सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सभी आर्द्रभूमियों को संरक्षण का विस्तार उत्तराखंड की आसन आर्द्रभूमि (वेटलैंड) पर अपने वर्ष 2024 के आदेश को देशव्यापी लागू करने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्टीकरण पर्यावरण कानून के दृष्टिकोण से एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कदम है। पूर्व में, न्यायालय ने कहा था कि आसन आर्द्रभूमि के 10 किलोमीटर के दायरे में खनन हेतु पूर्व वन्यजीव स्वीकृति आवश्यक है। अब यह नियम भारत भर के सभी आर्द्रभूमि संरक्षण रिजर्वों पर समान रूप से लागू होता है।
यह निर्णय महत्त्वपूर्ण क्यों है? क्योंकि भारतीय कानून में एक बड़ी रिक्ति (गैप) रही है। राष्ट्रीय उद्यानों के विपरीत, आर्द्रभूमियों के लिए कोई वैधानिक बफर ज़ोन (संवेदनशील क्षेत्र) निर्धारित नहीं है। वर्ष 2010 के आर्द्रभूमि नियमों को 2017 में शिथिल कर दिया गया था, जिससे राज्यों को अधिक शक्तियाँ प्राप्त हो गई थीं। इसका दुष्परिणाम तदर्थ (अस्थायी) और असंगत संरक्षण के रूप में सामने आया।
सर्वोच्च न्यायालय ने अब उस शून्य को भर दिया है। भारत में 101 रामसर स्थलों और सैकड़ों अन्य आर्द्रभूमियों की उपस्थिति को देखते हुए, इस निर्णय के व्यापक निहितार्थ हैं। अब 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाली किसी भी खनन परियोजना को राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड और पर्यावरण मंत्रालय से अनापत्ति स्वीकृति लेनी अनिवार्य होगी।
विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें तो यह दो 'भारतों' के मध्य संतुलन साधने का प्रयास है। एक भारत अवसंरचना, रोज़गार और खनिज संसाधन चाहता है; वहीं दूसरे भारत को जल सुरक्षा, बाढ़ नियंत्रण और जैव विविधता की आवश्यकता है। आर्द्रभूमियाँ इन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं—ये भूजल का पुनर्भरण (रीचार्ज) करती हैं और प्रवासी पक्षियों का आश्रय स्थल बनती हैं। अल्पकालिक खनन लाभ के लिए इन्हें नष्ट करना एक अत्यंत घटिया आर्थिक दृष्टिकोण है।
आलोचक यह तर्क देंगे कि इससे विकास की गति मंद पड़ जाएगी, जो कि आंशिक रूप से सत्य भी है। तथापि, पर्यावरण कानून का मुख्य उद्देश्य पारिस्थितिक लागतों का आंतरिकीकरण करना है। यदि कोई खान किसी आर्द्रभूमि को क्षति पहुँचाए बिना संचालित नहीं हो सकती, तो कदाचित् उसे वहाँ संचालित ही नहीं होना चाहिए।
यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के संदर्भ में भी एक स्पष्ट संदेश देता है। भारत रामसर संधि (Ramsar Convention) का एक हस्ताक्षरकर्ता देश है। संधियों पर हस्ताक्षर करना सरल है, किंतु उनका कार्यान्वयन दुष्कर होता है। यह आदेश राज्यों को धरातल पर कार्यवाही करने के लिए बाध्य करता है।
अब असली परीक्षा इसके कार्यान्वयन की होगी। राज्य सरकारों को आर्द्रभूमियों की सीमाओं को चिह्नित करना होगा और 10 किलोमीटर के नियम को कड़ाई से लागू करना होगा। इसके लिए मानचित्रण (मैपिंग), निरंतर निगरानी और सुदृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होगी।
फिलहाल के लिए, न्यायालय ने एक स्पष्ट सीमा रेखा खींच दी है। पारिस्थितिकी को गौण विचार या बाद का विषय नहीं माना जा सकता। जलवायु संकट से जूझ रहे देश में, आर्द्रभूमियों का संरक्षण कोई विलासिता नहीं है; यह हमारे अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न है।