वैश्विक कूटनीति का 'उत्तरायण': मदर ऑफ ऑल डील

संदीप कुमार

 |  02 Feb 2026 |   15
Culttoday

जनवरी 2026 की उन बर्फीली और ठिठुरती रातों के बीच, जब नई दिल्ली की रायसीना हिल्स गणतंत्र दिवस की भव्यता के आलोक में देदीप्यमान थी, तब वैश्विक कूटनीति के गलियारों में एक ऐसी ऊष्मा का संचार हो रहा था जिसने पिछले अठारह वर्षों की कूटनीतिक जड़ता को पिघला दिया। यह ऊष्मा थी—भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच उस 'मुक्त व्यापार समझौते' (एफटीए) की परिणति, जिसे इतिहास के पन्नों में एक 'वैचारिक और आर्थिक संक्रांति' के रूप में दर्ज किया जाएगा। 27 जनवरी 2026 को आसमान से बरसते बारिश की बूंदों के बीच यह तारीख केवल कैलेंडर का एक पन्ना नहीं, बल्कि भारतीय कूटनीति के 'मध्याह्न सूर्य' का उद्घोष थी। दो विशाल लोकतांत्रिक शक्तियों ने जब एक-दूसरे का हाथ थामकर उस संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसे यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने 'मदर ऑफ ऑल डील्स' (सभी समझौतों की जननी) की संज्ञा दी, तो वह केवल दो बाज़ारों का मिलन नहीं था, बल्कि भविष्य के एक नए बहुध्रुवीय विश्व-क्रम का शंखनाद था।
यह समझौता उस समय धरातल पर उतरा है जब वैश्विक व्यवस्था एक भयावह विखंडन के दौर से गुजर रही है। एक ओर अटलांटिक के पार से आने वाली हवाएं 'अमेरिका फर्स्ट' के कठोर और अप्रत्याशित संरक्षणवाद की कड़वाहट से भरी हैं, तो दूसरी ओर पूर्व का 'ड्रैगन' अपनी आर्थिक आक्रामकता और 'डेब्ट-ट्रैप कूटनीति' से दुनिया की आपूर्ति श्रृंखलाओं को बंधक बना रहा है। ऐसे में नई दिल्ली और ब्रुसेल्स का यह मिलन वैश्विक अर्थव्यवस्था के क्षितिज पर एक ऐसे प्रकाश-स्तंभ के समान है, जो न केवल स्थिरता का संदेश देता है, बल्कि यह भी सिद्ध करता है कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित साझा समृद्धि अब भी संभव है।
'उत्तरायण' का दार्शनिक और कूटनीतिक रूपक
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने जब इस समझौते पर हस्ताक्षर किए, तो उनके शब्दों में केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक और दार्शनिक अंतर्दृष्टि थी। उन्होंने इस समझौते की तुलना भारत के पवित्र पर्व 'मकर संक्रांति' से करते हुए एक अद्भुत रूपक गढ़ा। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की ओर देखते हुए कहा, 'आज नई दिल्ली में खड़े होकर मुझे भारत के उस प्राचीन ज्ञान की याद आ रही है जो सूर्य की गति में जीवन का दर्शन खोजता है। यह समझौता उस समय संपन्न हुआ है जब भारत सूर्य के उत्तरायण का उत्सव मना रहा है। जिस प्रकार सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर अंधकार को पराजित करता है और उत्तरी गोलार्ध में प्रकाश और ऊर्जा का विस्तार करता है, ठीक उसी प्रकार यह 'मदर ऑफ ऑल डील्स' भारत और यूरोप के संबंधों में अठारह वर्षों से व्याप्त संशय, जड़ता और बाधाओं के अंधकार को समाप्त कर एक नई ऊर्जा का संचार करेगी। आज से हमारे संबंध 'दक्षिणायन' के संकोच से निकलकर 'उत्तरायण' के आत्मविश्वास में प्रवेश कर चुके हैं।'
उर्सुला का यह रूपक अत्यंत मारक और सटीक था। 2007 से लेकर 2025 तक, यह वार्ता कूटनीति के 'हिमयुग' में फँसी रही। कभी यह कृषि और डेयरी के पेचीदा सवालों पर ठिठकी, तो कभी डेटा सुरक्षा, श्रम मानकों और बौद्धिक संपदा के चक्रव्यूह में उलझी रही। लेकिन जनवरी 2026 में, जैसे ही सूर्य ने अपनी दिशा बदली, वैसे ही दोनों पक्षों की कूटनीतिक इच्छाशक्ति ने उन सभी ऐतिहासिक अवरोधों को भस्म कर दिया। यह 'उत्तरायण' केवल खगोलीय नहीं, बल्कि वैचारिक था—जहां यूरोप ने यह स्वीकार किया कि भारत के बिना उसकी 'रणनीतिक स्वायत्तता' अधूरी है, और भारत ने यह पहचाना कि यूरोप उसकी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के लिए सबसे भरोसेमंद और स्थिर भागीदार है।
भू-राजनीतिक कुरुक्षेत्र
इस महा-संधि की गहराई को समझने के लिए हमें उस वैश्विक कुरुक्षेत्र का अवलोकन करना होगा जहां यह आकार ले रही है। वाशिंगटन में डोनाल्ड ट्रम्प की सत्ता में वापसी ने 'ट्रांस-अटलांटिक' और 'इंडो-पैसिफिक' संबंधों की सहजता को एक झटके में अनिश्चितता के भँवर में डाल दिया। ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल की 'आक्रामक टैरिफ नीति' ने भारत जैसे रणनीतिक सहयोगियों पर भी 50 प्रतिशत तक के भारी आयात शुल्क थोप दिए। अमेरिका का यह 'आर्थिक राष्ट्रवाद' यूरोप के लिए एक गहरे विश्वासघात के समान था, जो दशकों तक वाशिंगटन को अपना सुरक्षा कवच मानता रहा था। ट्रम्प की 'ग्रेसिया' और यूरोप के प्रति उनकी बेरुखी ने ब्रुसेल्स को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अब अटलांटिक के पार का उसका पुराना मित्र अब भरोसेमंद नहीं रहा।
इधर, चीन और रूस के बीच की 'सीमा-विहीन मित्रता' और बीजिंग की 'बेल्ट एंड रोड' पहल के माध्यम से यूरोप की आर्थिक घेरेबंदी ने ब्रुसेल्स के नीति-निर्माताओं की नींद उड़ा दी थी। यूरोप को अब यह आभास हो गया कि बीजिंग पर उसकी अत्यधिक निर्भरता उसकी संप्रभुता के लिए एक घातक 'ट्रोजन हॉर्स' सिद्ध हो सकती है। ऐसे में, भारत—जो 1.45 बिलियन की आबादी, 4.2 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी और विश्व की सबसे युवा कार्यबल का स्वामी है—यूरोप के लिए केवल एक बाज़ार नहीं, बल्कि एक 'अस्तित्वगत अनिवार्यता' बनकर उभरा।
यह समझौता भारत की कूटनीति का वह 'मास्टरस्ट्रोक' है, जिसने अमेरिका और चीन के द्वि-ध्रुवीय तनाव के बीच एक तीसरा ध्रुव खड़ा कर दिया है। 'मदर ऑफ ऑल डील्स' ने भारत को वह 'लीवरेज' प्रदान किया है, जिससे वह अब वाशिंगटन और बीजिंग दोनों की आंखों में आंखें डालकर अपनी शर्तों पर वैश्विक व्यापार का व्याकरण लिख सकता है। 

भू-राजनीतिक गठबंधन से आर्थिक समझौते से  तक

भारत-ईयू एफटीए की यात्रा किसी आधुनिक महाकाव्य के संघर्ष से कम नहीं रही। इसकी शुरुआत 2007 में हुई थी, लेकिन 2013 तक आते-आते यह वार्ताओं के बोझ तले दबकर कोमा में चली गई। मुख्य विवाद 'ऑटोमोबाइल' और 'शराब' पर भारत के उच्च शुल्कों और पेशेवरों की आवाजाही पर यूरोप के कड़े रुख को लेकर था। 2021 में पुर्तगाल के पोर्टो शिखर सम्मेलन में इसे पुनर्जीवित किया गया। अंततः, 2024-25 में वैश्विक व्यापार युद्ध की आहट और रूस-यूक्रेन संघर्ष ने दोनों पक्षों को 'व्यावहारिक समझौते'  के लिए विवश किया। अठारह वर्षों के इस 'कूटनीतिक वनवास' के बाद जब संधि पर हस्ताक्षर हुए, तो यह भारतीय मेधा और यूरोपीय धैर्य की सामूहिक विजय के रूप में सामने आई।
'मदर ऑफ ऑल डील्स' के लागू होने के साथ ही भारतीय उपभोक्ताओं के लिए 'यूरोपीय विलासिता' और यूरोपीय निर्माताओं के लिए 'भारतीय सामर्थ्य' के नए द्वार खुलेंगे।
1.    लग्जरी कारों का लोकतांत्रिकरण: भारत ने लंबे समय से अपने घरेलू ऑटो उद्योग को 100-110 प्रतिशत के भारी शुल्कों के पीछे सुरक्षित रखा था। इस संधि ने उस दीवार को ढहा दिया है। बीएमडब्ल्यू, ऑडी और मर्सिडीज जैसी कारें, जिनकी कीमत में आधा हिस्सा केवल टैक्स का होता था, अब 40 प्रतिशत शुल्क के साथ भारतीय सड़कों पर अधिक सुलभ होंगी। आने वाले समय में यह शुल्क 10 प्रतिशत तक आ जाएगा, जिससे भारत न केवल इन कारों का बाज़ार, बल्कि एक वैश्विक निर्माण केंद्र भी बनेगा। यह एलन मस्क जैसे वैश्विक दिग्गजों के लिए भी एक संदेश है कि भारत के द्वार अब 'नियम-आधारित व्यवस्था' के तहत सभी के लिए खुले हैं।
2.    प्रीमियम वाइन और स्पिरिट्स: फ्रांस के बोरदौ से लेकर इटली के टस्कनी और स्पेन के रियोजा तक के अंगूर के बागानों की महक अब भारतीय ड्राइंग रूम्स में अधिक सहजता से घुलेगी। 150 प्रतिशत के दमघोंटू शुल्क को घटाकर 20 प्रतिशत तक लाने का निर्णय यूरोपीय कृषि-निर्यातकों के लिए एक जैकपॉट है। इसके बदले में, भारत ने अपने कृषि उत्पादों के लिए सख्त यूरोपीय स्वच्छता मानकों में रियायतें प्राप्त की हैं। यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक नया अध्याय है, जहां खान-पान और जीवनशैली के माध्यम से दो सभ्यताएं करीब आएंगी।
3.    भारतीय परिधान और रत्न-आभूषण: भारत के कपड़ा, चमड़ा और रत्न-आभूषण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए यूरोप का बाज़ार अब एक 'खुला आसमान' है। अब तक बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों को मिलने वाले 'ड्यूटी-फ्री' लाभ के कारण भारतीय निर्यातक पिछड़ रहे थे, लेकिन अब शून्य शुल्क के साथ भारतीय 'मेक इन इंडिया' उत्पाद यूरोप के हर बुटीक और स्टोर की शोभा बढ़ाएंगे। इससे भारत में लाखों नए रोजगार सृजित होंगे, जो हमारे जनसांख्यिकीय लाभांश को हकीकत में बदलेंगे।
सेवाओं का सेतु और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर 
भारत की असली शक्ति उसकी मेधा और उसकी सेवा अर्थव्यवस्था में निहित है। 'मदर ऑफ ऑल डील्स' ने भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए यूरोप के 27 देशों में 'मोड-4' सेवाओं के तहत आसान वीज़ा और आवाजाही सुनिश्चित की है। भारत ने चतुरता के साथ 'डेटा सिक्योर' स्टेटस की मांग को इस संधि का हिस्सा बनाया है, जिससे भारतीय टेक कंपनियां अब बिना किसी कानूनी बाधा के यूरोपीय नागरिकों के डेटा को प्रोसेस कर सकेंगी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यूरोपीय संघ अब भारत के 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' (यूपीआई, ओएनडीसी, और आधार) को अपनाने में रुचि दिखा रहा है। अमेरिकी बिग-टेक कंपनियों के एकाधिकार को चुनौती देने के लिए यूरोप, भारत के ओपन-सोर्स डिजिटल मॉडल को एक विकल्प के रूप में देख रहा है। यह 'डिजिटल कूटनीति' भारत को एक 'सॉफ्ट पावर' से 'टेक्नोलॉजिकल पावर' में रूपांतरित कर रही है।
वहीं, 'बौद्धिक संपदा अधिकार' के मामले में भारत ने अपनी 'लोकहितकारी' छवि को अक्षुण्ण रखा है। यूरोपीय दवा कंपनियों की 'एवरग्रीनिंग' की कोशिशों के खिलाफ भारत ने अपनी जेनेरिक दवाइयों के हितों की रक्षा की है। यह न केवल भारतीय फार्मा उद्योग के लिए जीत है, बल्कि यह उस 'विश्व-मित्र' की भूमिका का भी निर्वाह है, जो पूरी दुनिया को सस्ती और जीवनरक्षक दवाएं उपलब्ध कराने के लिए संकल्पित है।
व्यापार से परे का सामरिक बंधन
यह समझौता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि 'रणनीतिक' भी है। चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की हालिया यात्रा और जर्मनी की 'थिसनक्रुप' कंपनी के साथ भारत में पनडुब्बियों के सह-निर्माण का 8 बिलियन यूरो का समझौता इस संधि की सुरक्षा-आधारित गहराई को दर्शाता है। यूरोप अब यह समझ चुका है कि चीन की हिंद-प्रशांत में बढ़ती आक्रामकता को रोकने के लिए भारत एक 'सुरक्षा प्रदाता'  की भूमिका में अनिवार्य है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की 'इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट' में भागीदारी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के वैश्विक मानकों को तय करने में भारत के साथ सहयोग, यह सिद्ध करता है कि 21वीं सदी की 'अल्गोरिथमिक जंग' में यूरोप और भारत एक ही पाले में खड़े हैं। अब तकनीक केवल सिलिकॉन वैली का एकाधिकार नहीं रहेगी; उसे अब 'लोकतांत्रिक मूल्यों' और 'मानवीय विवेक' की कसौटी पर परखा जाएगा, जिसमें भारत की भूमिका केंद्रीय होगी। 

 

सीबीएएम और 'ग्रीन' दीवार की कूटनीतिक काट

जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों में बढ़ती 'जनसांख्यिकीय मरुस्थलीकरण'  और भारत का 'जनसांख्यिकीय लाभांश' इस समझौते के पीछे का एक बड़ा चालक है। जर्मनी द्वारा भारतीय कुशल श्रमिकों के लिए वीजा कोटा 20,000 से बढ़ाकर 90,000 करना केवल एक शुरुआत है। यह समझौता सुनिश्चित करता है कि भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर, नर्स और शोधकर्ता अब यूरोप की अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा प्रदान करेंगे, जबकि भारत को 'रेमिटेंस' और वैश्विक अनुभव का लाभ मिलेगा। यह 'ब्रेन ड्रेन' की पुरानी अवधारणा को 'ब्रेन सर्कुलेशन'  में बदल रहा है।
नई दिल्ली—विश्व की नई और विश्वसनीय धुरी
27 जनवरी 2026 की वह शाम, जब नई दिल्ली के आकाश में गणतंत्र दिवस के जश्न की आतिशबाजी गूंज रही थी, तब भारत-यूरोपीय संघ के बीच हस्ताक्षरित यह महा-संधि उस आतिशबाजी से भी अधिक दीप्तिमान लग रही थी। प्रधानमंत्री मोदी और उर्सुला वॉन डेर लेयेन के बीच का वह हैंडशेक केवल दो नेताओं का मिलना नहीं था; वह दो महाद्वीपों के सामूहिक विवेक और साझी नियति का प्रकटीकरण था।
'मदर ऑफ ऑल डील्स' ने सिद्ध कर दिया है कि भारत अब वैश्विक भू-राजनीति का वह 'स्थिरता का लंगर'  है, जिसके बिना विश्व व्यवस्था का जहाज़ डगमगा सकता है। उर्सुला का 'मकर संक्रांति' और 'उत्तरायण' का रूपक आज चरितार्थ हो रहा है। भारत और यूरोप के संबंधों में अब वह संकोच नहीं है, वह झिझक नहीं है। अब यहाँ केवल और केवल 'साझा नियति' का बोध है।
यह संधि भारत को केवल एक आर्थिक महाशक्ति नहीं बनाएगी, बल्कि यह उसे उस 'नैतिक गुरु' के रूप में स्थापित करेगी जो खंडित होती दुनिया को जोड़ना जानता है। जिस प्रकार उत्तरायण के बाद सूर्य की किरणें प्रत्येक जीव को नई ऊर्जा देती हैं, उसी प्रकार यह समझौता भारत के मध्यम वर्ग, किसानों, उद्यमियों और युवाओं के जीवन में समृद्धि का नया प्रकाश लेकर आएगा।
अराजक होती दुनिया में, जहाँ ट्रंप का अमेरिका अपने खोल में सिमट रहा है और शी जिनपिंग का चीन विस्तारवाद की आग उगल रहा है, भारत और यूरोप की यह साझेदारी मानवता के लिए एक 'सुरक्षित गलियारा' है। यह संधि केवल 'मुनाफे' के लिए नहीं है; यह 'मूल्यों' की रक्षा के लिए है। 'मदर ऑफ ऑल डील्स' के इस शिलालेख पर जो इबारत लिखी गई है, वह आने वाली सदियों तक गूँजती रहेगी—कि जब दो विशाल लोकतंत्र हाथ मिलाते हैं, तो इतिहास की धारा अपनी दिशा बदल लेती है। नई दिल्ली अब केवल भारत की राजधानी नहीं, बल्कि एक ऐसी वैश्विक धुरी बन गई है, जहाँ से एक संतुलित, बहुध्रुवीय और समृद्ध विश्व का 'उत्तरायण' शुरू हो चुका है। यह २१वीं सदी के वैश्विक व्यापार का वह 'शंखनाद' है, जिसकी प्रतिध्वनि बर्लिन से ब्रुसेल्स और कच्छ से कामरूप तक सुनाई देगी।
 


Browse By Tags

RECENT NEWS

सीमा पर साजिश
अनवर हुसैन |  02 Feb 2026  |  7
भारत की अग्निपरीक्षा
संतोष कुमार |  02 Feb 2026  |  8
चीनी मुद्रा का टूटता भ्रम
ब्रैड डब्ल्यू. सेटसर |  02 Feb 2026  |  5
'कमल' का 'नवीन' अध्याय
जलज श्रीवास्तव |  02 Feb 2026  |  8
नाबार्ड सहकार हाट का हुआ विधिवत समापन
कल्ट करंट डेस्क |  21 Dec 2025  |  85
नौसेनाओं का नव जागरण काल
संजय श्रीवास्तव |  01 Dec 2025  |  104
SIR: प. बंगाल से ‘रिवर्स एक्सोडस’
अनवर हुसैन |  01 Dec 2025  |  84
पूर्वी मोर्चा, गहराता भू-संकट
संदीप कुमार |  01 Dec 2025  |  83
दिल्ली ब्लास्टः बारूदी त्रिकोण
संतोष कुमार |  01 Dec 2025  |  80
आखिर इस हवा की दवा क्या है?
संजय श्रीवास्तव |  01 Dec 2025  |  65
प्रेत युद्धः अमेरिका का भ्रम
जलज श्रीवास्तव |  30 Sep 2025  |  106
भारत के युद्धक टैंकःभविष्य का संतुलन
कार्तिक बोम्माकांति |  02 Sep 2025  |  134
To contribute an article to CULT CURRENT or enquire about us, please write to cultcurrent@gmail.com . If you want to comment on an article, please post your comment on the relevant story page.
All content © Cult Current, unless otherwise noted or attributed. CULT CURRENT is published by the URJAS MEDIA VENTURE, this is registered under UDHYOG AADHAR-UDYAM-WB-14-0119166 (Govt. of India)