महाराष्ट्रः वंशवाद का अवसान एवं 'भगवा' सूर्योदय
मनोज कुमार
| 02 Feb 2026 |
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भारत के पश्चिमी तट पर, अरब सागर की उत्तुंग लहरों से अठखेलियां करता और सह्याद्री की विशाल पर्वतमालाओं की ओट में बसा महाराष्ट्र, केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की सबसे जटिल और जीवंत प्रयोगशाला है। यह छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरभूमि है, जहां इतिहास तलवार की धार पर लिखा गया और राजनीति जनसेवा के संकल्प से पोषित हुई। किंतु, विडंबना देखिए कि पिछले कुछ दशकों में यह पुण्य भूमि चंद रसूखदार परिवारों की निजी जागीर बनकर रह गई थी। 'बारामती के पावर' से लेकर 'मातोश्री के आदेश' और 'दिल्ली दरबार (कांग्रेस)' की जी-हुजूरी—महाराष्ट्र की राजनीति इन्हीं तीन धुरों के इर्द-गिर्द घूमती रही।
परंतु, 15 जनवरी 2026 की सर्द हवाओं के बीच संपन्न हुए स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों ने इस पुरानी पटकथा को पूरी तरह से जलाकर राख कर दिया है। यह कोई सामान्य चुनाव नहीं था; यह 29 महानगर पालिकाओं, 893 वार्डों और 2,869 सीटों के लिए लड़ा गया एक महासमर था, जिसमें 3.48 करोड़ मतदाताओं—यानी लगभग एक यूरोपीय देश के बराबर की आबादी—ने अपने मताधिकार की आहुति दी। इन चुनावों में 29 में से 23 नगर निगमों पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का एकछत्र राज और देश की सबसे अमीर नगरपालिका—बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी)—पर फहराता भगवा ध्वज, केवल चुनावी आंकड़े नहीं हैं। यह एक उद्घोष है कि महाराष्ट्र अब वंशवाद, परिवारवाद और तुष्टिकरण की पुरानी बेड़ियों को तोड़कर 'न्यू इंडिया' के विजन के साथ कदमताल करने को तैयार है। यह एक 'साइलेंट रिवोल्यूशन' (मूक क्रांति) है, जिसने स्थापित क्षत्रपों के किलों को ढहा दिया है।
संवैधानिक मर्यादा का हनन और 'प्रशासक राज' का अंत
इस जनादेश का महत्व केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक भी है। इन चुनावों ने उस 'प्रशासक राज' का अंत किया है जिसने लोकतंत्र के मूल ढांचे को ही बंधक बना रखा था। संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 का अनुच्छेद 243यू(3) स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी भी नगरपालिका के कार्यकाल की समाप्ति से पहले या विघटन के छह महीने के भीतर चुनाव संपन्न हो जाने चाहिए। किंतु महाराष्ट्र में इस संवैधानिक प्रावधान की धज्जियां उड़ाई गईं।
मुंबई जैसी वैश्विक नगरी में मार्च 2022 से जनवरी 2026 तक—लगभग चार वर्षों तक—कोई निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं था। सत्ता की बागडोर राज्य द्वारा नियुक्त आईएएस अधिकारियों (प्रशासकों) के हाथ में थी। ओबीसी आरक्षण और वार्ड परिसीमन की कानूनी पेचीदगियों की आड़ में जनता की आवाज को दबा दिया गया था। अब, जब पुणे, नागपुर, ठाणे, नासिक और मुंबई में नई निर्वाचित निकाय का गठन हुआ है, तो यह संवैधानिक शून्यता समाप्त हुई है। हालांकि, यह जीत बीजेपी की है, लेकिन यह जीत उस संवैधानिक लोकतंत्र की भी है जो नौकरशाही के चंगुल से मुक्त होकर वापस जन-प्रतिनिधियों के पास लौटा है।
मराठा गढ़ में 'ब्राह्मण पेशवा' का उदय
महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे रोचक और ऐतिहासिक पहलू यह है कि जिस राज्य की सियासी नब्ज दशकों तक मराठा क्षत्रपों के हाथों में रही, आज वहां सत्ता का केंद्रबिंदु एक ब्राह्मण चेहरा—देवेंद्र फडणवीस—बनकर उभरा है। यशवंतराव चव्हाण से लेकर वसंतदादा पाटिल और शरद पवार तक, महाराष्ट्र की राजनीति का अलिखित संविधान यही था कि नेतृत्व की बागडोर केवल मराठा समुदाय के पास रहेगी। लेकिन, देवेंद्र फडणवीस ने अपनी चाणक्य-नीति, धैर्य और अथक परिश्रम से इस मिथक को चकनाचूर कर दिया है।
हालिया चुनावों में मिली अभूतपूर्व सफलता का सेहरा निर्विवाद रूप से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सिर बंधता है। वे अब केवल राज्य के नेता नहीं रहे, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद के दौर में भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की अगली कतार में—योगी आदित्यनाथ और अमित शाह के समकक्ष—मजबूती से खड़े दिखाई दे रहे हैं। फडणवीस की यह विजय यात्रा 'माधव' (माली, धनगर, वंजारी) फॉर्मूले और ओबीसी समुदायों के बीच उनकी गहरी पैठ का परिणाम है। उन्होंने हिंदुत्व के व्यापक छाते के नीचे उन सभी उपेक्षित वर्गों को एकजुट किया, जो दशकों से मराठा वर्चस्व के कारण हाशिए पर थे। यह सोशल इंजीनियरिंग का वह मास्टरस्ट्रोक था, जिसकी काट न तो शरद पवार के पास थी और न ही उद्धव ठाकरे के पास।
नगरीय स्वायत्तता का भ्रम व 'रिमोट कंट्रोल' की राजनीति
यद्यपि इन चुनावों ने नगरों में 'जन-प्रतिनिधियों' की वापसी कराई है, लेकिन हमें इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि इससे शहरों को वास्तविक स्वायत्तता मिल गई है। जैसा कि अंग्रेजी विश्लेषण में स्पष्ट है, भारत में—और विशेषकर महाराष्ट्र में—शहरी स्थानीय निकाय त्रि-स्तरीय ढांचे में काम करते हैं, लेकिन उनकी शक्ति अत्यंत सीमित है।
मुंबई का महापौर, जिसे शहर का 'प्रथम नागरिक' कहा जाता है और जिसके चुनाव को लेकर मीडिया में इतना कोलाहल मचता है, वास्तव में एक 'दंतहीन शेर' के समान है। बीएमसी अधिनियम की धारा 37 के तहत महापौर का चुनाव पार्षदों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से होता है। विकसित देशों के विपरीत, यहाँ महापौर के पास कार्यकारी शक्तियां नगण्य हैं। असली सत्ता 'म्यूनिसिपल कमिश्नर' के पास होती है, जो राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक आईएएस अधिकारी होता है।
बीजेपी की यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 'स्टैंडिंग कमेटी' (स्थायी समिति)—जो टेंडर और बजट पास करती है—अब पार्टी के नियंत्रण में होगी। लेकिन शहर का विकास मसौदा, एफएसआई के नियम और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का अंतिम निर्णय मंत्रालय (राज्य सरकार) के पास ही सुरक्षित रहता है। चूंकि राज्य में भी देवेंद्र फडणवीस की सरकार है और अब निगमों में भी बीजेपी का बहुमत है, इसलिए यह 'डबल इंजन' की सरकार शहरों के विकास को नई गति दे सकती है। लेकिन यह भी सत्य है कि यह 'स्थानीय चुनाव' महज एक नाम था; असल में यह राष्ट्रीय और राज्य दलों के बीच स्थानीय बिसात पर लड़ा गया महायुद्ध था, जिसमें स्थानीय मुद्दे कहीं पीछे छूट गए और चेहरे 'मोदी-फडणवीस' के ही सामने रहे।
बारामती का ढहता बुर्ज और 'पवार प्लेबुक' का अंत
कभी पश्चिम महाराष्ट्र को 'शुगर बेल्ट' (चीनी का कटोरा) कहा जाता था, जिसकी मिठास केवल पवार परिवार और उनके सहयोगियों की तिजोरियों तक सीमित थी। सहकारी समितियों, चीनी मिलों और जिला बैंकों के नेटवर्क के माध्यम से शरद पवार ने जो अभेद्य किला बनाया था, वह आज ताश के पत्तों की तरह बिखर चुका है।
एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) के दोनों धड़ों—चाचा शरद पवार और भतीजे अजित पवार—का अपने ही गढ़ पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ में सफाया हो जाना, एक युग के अंत का संकेत है। यह केवल चुनावी हार नहीं है; यह उस सामंती मानसिकता की हार है, जो मानती थी कि किसान और ग्रामीण जनता उनकी बंधुआ है। टिकटों के लिए हुई लॉबिंग और दलबदल ने यह साबित कर दिया कि विचारधारा अब गौण है; सत्ता ही परम सत्य है। बीजेपी ने बहुत ही रणनीतिक तरीके से सहकारिता क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार पर प्रहार किया और मराठा समुदाय के भीतर भी एक नए नेतृत्व को खड़ा किया।
अजित पवार, जिनकी 28 जनवरी को एक विमान हादसे में मृत्यु हो गई, उन्हें कभी शरद पवार का स्वाभाविक उत्तराधिकारी और मराठा राजनीति का 'बाहुबली' माना जाता था, आज उनकी मृत्यु के बाद पार्टी के भविष्य को लेकर धुंध झा गई है, हालांकि उनके पुत्र भी राजनीति में है तो क्या पार्टी की कमान नई पीढ़ी संभालेगी या फिर शरद पवार के गुट के साथ विलय होगा, यह तो समय बताएगा। दूसरी ओर शरद पवार अपने राजनीतिक जीवन की संध्या बेला में यह देखने को विवश हैं कि जिस साम्राज्य को उन्होंने 50 वर्षों में खड़ा किया था, वह उनकी आँखों के सामने ढह रहा है।
मातोश्री का सूनापन और मुंबई का नया मिजाज
मुंबई—सपनों का शहर, भारत की आर्थिक राजधानी और कभी बाल ठाकरे की हुंकार से थम जाने वाला महानगर। तीन दशकों तक बीएमसी पर ठाकरे परिवार का कब्जा था। 'मातोश्री' से निकला एक आदेश मुंबई की सड़कों के लिए कानून बन जाता था। लेकिन 2026 के चुनाव परिणामों ने सिद्ध कर दिया है कि मुंबईकर अब भावनात्मक ब्लैकमेलिंग से ऊब चुके हैं।
बीजेपी का बीएमसी पर कब्जा, भले ही एकनाथ शिंदे गुट की मदद से हुआ हो, लेकिन यह उद्धव ठाकरे के लिए एक अस्तित्वगत संकट है। धारा 36 के तहत महापौर की जिम्मेदारी केवल मासिक बैठक बुलाने तक सीमित है, लेकिन इसका प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा है। बीजेपी की रणनीति थी कि वह उद्धव ठाकरे और उनकी शिवसेना को उसी तरह खत्म कर देगी, जैसे उसने पश्चिम महाराष्ट्र में पवारों को किया। हालाँकि, उद्धव ने मराठी अस्मिता के कोर वोट बैंक को कुछ हद तक बचाए रखा, लेकिन सत्ता की चाबी अब उनके हाथ से फिसल चुकी है।
मुंबई की राजनीति अब भी अनिश्चितताओं के भंवर में है। शिंदे गुट, जो बीजेपी के साथ है, मलाईदार पदों के लिए सौदेबाजी कर रहा है। यह गठबंधन 'विचारधारा' का कम और 'लेन-देन' का ज्यादा है। फिर भी, यह सत्य अटल है कि मुंबई अब ठाकरे परिवार की निजी जागीर नहीं रही। समंदर की लहरों ने पुरानी वफादारियों की रेत को धो डाला है।
कांग्रेस का विलोपन और ओवैसी का उभार
महाराष्ट्र, जो कभी कांग्रेस का अभेद्य दुर्ग था, आज वहां कांग्रेस पार्टी वेंटिलेटर पर है। 29 में से अधिकांश नगर निगमों में कांग्रेस तीसरे या चौथे नंबर की पार्टी बनकर रह गई है। उसकी जगह अब एक नई और आक्रामक शक्ति ने ले ली है—असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम।
स्थानीय चुनावों में एआईएमआईएम द्वारा 121 सीटें जीतना, जिनमें मुंबई की 8 सीटें शामिल हैं, एक खतरे की घंटी है। यह दर्शाता है कि मुस्लिम मतदाता अब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के 'सॉफ्ट सेक्युलरिज्म' से मोहभंग कर चुके हैं। वे अब अपनी पहचान की राजनीति को मुखरता से रखने वाले ओवैसी में अपना भविष्य देख रहे हैं। यह ध्रुवीकरण बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है, लेकिन सामाजिक ताने-बाने के लिए चिंताजनक है।
2029 का क्षितिज और निष्कर्ष
जनवरी 2026 में खड़े होकर जब हम महाराष्ट्र की इस नई राजनीतिक तस्वीर को देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राज्य 'रीसेट मोड' में है। बीजेपी ने न केवल देश की आर्थिक राजधानी पर कब्जा किया है, बल्कि उत्तर प्रदेश के बाद देश के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक राज्य (48 लोकसभा सीटें) में अपनी जड़ें पाताल तक गहरी कर ली हैं।
यह जीत केवल नरेंद्र मोदी के करिश्मे की नहीं, बल्कि देवेंद्र फडणवीस के जमीनी प्रबंधन, संवैधानिक अंतरालों (जैसे प्रशासक राज) को भरने की रणनीति और विपक्ष के नैतिक पतन की भी कहानी है। यह चुनाव भले ही 'स्थानीय' कहे गए हों, लेकिन इनकी गूंज राष्ट्रीय है। इसने साबित कर दिया है कि स्थानीय निकाय, जो अक्सर राज्य सरकार की कठपुतली माने जाते हैं, राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुके हैं। आने वाले समय में महाराष्ट्र की राजनीति में और अधिक उथल-पुथल देखने को मिलेगी। सहकारिता क्षेत्र का पूरा ढांचा बदलेगा, शिक्षा और रोजगार के नए केंद्र बनेंगे, और मराठा आरक्षण जैसे मुद्दों की जगह 'विकासवादी हिंदुत्व' लेगा। 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों की बिसात अभी से बिछ चुकी है।