भारत की अग्निपरीक्षा
मनोज कुमार
| 02 Feb 2026 |
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इतिहास की घड़ी में 1 जनवरी, 2026 की तारीख केवल एक कैलेंडर बदलने की घटना नहीं थी, बल्कि यह वैश्विक भू-राजनीति में एक युगांतरकारी बदलाव का संकेत थी। जी-20 के सफल और ऐतिहासिक आयोजन के बाद, जब भारत ने 'ब्रिक्स' की अध्यक्षता का दायित्व संभाला, तो यह स्पष्ट हो गया कि विश्व व्यवस्था अब पुरानी धुरी पर घूमने को तैयार नहीं है। यह समय एक संक्रमण काल है—एक ऐसा दौर जहां बहुध्रुवीयता का जन्म हो रहा है, लेकिन प्रसव पीड़ा अत्यंत तीव्र है। महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता चरम पर है, बहुपक्षवाद की आत्मा कराह रही है और एकतरफावाद का राक्षस फिर से सिर उठा रहा है।
ऐसे विषम समय में, भारत के हाथों में ब्रिक्स की कमान केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि 'ग्लोबल साउथ' के स्वाभिमान की रक्षा का एक वज्र-संकल्प है। नई दिल्ली के सामने चुनौती दोहरी है - एक तरफ उसे ब्रिक्स के विस्तारित कुनबे को एकजुट रखना है, तो दूसरी तरफ वाशिंगटन में बैठी उस सत्ता से निपटना है जो व्यापार और संस्थानों को हथियार बनाने पर आमादा है। 2026 का यह वर्ष भारत के लिए केवल अध्यक्षता का वर्ष नहीं, बल्कि एक 'धर्मयुद्ध' है—न्याय, समानता और वैश्विक लोकतंत्र की स्थापना के लिए।
'अमेरिका फर्स्ट' बनाम 'मानवता प्रथम'
वर्ष 2026 के क्षितिज पर जो सबसे बड़ा विरोधाभास उभरकर सामने आया है, वह है दो विपरीत विचारधाराओं का टकराव। एक ओर वाशिंगटन है, जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का 'अमेरिका फर्स्ट' का नारा फिर से गूंज रहा है, जो संरक्षणवाद, टैरिफ युद्ध और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के तिरस्कार पर आधारित है। दूसरी ओर नई दिल्ली है, जो 'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'मानवता प्रथम' के ध्वज के साथ खड़ी है।
विडंबना देखिए कि 2026 में ही अमेरिका जी-20 की अध्यक्षता भी कर रहा है। यह संयोग एक रणनीतिक कुरुक्षेत्र का निर्माण करता है। पिछले चार वर्षों से जी-20 का नेतृत्व विकासशील देशों के पास था, जिसने वैश्विक विमर्श के केंद्र में गरीबी, असमानता और जलवायु न्याय को ला खड़ा किया था। लेकिन अब खतरा यह है कि वाशिंगटन जी-20 के मंच का उपयोग अपने संकीर्ण हितों को साधने और 'ग्लोबल साउथ' की आवाज को दबाने के लिए कर सकता है।
ऐसे में, भारत के नेतृत्व में ब्रिक्स ही वह एकमात्र किला है जो विकासशील देशों के हितों की रक्षा कर सकता है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और ऋण संकट जैसे मुद्दे, जिन्हें अमेरिका अपनी कार्यसूची से बाहर धकेलना चाहता है, वे ब्रिक्स के माध्यम से वैश्विक पटल पर जीवित रहें। यह नरेटिव का युद्ध है, और भारत को इसमें पीछे नहीं हटता है।
आर्थिक संप्रभुता पर प्रहार और ब्रिक्स का 'कवच'
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने स्पष्ट कर दिया है कि वे ब्रिक्स को अमेरिकी हितों के लिए खतरा मानते हैं। 'डॉलर के वर्चस्व' को चुनौती देने वाले किसी भी प्रयास पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की उनकी धमकी एक आर्थिक ब्लैकमेल से कम नहीं है। ओबामा और बाइडेन प्रशासन जहां ब्रिक्स के प्रति सतर्क थे, वहीं ट्रम्प प्रशासन खुले तौर पर शत्रुतापूर्ण है।
भारत के लिए यह स्थिति एक कूटनीतिक रस्साकशी है। भारत नहीं चाहता कि ब्रिक्स एक 'पश्चिम-विरोधी' गुट बने, लेकिन वह यह भी सहन नहीं कर सकता कि उसकी या उसके भागीदारों की आर्थिक संप्रभुता को कुचला जाए। भारत की अध्यक्षता का मूल मंत्र—'सहयोग और स्थिरता के लिए लचीलापन और नवाचार'—इसी चुनौती का उत्तर है।
भारत को ब्रिक्स के मंच का उपयोग करके सदस्य देशों के बीच आपसी व्यापार को इतना सुदृढ़ करना होगा कि अमेरिकी टैरिफ का असर बेअसर हो जाए। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन और ब्रिक्स के भीतर व्यापारिक बाधाओं को कम करना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह दुनिया को दिखाए कि 'नियम-आधारित व्यापार' का असली रक्षक कौन है—संरक्षणवादी अमेरिका नहीं, बल्कि बहुपक्षवादी भारत।
जलवायु न्याय: पश्चिम के पाखंड का पर्दाफाश
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के एजेंडे में जलवायु परिवर्तन शिखर पर है, लेकिन यह पश्चिमी चश्मे से देखा जाने वाला जलवायु विमर्श नहीं है। भारत की दृष्टि 'जलवायु न्याय' पर टिकी है। पश्चिम चाहता है कि विकासशील देश अपने विकास की कीमत पर उत्सर्जन कम करें, जबकि ऐतिहासिक रूप से प्रदूषण फैलाने वाले देश अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं।
भारत ने 2028 में COP33 की मेजबानी का दावा पेश किया है, जिसे ब्रिक्स भागीदारों का समर्थन प्राप्त है। यह महज एक आयोजन की दावेदारी नहीं है, बल्कि जलवायु विमर्श की दिशा को मोड़ने का प्रयास है। भारत चाहता है कि ध्यान केवल 'उत्सर्जन लक्ष्य' पर न हो, बल्कि 'विकास-केंद्रित जलवायु कार्रवाई' पर हो। ग्लोबल साउथ के लिए ऊर्जा संक्रमण न्यायसंगत होना चाहिए, और इसके लिए वित्तपोषण की जिम्मेदारी विकसित देशों को उठानी होगी। ब्रिक्स के मंच से भारत की यह हुंकार पश्चिम के कानों तक स्पष्ट रूप से पहुंचनी चाहिए।
संस्थानों का सुधार: बहिष्कार नहीं, परिष्कार
जहां ट्रम्प प्रशासन वैश्विक संस्थानों (संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, डब्ल्यूटीओ) को कमजोर या ध्वस्त करने की मंशा रखता है, वहीं भारत का दृष्टिकोण 'सुधार' का है। भारत मानता है कि ये संस्थान पुराने हो चुके हैं, लेकिन इनका विकल्प अराजकता नहीं हो सकती। भारत की अध्यक्षता का लक्ष्य इन संस्थानों में ग्लोबल साउथ को उचित प्रतिनिधित्व दिलाना है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का प्रश्न हो या आईएमएफ में कोटे का सुधार—भारत ब्रिक्स की सामूहिक शक्ति का उपयोग करके पश्चिम के एकाधिकार को चुनौती देगा। भारत का संदेश साफ है: हम व्यवस्था को तोड़ना नहीं चाहते, हम उसे लोकतांत्रिक बनाना चाहते हैं।
आतंकवाद और दोहरे मानदंड
आतंकवाद के मुद्दे पर ब्रिक्स का इतिहास केवल घोषणाओं तक सीमित रहा है। चीन जैसे देश अपने रणनीतिक मोहरे पाकिस्तान को बचाने के लिए ब्रिक्स के मंच का दुरुपयोग करते रहे हैं। लेकिन भारत ने अपनी पिछली अध्यक्षताओं में आतंकवाद को एक साझा खतरे के रूप में स्थापित करने में सफलता पाई है।
2026 में भी, भारत से यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि वह चीन का ह्रदय परिवर्तन कर देगा, लेकिन भारत ब्रिक्स को आतंकवाद के खिलाफ एक 'मानक स्थापित करने वाला' मंच जरूर बना सकता है। भारत को आक्रामक रूप से यह बात रखनी होगी कि आतंकवाद पर 'चयनात्मक दृष्टिकोण' अब नहीं चलेगा। यदि ब्रिक्स को प्रासंगिक बने रहना है, तो उसे अपने सदस्य देशों की सुरक्षा चिंताओं का सम्मान करना होगा।
विस्तारित कुनबा और भारत का संतुलनकारी दायित्व
2023 के बाद से ब्रिक्स का विस्तार हुआ है। ईरान, मिस्र, इथियोपिया, यूएई और इंडोनेशिया (संभावित भागीदार) जैसे देशों के जुड़ने से समूह का वजन बढ़ा है, लेकिन साथ ही आंतरिक सामंजस्य की चुनौती भी खड़ी हुई है। चीन चाहता है कि इस विस्तार का उपयोग अपने भू-राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने और ब्रिक्स को एक चीन-केंद्रित गुट बनाने में करे।
यहीं पर भारत की भूमिका निर्णायक हो जाती है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि ब्रिक्स का विस्तार 'सहमति' के आधार पर हो, न कि किसी एक देश की महत्वाकांक्षा के आधार पर। भारत को पुराने और नए सदस्यों के बीच हितों का सामंजस्य बिठाना होगा। ब्रिक्स की मूल पहचान एक 'आर्थिक मंच' और 'ग्लोबल साउथ की आवाज' के रूप में है, और भारत को इसे किसी भी कीमत पर एक 'भू-राजनीतिक सैन्य गुट' बनने से रोकना होगा। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता इसी संतुलन में निहित है।
विश्वगुरु की भूमिका में भारत
कुल मिलाकर, 2026 में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता कांटों का ताज है, लेकिन यही वह अवसर है जब भारत अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवा सकता है। वाशिंगटन की 'हथियारबंद कूटनीति' के सामने नई दिल्ली की 'सृजनात्मक कूटनीति' की परीक्षा है।
भारत को न तो अमेरिका से सीधा टकराव मोल लेना है और न ही चीन के सामने झुकना है। उसे 'बुद्ध के मध्यम मार्ग' और 'चाणक्य की कूटनीति' का मिश्रण अपनाना होगा। भारत का लक्ष्य आधिपत्य नहीं, बल्कि 'समानता' और 'साझा कल्याण' है।
अगर भारत ब्रिक्स के माध्यम से ग्लोबल साउथ को एक सूत्र में पिरोकर, ट्रम्प की टैरिफ दीवारों के पार व्यापार के नए रास्ते खोज सकता है और जलवायु न्याय की मशाल को जलते रख सकता है, तो 2026 का वर्ष इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगा। यह वह वर्ष होगा जब दुनिया ने देखा कि कैसे एक राष्ट्र ने अपनी सभ्यतागत मूल्यों के बल पर 'शक्ति के अहंकार' को 'सहयोग के संस्कार' से पराजित किया। भारत अब केवल एक उभरती शक्ति नहीं, बल्कि एक 'ध्रुव तारा' है, जिसकी ओर पूरी दुनिया आशा भरी निगाहों से देख रही है।