सीमा पर साजिश

मनोज कुमार

 |  02 Feb 2026 |   7
Culttoday

हमने देखा-सुना है कि जब-जब पड़ोसी के घर में आग लगती है, उसकी तपिश हमारी दीवारों तक जरूर पहुंचती है। लेकिन जब पड़ोसी खुद ही अपने घर को बारूद के ढेर में तब्दील करने पर आमादा हो जाए, तो सतर्कता ही एकमात्र बचाव नहीं, बल्कि आक्रामकता ही एकमात्र विकल्प बचती है। बांग्लादेश, जिसे 1971 में भारतीय रक्त ने सींचकर एक स्वतंत्र राष्ट्र का अस्तित्व दिया था, आज उसी भारत की सुरक्षा के लिए एक नासूर बनता जा रहा है। ढाका की सत्ता के गलियारों में जो खेल खेला जा रहा है, वह अब केवल कूटनीतिक 'संतुलन' का मामला नहीं रहा; यह एक सुनियोजित और खतरनाक 'रणनीतिक विश्वासघात' है।
मुहम्मद यूनुस, जिन्हें पश्चिम ने कभी 'गरीबों का मसीहा' और 'शांति का दूत' बताकर नोबेल पुरस्कार से नवाजा था, आज अपनी सत्ता को बचाने और भारत-विरोधी एजेंडे को हवा देने के लिए बांग्लादेश को चीन और पाकिस्तान की गोद में लगभग बिठा चुके हैं। यह केवल एक दिशाहीन नेतृत्व की कहानी नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र पर एक नई और जहरीली लकीर खींचने की साजिश है, जहां वाशिंगटन की चेतावनी को अनसुना कर ढाका अब बीजिंग के 'कर्ज-जाल' और रावलपिंडी के 'जिहादी-सैन्य गठजोड़' में फंसता जा रहा है।
चीन-पाक धुरी: ढाका का नया 'किबला'
बांग्लादेश में अमेरिकी राजदूत ब्रेंट क्रिस्टेंसन की हालिया चेतावनी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। जब एक महाशक्ति का राजदूत सार्वजनिक रूप से यह कहे कि चीनी सैन्य उपकरणों की खरीद किसी देश की संप्रभुता के लिए दीर्घकालिक खतरा है, तो इसे केवल कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि खतरे की घंटी माना जाना चाहिए। लेकिन यूनुस प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। इसके विपरीत, ढाका ने अपनी वफादारी का रुख स्पष्ट कर दिया है—और वह रुख नई दिल्ली या वाशिंगटन की ओर नहीं, बल्कि बीजिंग और इस्लामाबाद की ओर है।
यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश अब उस 'चीन-पाक धुरी' का तीसरा पहिया बनने को आतुर है, जिसका एकमात्र उद्देश्य भारत को घेरना है। जिस पाकिस्तान ने 1971 में 30 लाख बंगालियों का नरसंहार किया, आज उसी पाकिस्तान के साथ यूनुस प्रशासन रक्षा सौदे कर रहा है। यह न केवल बांग्लादेश के इतिहास के साथ गद्दारी है, बल्कि भारत के लिए एक गंभीर सुरक्षा चुनौती भी है।
सैन्य आधुनिकता के नाम पर 'सामरिक दासता'
ढाका की हालिया गतिविधियां किसी स्वतंत्र राष्ट्र के रक्षा आधुनिकरण जैसी नहीं, बल्कि एक 'क्लाइंट स्टेट' बनने की तैयारी जैसी लग रही हैं। बांग्लादेश वायु सेना के लिए चीन से चौथी पीढ़ी के J-10C फाइटर जेट्स और पाकिस्तान से JF-17 थंडर (जो असल में चीनी तकनीक का ही पाकिस्तानी संस्करण है) खरीदने की बातचीत अंतिम चरण में है।
यहां यह समझना आवश्यक है कि रक्षा सौदे कभी भी 'वन-टाइम ट्रांजैक्शन' नहीं होते। जब आप किसी देश से लड़ाकू विमान खरीदते हैं, तो आप केवल मशीन नहीं खरीदते; आप अगले 30-40 वर्षों के लिए उस देश की 'सामरिक दासता' स्वीकार करते हैं। स्पेयर पार्ट्स, सॉफ्टवेयर अपग्रेड, मेंटेनेंस और पायलट ट्रेनिंग—हर चीज के लिए ढाका को अब बीजिंग और रावलपिंडी के सामने हाथ फैलाना होगा।
सोचिए, जिस बांग्लादेश की वायु सेना को भारत ने अपने पैरों पर खड़ा किया, उसके हवाई अड्डों पर अब चीनी इंजीनियर और पाकिस्तानी वायु सेना के प्रशिक्षक डेरा जमाएंगे। बांग्लादेश के प्रिंसिपल स्टाफ ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल एस.एम. कामरुल हसन की चीनी और पाकिस्तानी समकक्षों के साथ लगातार बैठकें यह संकेत दे रही हैं कि ढाका अब अपनी सुरक्षा की चाबी भारत के दुश्मनों को सौंपने जा रहा है। पाकिस्तान द्वारा 'सुपर मुश्शक' ट्रेनर विमानों की फास्ट-ट्रैक डिलीवरी का वादा और चीन के साथ गुप्त समझौते यह बताते हैं कि यूनुस भारत की सीमाओं पर एक शत्रुतापूर्ण सैन्य पारिस्थितिकी तंत्र तैयार कर रहे हैं।
भारत के लिए 'लक्ष्मण रेखा'
सैन्य खरीद से भी ज्यादा चिंताजनक विषय है चीन की ढाका में ढांचागत घुसपैठ। यूनुस प्रशासन की प्रमुख सलाहकार सैयदा रिजवाना हसन का यह बयान कि 'चीन तीस्ता नदी मास्टर प्लान पर जल्द से जल्द काम शुरू करने को उत्सुक है,' भारत के लिए खतरे की सबसे बड़ी घंटी है।
रंगपुर का वह इलाका, जहां चीन इस प्रोजेक्ट को अंजाम देना चाहता है, भारत के 'चिकन नेक' (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) के बेहद करीब है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की वह पतली गर्दन है जो पूर्वोत्तर भारत को शेष देश से जोड़ती है। अगर चीन को तीस्ता परियोजना के बहाने वहां अपने सर्विलांस रडार, इंजीनियर और उपकरण तैनात करने का मौका मिल गया, तो यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक अस्तित्वगत खतरा होगा।
यह परियोजना विकास के नाम पर एक रणनीतिक अतिक्रमण है। दक्षिण में पेकुआ में चीनी पनडुब्बी बेस का निर्माण और अब उत्तर में तीस्ता प्रोजेक्ट—यह स्पष्ट है कि चीन बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत को 'दो मोर्चे'  पर घेरने के लिए कर रहा है। और यूनुस? वे अपनी सत्ता बचाने के लिए भारत की सुरक्षा को गिरवी रखने में जरा भी संकोच नहीं कर रहे।
ट्रम्प-विरोधी यूनुस और अमेरिका की लाचारी
इस पूरे समीकरण में एक दिलचस्प और खतरनाक पहलू मुहम्मद यूनुस की राजनीतिक विचारधारा है। यूनुस को अमेरिका में डेमोक्रेट्स और क्लिंटन परिवार का करीबी माना जाता है। वे डोनाल्ड ट्रम्प के कट्टर विरोधी रहे हैं। अब जब वाशिंगटन में ट्रम्प प्रशासन सत्ता में है या प्रभाव में है, तो यूनुस को पता है कि अमेरिका उन पर दबाव डालेगा। इसीलिए, अमेरिकी दबाव को संतुलित करने के लिए यूनुस चीन की गोद में जा बैठे हैं। जब अमेरिकी राजदूत ने चेतावनी दी, तो ढाका स्थित चीनी दूतावास ने जिस आक्रामकता के साथ पलटवार किया, वह अभूतपूर्व था। चीनी प्रवक्ता ने अमेरिकी राजदूत की टिप्पणियों को 'गैर-जिम्मेदाराना' और 'दुर्भावनापूर्ण' बताया। कूटनीतिक भाषा में इसे सीधी ललकार कहते हैं।
चीन अब ढाका में केवल एक निवेशक नहीं, बल्कि एक 'संरक्षक' की भूमिका में आ गया है। वह यूनुस को यह भरोसा दिला रहा है कि अगर अमेरिका लोकतंत्र या मानवाधिकारों के नाम पर दबाव डालेगा, तो बीजिंग और उसका प्यादा पाकिस्तान उनके साथ खड़ा रहेगा। यूनुस का यह ट्रम्प-विरोधी रुख भारत के लिए समस्या है, क्योंकि इससे वे अमेरिका-भारत साझेदारी के खिलाफ चीन-पाक धुरी को मजबूत कर रहे हैं।
1971 की भूल और पाकिस्तान की वापसी
सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि जिस 'मुक्ति संग्राम' की बुनियाद पर बांग्लादेश खड़ा है, यूनुस उस बुनियाद को ही खोद रहे हैं। पाकिस्तान के साथ ' JF-17 थंडर' और 'सुपर मुश्शक' विमानों की डील केवल व्यापार नहीं है। यह इस्लामाबाद की उस रणनीति की जीत है, जिसके तहत वह बिना गोली चलाए बांग्लादेश को फिर से अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना चाहता था।
पाकिस्तानी वायु सेना प्रमुख जहीर अहमद बाबर सिद्धू और बांग्लादेशी वायु सेना प्रमुख हसन महमूद खान के बीच 'रक्षा सहयोग के विस्तार' पर चर्चा इस बात का प्रमाण है कि यूनुस 1971 के घावों को भूलकर अपने 'पुराने आकाओं' के साथ नए रिश्ते बना रहे हैं। यह भारत के लिए असहनीय होना चाहिए। एक तरफ हम 'नेबरहुड फर्स्ट' (पड़ोसी पहले) की नीति अपनाते हैं, और दूसरी तरफ हमारा पड़ोसी हमारे ही जानी दुश्मनों को अपने घर में पनाह दे रहा है।
आगामी चुनाव और यूनुस का 'पावर ग्रैब'
बांग्लादेश में 12 फरवरी को प्रस्तावित जनमत संग्रह और आम चुनाव केवल एक दिखावा मात्र रह गए हैं। आलोचकों का मानना है कि यह पूरी प्रक्रिया यूनुस की सत्ता को 'वैधता' प्रदान करने का एक नाटक है। चीन और पाकिस्तान इस प्रक्रिया में यूनुस का साथ दे रहे हैं ताकि ढाका में एक ऐसी सरकार रहे जो हमेशा के लिए बीजिंग की ऋणी रहे।
अगर यूनुस अपनी सत्ता को मजबूत करने में सफल हो जाते हैं, तो भारत के पूर्व में एक और 'पाकिस्तान' का जन्म हो सकता है—एक ऐसा देश जो नाम से संप्रभु होगा, लेकिन जिसका रिमोट कंट्रोल बीजिंग और रावलपिंडी में होगा।
भारत के लिए 'रणनीतिक सब्र' का समय समाप्त
अब समय आ गया है कि भारत अपनी 'मीठी कूटनीति' को त्यागकर यथार्थवादी और आक्रामक रुख अपनाए। बांग्लादेश अब वह 'मित्र राष्ट्र' नहीं रहा जिसकी कल्पना शेख हसीना के दौर में की जाती थी। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश भारत-प्रशांत क्षेत्र के संतुलन को बिगाड़ रहा है।
भारत को स्पष्ट संदेश देना होगा कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास चीनी उपस्थिति किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगी। अगर ढाका J-10C और JF-17 खरीदकर पाकिस्तान-चीन धुरी का हिस्सा बनता है, तो भारत को भी अपनी आर्थिक और कूटनीतिक ताकत का इस्तेमाल कर बांग्लादेश को यह एहसास दिलाना होगा कि भारत के सहयोग के बिना उसका अस्तित्व संकट में पड़ सकता है।
यूनुस यह भूल रहे हैं कि चीन का कर्ज और पाकिस्तान की दोस्ती—दोनों ही 'विषकन्या' के आलिंगन की तरह हैं। शुरू में यह सुखद लग सकता है, लेकिन अंत निश्चित रूप से विनाशकारी होता है। प्रश्न यह है कि क्या भारत इस विनाश का मूकदर्शक बना रहेगा, या फिर चाणक्य की नीति अपनाकर इस विषैले गठजोड़ को उसकी जड़ों से काट फेंकेगा? क्योंकि अब खतरा दरवाजे पर नहीं, घर के आंगन में आ चुका है। 

ढाका में 'हिंदू रक्त' की होली एवं विश्व का 'सुविधाजनक' मौन
एक ओर मुहम्मद यूनुस ढाका में चीन और पाकिस्तान के साथ रणनीतिक समीकरण गढ़ने में व्यस्त हैं, तो दूसरी ओर बांग्लादेश की धरती एक बार फिर अल्पसंख्यक हिंदुओं के निर्दोष रक्त से लाल हो रही है। शेख हसीना के सत्ता से हटते ही यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौर में ‘हिंदू होना’ अब आस्था नहीं, बल्कि खतरे की पहचान बन चुका है।
दिसंबर 2025 के अंत से जनवरी 2026 के बीच हुई घटनाएँ बताती हैं कि देश में कानून का शासन नहीं, बल्कि भीड़तंत्र का आतंक चल रहा है। महज कुछ ही दिनों में नर्सिंगदी के दुकानदार मोनी चक्रवर्ती की सरेआम हत्या, शरीयतपुर में खोकों चंद्र दास को चाकुओं से गोदकर जलाना, यशोर में संपादक राणा प्रताप बैरागी की गोली मारकर हत्या, तथा फेनी और गाजीपुर में समीर दास और लिटन चंद्र घोष की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या—ये सभी एक भयावह सिलसिले की कड़ियाँ हैं।
यूनुस प्रशासन इन सुनियोजित हमलों को ‘छिटपुट अपराध’ कहकर नकार रहा है, जबकि मानवाधिकार संगठन इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ संगठित हिंसा का स्पष्ट पैटर्न मानते हैं।
सबसे चिंताजनक है पश्चिमी मीडिया और वैश्विक संस्थाओं की चुप्पी। गाजा और यूक्रेन पर आँसू बहाने वाला अंतरराष्ट्रीय तंत्र ढाका में जलते मंदिरों और उजड़ते हिंदू परिवारों को देखने से कतरा रहा है। फरवरी 2026 के चुनावों की आहट के बीच बांग्लादेश का हिंदू समाज भय, असुरक्षा और अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है।
विडंबना यह है कि जिस लोकतंत्र के नाम पर सत्ता बदली गई, उसी की बलि वेदी पर आज हिंदू समुदाय चढ़ाया जा रहा है। 


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