नहीं कर सकती। रामपुर की एक छात्रा, जिसके बोर्ड में 93% अंक हैं, लेकिन उसके पास CUET कोचिंग नहीं थी, उसे डीयू से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।
बड़ा सबक यह है: निष्पक्षता के लिए केवल एक प्रवेश परीक्षा से अधिक की आवश्यकता होती है। इसके लिए आउटरीच, क्षेत्रीय भाषा में अध्ययन सामग्री और कॉलेज-स्तरीय लचीलेपन की आवश्यकता है। सेंट स्टीफंस को साक्षात्कार लेने दें। BNC को बोर्ड अंकों का उपयोग करने दें। नॉर्थ कैंपस को CUET रखने दें।
केंद्रीकरण कुशल है। लेकिन शिक्षा कोई कारखाना नहीं है। जब 90%+ अंक वाले छात्र घर बैठे हों और 985 सीटें खाली रहें, तो व्यवस्था योग्यतावादी (meritocratic) नहीं रह जाती। यह यांत्रिक हो जाती है।
डीयू के इस प्रयोग को नीति बनना चाहिए: विशिष्ट क्षेत्रों की सेवा करने वाले कॉलेजों को अनुकूलन (adapt) करने की अनुमति दें। अन्यथा, हम बिना कक्षाओं के टॉपर पैदा करते रहेंगे।