कूटनीतिक अलार्मः भारत का इम्तिहान
मनोज कुमार
| 02 Feb 2026 |
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नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में बैठी भारतीय कूटनीति की शीर्ष संस्थाओं के लिए वर्ष 2026 का सूर्योदय किसी सामान्य नए साल की दस्तक नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी लेकर आया है। भारतीय विदेश नीति, जो दशकों से 'रणनीतिक स्वायत्तता' और 'नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था' के सिद्धांतों पर टिकी थी, आज खुद को एक ऐसे चौराहे पर खड़ा पा रही है जहां दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति—अमेरिका—नियमों को नहीं, बल्कि अपनी 'सनक' को प्राथमिकता दे रही है। भारत के रणनीतिकारों के लिए चिंता का विषय केवल सुदूर वेनेजुएला या ग्रीनलैंड में घट रही घटनाएं नहीं हैं, बल्कि चिंता का मूल यह है कि जिस लोकतांत्रिक और उदारवादी विश्व व्यवस्था के भरोसे भारत ने अपनी विकास यात्रा का खाका खींचा था, वह व्यवस्था अब ध्वस्त होती दिख रही है।
जब भारत अपनी स्वतंत्रता के 100वें वर्ष (2047) की ओर बढ़ने का सपना देख रहा है, तब वैश्विक पटल पर अचानक 'जंगल राज' की वापसी भारत के लिए एक कूटनीतिक अग्निपरीक्षा बन गई है। प्रश्न यह है कि जब आपका सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार (अमेरिका) ही वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा बनने लगे, तो भारत अपने राष्ट्रीय हितों—ऊर्जा सुरक्षा, सीमा सुरक्षा और आर्थिक विकास—की रक्षा कैसे करेगा?
वेनेजुएला कांड - भारत के लिए खतरे की घंटी
जनवरी 2026 की शुरुआत में ही एक ऐसी घटना घटी जिसने भारतीय कूटनीतिक गलियारों में सन्नाटा खींच दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उनकी पत्नी सहित राजधानी कराकस से 'उठवा' कर अमेरिका ले आना आधुनिक संप्रभुता के सिद्धांत पर एक तमाचा था। भारत, जो गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेता रहा है और हमेशा दूसरे देशों की संप्रभुता का सम्मान करता आया है, उसके लिए यह घटना एक 'वेक-अप कॉल' है।
यह केवल एक लैटिन अमेरिकी देश में तख्तापलट नहीं है - यह संकेत है कि अमेरिका अब किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून या नैतिकता से बंधा हुआ नहीं है। आज वेनेजुएला है, कल कोई और देश हो सकता है जो अमेरिकी हितों के आड़े आए। भारत के लिए यह इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि ट्रम्प की नजरें अब ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्रों को खरीदने और ईरान को मिटाने पर हैं। एक अस्थिर पश्चिम एशिया, जहां भारत के लाखों नागरिक काम करते हैं और जहां से भारत की ऊर्जा जरूरतें पूरी होती हैं, भारत की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है।
बाजारवाद के भ्रम का टूटना
भारत के आधुनिक दृष्टिकोण को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुड़ना होगा। 1991 में सोवियत संघ के विघटन और भारत के आर्थिक उदारीकरण के बाद, नई दिल्ली ने यह मान लिया था कि भविष्य की दुनिया 'बाजारवाद' और 'सॉफ्ट पावर' से चलेगी। शीत युद्ध समाप्त हो चुका था। भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोले और धीरे-धीरे यह धारणा मजबूत हुई कि सैन्य शक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति है।
वैश्वीकरण के उस दौर में भारत ने अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को नया आयाम दिया। 1971 के घावों को, जब अमेरिका ने भारत के खिलाफ अपना सातवां बेड़ा भेजा था, भुला दिया गया। 21वीं सदी में भारत और अमेरिका 'स्वाभाविक सहयोगी' बन गए। भारत को लगा कि साझा लोकतांत्रिक मूल्य और विशाल बाजार दोनों देशों को हमेशा जोड़कर रखेंगे।
किंतु 2026 में, भारत का यह भ्रम टूट रहा है। ट्रम्प का यह कार्यकाल सिद्ध कर रहा है कि 'व्यापार' अब शांति का गारंटी नहीं, बल्कि युद्ध का हथियार बन चुका है। भारत देख रहा है कि कैसे अमेरिका अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल दूसरे देशों को झुकाने के लिए कर रहा है। भारत के नीति-निर्माता अब इस कठोर सत्य का सामना कर रहे हैं कि केवल जीडीपी का आकार सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता; उसके लिए 'हार्ड पावर' और रणनीतिक दृढ़ता अनिवार्य है।
भारत-अमेरिका संबंध - आशाओं का बिखरना
वर्ष 2025 में जब डोनाल्ड ट्रम्प की सत्ता में वापसी हुई थी, तो भारतीय मीडिया और कुछ कूटनीतिज्ञों में उत्साह था। माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री मोदी और ट्रम्प की व्यक्तिगत 'केमिस्ट्री' दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी। उम्मीद थी कि रक्षा सौदे तेजी से होंगे, तकनीक का हस्तांतरण होगा और चीन के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन बनेगा। लेकिन साल खत्म होते-होते यह 'हनीमून पीरियड' एक कड़वे यथार्थ में बदल गया।
भारत के लिए विडंबना यह है कि जिन व्यापारिक संबंधों को रिश्तों की धुरी माना जाता था, वही अब गले की फांस बन गए हैं। ट्रम्प की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति भारत की 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' पहल से सीधे टकरा रही है। वाशिंगटन अब भारत को एक सहयोगी के रूप में कम और एक 'टैरिफ किंग' या आर्थिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में ज्यादा देख रहा है। यह बदलाव भारत के लिए झटका है, क्योंकि भारत ने अपनी सामरिक योजना में अमेरिका को एक ध्रुव माना था।
रूस, तेल और भारत का 'स्वाभिमान'
वर्तमान में भारत-अमेरिका तनाव का सबसे बड़ा और संवेदनशील बिंदु 'रूस' है। यह मुद्दा भारत के लिए केवल तेल का नहीं, बल्कि उसकी 'रणनीतिक स्वायत्तता' का है। यूक्रेन युद्ध के दौरान जब पूरे पश्चिम ने रूस का बहिष्कार किया, तब भारत ने अपने नागरिकों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा। भारत सरकार का तर्क स्पष्ट था—'हम अपनी ऊर्जा सुरक्षा को दूसरों की राजनीतिक लड़ाइयों का बंधक नहीं बना सकते।'
अमेरिका का आरोप है कि भारत पुतिन के युद्ध को वित्तपोषित कर रहा है। भारतीय दृष्टिकोण से यह आरोप न केवल अपमानजनक है, बल्कि पाखंडपूर्ण भी है। भारतीय विदेश मंत्री और कूटनीतिज्ञ लगातार इस बात को रेखांकित करते रहे हैं कि यूरोप ने भारत की तुलना में रूस से कहीं अधिक ऊर्जा खरीदी है। इसके बावजूद, अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा है।
ट्रम्प, जो यूक्रेन युद्ध रुकवाने के अपने वादे में विफल रहे हैं, अपनी खीज भारत पर निकाल रहे हैं। 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की उनकी धमकी भारत को दंडित करने का प्रयास है। लेकिन भारत के लिए यह अब स्वाभिमान का प्रश्न बन गया है। अगर भारत आज अमेरिका के दबाव में रूस से अपने पुराने संबंध तोड़ लेता है, तो वह दुनिया को यह संदेश देगा कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र नहीं, बल्कि अमेरिका का पिछलग्गू है। यह भारत की वैश्विक छवि के लिए आत्मघाती होगा।
आर्थिक ब्लैकमेल बनाम भारत की नई शक्ति
ट्रम्प द्वारा भारत पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी को भारत हल्के में नहीं ले सकता, लेकिन इससे डरने का दौर भी अब बीत चुका है। भारतीय अर्थव्यवस्था आज वह नहीं है जो 1990 में थी। आज भारत दुनिया की चौथीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जल्द ही तीसरी बनने की राह पर है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य से देखें तो यह 'टैरिफ वार' एकतरफा नहीं हो सकती। भारत अमेरिका की बड़ी कंपनियों—एप्पल, गूगल, बोइंग, और सोशल मीडिया दिग्गजों—के लिए सबसे बड़ा और तेजी से बढ़ता बाजार है। अगर अमेरिका भारतीय फार्मा या टेक्सटाइल पर शुल्क लगाता है, तो भारत के पास भी जवाबी कार्रवाई के पर्याप्त विकल्प मौजूद हैं। इसके अलावा, अमेरिका को चीन का मुकाबला करने के लिए भारत की आपूर्ति श्रृंखला की जरूरत है। भारत जानता है कि ट्रम्प एक व्यापारी हैं और वे अंततः नुकसान का सौदा नहीं करेंगे, लेकिन उनकी ब्लैकमेलिंग की रणनीति का जवाब भारत को अपनी आर्थिक ताकत दिखाकर ही देना होगा।
अग्निपरीक्षा में भारत
इस वैश्विक अस्थिरता और अमेरिकी दबाव के बीच भारत के पास क्या विकल्प हैं? भारतीय रणनीतिकारों के अनुसार, भारत को तीन प्रमुख मोर्चों पर काम करना होगा। पहला, न झुकने की नीति- वेनेजुएला का उदाहरण सामने है।
कमजोरी दिखाना आक्रमण को निमंत्रण देना है। भारत को स्पष्ट संदेश देना होगा कि वह अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। रूस के साथ संबंध भारत की रक्षा तैयारियों के लिए महत्वपूर्ण हैं और इन्हें अमेरिका की खुशी के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। भारत को ट्रम्प को यह समझाना होगा कि एक मजबूत भारत ही अमेरिका के हित में है, न कि एक कमजोर और आश्रित भारत। दूसरा, बहु-संरेखण का विस्तार - भारत को अपनी पुरानी 'गुटनिरपेक्षता' को 'बहु-संरेखण' में बदलना जारी रखना होगा। इसका अर्थ है—क्वाड में अमेरिका के साथ रहना, लेकिन ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन में रूस और चीन के साथ भी संवाद बनाए रखना। फ्रांस, जापान, और जर्मनी जैसे मध्यम शक्तियों के साथ संबंधों को और गहरा करना होगा ताकि अमेरिका पर निर्भरता कम की जा सके। और अंत में तीसरा, ग्लोबल साउथ का नेतृत्व - भारत को विकासशील देशों अर्थात ग्लोबल साउथ की आवाज बनना होगा। वेनेजुएला जैसी घटनाएं अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों में डर पैदा करती हैं। भारत को इन देशों को आश्वस्त करना होगा कि वह एक ऐसी विश्व व्यवस्था का पक्षधर है जो 'शक्ति' पर नहीं, 'नियमों' पर आधारित हो। यह भारत को वैश्विक मंच पर एक नैतिक बल प्रदान करेगा।
अस्थिरता में स्थिरता का प्रतीक
अंततः, 2026 का यह भू-राजनीतिक परिदृश्य भारत की धैर्य और कूटनीतिक परिपक्वता की परीक्षा है। ट्रम्प का अमेरिका अविश्वसनीय और अस्थिर हो सकता है, लेकिन भारत को 'स्थिरता के ध्रुव' के रूप में उभरना होगा।
वेनेजुएला में राष्ट्रपति का अपहरण और ग्रीनलैंड पर कब्जे की अमेरिकी मंशा यह बताती है कि दुनिया एक खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे समय में, भारत के लिए 'वसुधैव कुटुम्बकम' का आदर्श केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता है। भारत को दुनिया को यह दिखाना होगा कि वह महाशक्तियों के खेल में मोहरा नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र खिलाड़ी है।
भारत और अमेरिका के रिश्ते टूटेंगे नहीं, क्योंकि दोनों की एक-दूसरे को जरूरत है (विशेषकर चीन के संदर्भ में)। लेकिन रिश्तों की शर्तों को पुनर्परिभाषित करना होगा। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि वाशिंगटन यह समझे कि 21वीं सदी का भारत बराबरी की साझेदारी चाहता है, अधीनस्थता नहीं। इस अस्थिरता के दौर में, भारत का सबसे बड़ा हथियार उसका 'आत्मबल' और उसकी 'रणनीतिक स्वायत्तता' ही होगी।