'कमल' का 'नवीन' अध्याय

मनोज कुमार

 |  02 Feb 2026 |   7
Culttoday

जनवरी 2026 की गुनगुनी धूप में दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय पर एक नया इतिहास लिखा गया। जब नितिन नवीन के नाम की घोषणा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में हुई, तो राजनीतिक गलियारों में वही सन्नाटा और विस्मय छा गया, जो अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के फैसलों के बाद देखने को मिलता है। जे.पी. नड्डा के शांत और संगठनात्मक कार्यकाल के बाद, कमान अब एक युवा, ऊर्जावान और अपेक्षाकृत 'सरप्राइज' चेहरे के हाथ में है।
नितिन नवीन की यह नियुक्ति केवल एक पदोन्नति नहीं है -  यह भाजपा के भीतर चल रहे उस भगीरथ मंथन का परिणाम है, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए नेतृत्व की एक नई पौध तैयार कर रहा है। इसे भाजपा के समर्थकों द्वारा एक उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है—एक युवा अध्यक्ष जो भविष्य के भारत की आकांक्षाओं और पार्टी के 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के बीच सेतु बनेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर का उपयोग एक बार फिर भाजपा को 'पार्टी विद अ डिफरेंस' के रूप में ब्रांड करने के लिए किया है।
लेकिन, ढोल-नगाड़ों के शोर और कार्यकर्ताओं के उत्साह के बीच, एक गंभीर और चुभने वाला प्रश्न राजनीतिक विश्लेषकों के मन में कुलबुला रहा है—क्या नितिन नवीन की यह नियुक्ति वास्तव में एक लोकतांत्रिक 'चुनाव' है, या यह शीर्ष नेतृत्व द्वारा किया गया एक चतुर 'चयन'  है? क्या भाजपा वास्तव में कांग्रेस और अन्य वंशवादी दलों से अलग है, या फिर यहां भी 'हाईकमान' की संस्कृति ने बस एक नया, भगवा चोला ओढ़ लिया है?
'पार्टी विद अ डिफरेंस': हकीकत या सियासी जुमला?
भाजपा का सबसे बड़ा यूएसपी यह रहा है कि वह खुद को वंशवाद से मुक्त बताती है। अटल बिहारी वाजपेयी  से लेकर लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे, बंगारू लक्ष्मण, वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, अमित शाह और जे.पी. नड्डा तक—इस सूची में कोई भी ऐसा नाम नहीं है जो किसी परिवार विशेष का वारिस होने के कारण अध्यक्ष बना हो। अब नितिन नवीन का नाम भी इसी गौरवशाली सूची में जुड़ गया है।
यह सत्य है कि कांग्रेस के विपरीत, जहां अध्यक्ष पद अक्सर 'गांधी परिवार' की जागीर समझा जाता रहा है (कुछ अपवाद के बावजूद, जहां रिमोट कंट्रोल की चर्चाएं आम हैं), भाजपा ने हमेशा सामान्य पृष्ठभूमि वाले नेताओं को शीर्ष पर बिठाया है। लेकिन प्रश्न 'पृष्ठभूमि' का नहीं, 'प्रक्रिया' का है। क्या भाजपा का अध्यक्ष बनने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक है?
सच्चाई यह है कि भले ही भाजपा अध्यक्ष गैर-वंशवादी होते हैं, लेकिन उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया को आधुनिक लोकतंत्र की कसौटी पर 'स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव' नहीं कहा जा सकता। यहां 'गेटकीपर'  की भूमिका अत्यंत प्रबल है। राजनीतिक विज्ञान की भाषा में 'गेटकीपर' वे वरिष्ठ और शक्तिशाली नेता होते हैं जो संगठन के भीतर किसे प्रवेश मिलेगा और कौन शीर्ष पर पहुंचेगा, इसका निर्णय लेते हैं। भारत में जिसे हम 'हाईकमान कल्चर' कहते हैं, वह असल में यही गेटकीपिंग है।
भाजपा, जो लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतकर भारत की 'सिस्टम-डिफाइनिंग पार्टी' बन चुकी है, इस घटनाक्रम में कोई अपवाद नहीं है। पार्टी के भीतर सुधार के संकेत नगण्य हैं। यहां चुनाव नहीं, बल्कि 'सहमति' के नाम पर 'परोक्ष चयन' होता है।
चुनाव बनाम चयन: कांग्रेस और भाजपा का विरोधाभास
एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के दो अनिवार्य तत्व होते हैं—परिणाम की अनिश्चितता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा। दुर्भाग्य से, भारतीय लोकतंत्र के भीतर काम करने वाले राजनीतिक दलों में ये दोनों ही तत्व गायब हैं।
भाजपा के मामले में, नितिन नवीन की नियुक्ति प्रक्रिया 'निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा' की कसौटी पर खरी नहीं उतरती, लेकिन इसमें एक तत्व ऐसा है जो इसे कांग्रेस से अलग और बेहद प्रभावी बनाता है—वह है 'परिणाम की अनिश्चितता'।
जब कांग्रेस में अध्यक्ष पद का चुनाव हुआ, तो परिणाम पहले से तय माना जा रहा था। शशि थरूर का चुनाव लड़ना महज एक औपचारिकता थी -  सबको पता था कि 'गांधी परिवार' का आशीर्वाद जिसे प्राप्त होगा (खड़गे), वही जीतेगा। वहां कोई सस्पेंस नहीं था, कोई रोमांच नहीं था।
इसके विपरीत, भाजपा में नितिन नवीन के नाम की घोषणा से पहले, शायद ही किसी को—यहां तक कि बड़े-बड़े मीडिया घरानों और राजनीतिक पंडितों को—भनक थी कि वे अगले अध्यक्ष होंगे। जब उन्हें पहले अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया, तभी यह स्पष्ट हुआ कि 'शीर्ष नेतृत्व' (गेटकीपर्स) ने अपना मन बना लिया है।
यही 'अनिश्चितता' भाजपा की सबसे बड़ी ताकत है। यह पार्टी के करोड़ों कार्यकर्ताओं के भीतर एक अदम्य आशा और उत्साह का संचार करती है। जब एक सामान्य कार्यकर्ता देखता है कि नितिन नवीन जैसा युवा नेता, या मोहन यादव और विष्णु देव साय जैसे नेता अचानक मुख्यमंत्री बन सकते हैं, तो उसे विश्वास हो जाता है कि 'पार्टी में कोई भी कार्यकर्ता किसी भी पद पर पहुंच सकता है।' प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन कि 'मैं पार्टी का एक कार्यकर्ता हूं,' इसी विश्वास को पुख्ता करने के लिए बार-बार दोहराया जाता है। नितिन नवीन की नियुक्ति इस नैरेटिव का ताजा और ठोस उदाहरण है।
लोकतंत्र की सीमाएं और 'गेटकीपर्स' का वर्चस्व
फिर भी, एक विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें तो यह प्रक्रिया पार्टी के भीतर शक्ति का केंद्रीयकरण करती है। जब आम कार्यकर्ताओं को अपना नेता सीधे चुनने का अधिकार नहीं होता, तो पार्टी का अभिजात वर्ग  प्रभावी रूप से निर्णय लेता है। नितिन नवीन को पहले अंतरिम अध्यक्ष घोषित करना और फिर पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाना, एक स्पष्ट संकेत था कि हाईकमान ने किसे चुना है।
ऐसी स्थिति में, किसी अन्य नेता द्वारा नितिन नवीन को चुनौती देने का अर्थ केवल एक उम्मीदवार को चुनौती देना नहीं, बल्कि मोदी-शाह और आरएसएस के निर्णय को चुनौती देना होता। और आज की भाजपा में, ऐसा दुस्साहस करने की स्थिति में कोई नहीं है। हमने कांग्रेस में शशि थरूर का हश्र देखा है, जो चुनाव लड़ने के बाद से ही हाशिए पर धकेल दिए गए। पश्चिमी लोकतंत्रों में, जहां पार्टी के आंतरिक चुनाव में बहस होती है और प्रतिद्वंद्वियों को बाद में टीम में शामिल किया जाता है, भारतीय दल अभी उस परिपक्वता से कोसों दूर हैं। यहां चुनाव लड़ना 'बगावत' माना जाता है।अतः, नितिन नवीन 'निर्वाचित' अध्यक्ष नहीं, बल्कि 'चयनित' अध्यक्ष हैं। और जब 'चयन' होता है, तो उसके पीछे एक गहरी रणनीति होती है।
आशा और हकीकत के बीच का द्वंद्व
कुल मिलाकर, नितिन नवीन की नियुक्ति यह सिद्ध करती है कि संरचनात्मक रूप से भाजपा अन्य भारतीय राजनीतिक दलों से बहुत अलग नहीं है। यहां भी 'चुनाव' एक औपचारिकता है और असली निर्णय बंद कमरों में 'गेटकीपर्स' द्वारा लिए जाते हैं। लोकतंत्र का जो आदर्श रूप—जहां कार्यकर्ता सीधे अपना नेता चुनें—वह यहां भी नदारद है।
किंतु, भाजपा ने इस 'अलोकतांत्रिक' प्रक्रिया को भी एक 'रणनीतिक हथियार' में बदल दिया है। अन्य दलों में जहाँ 'चयन' का परिणाम 'परिवारवाद' या 'यथास्थिति' होता है, वहीं भाजपा में 'चयन' का परिणाम 'अनिश्चितता' और 'मेरिट'  होता है। यही वह जादुई तत्व है जो भाजपा के कैडर में ऊर्जा भरता है।
एक सामान्य भाजपा कार्यकर्ता नितिन नवीन में अपना भविष्य देखता है। उसे लगता है कि अगर वह भी मेहनत करेगा, तो 'गेटकीपर्स' की नजर उस पर भी पड़ेगी और वह भी फर्श से अर्श तक पहुंच सकता है। यही वह मनोवैज्ञानिक बढ़त है जो भाजपा को उसके प्रतिद्वंद्वियों, विशेषकर कांग्रेस, से मीलों आगे रखती है।
अतः, नितिन नवीन का अध्यक्ष बनना 'चुनाव' भले न हो, लेकिन यह भाजपा की उस 'स्मार्ट पॉलिटिक्स' का हिस्सा है, जिसने उसे भारत की सबसे दुर्जेय चुनावी मशीन बना दिया है। यह नियुक्ति बताती है कि भाजपा केवल वर्तमान का चुनाव नहीं जीतना चाहती, बल्कि वह भविष्य की बिसात पर अपने मोहरे सजा रही है—और नितिन नवीन उस बिसात के वजीर बनकर उभरे हैं।
प्रश्न यह नहीं है कि लोकतंत्र कितना गहरा है, प्रश्न यह है कि जीत की भूख कितनी तीव्र है। और इस मामले में, भाजपा का कोई सानी नहीं है। 

 

नितिन  नवीन: 'रणनीतिक चयन' के मायने
नितिन नवीन की ताजपोशी के पीछे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की क्या सोच हो सकती है? इसे डिकोड करने के लिए कई परतें खोलनी होंगी।
पीढ़ीगत बदलाव 
सबसे प्रमुख कारण उनकी उम्र है। नितिन नवीन युवा हैं। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व—विशेषकर मोदी और शाह—2029 और उसके बाद के भारत की तैयारी कर रहा है। जे.पी. नड्डा एक संक्रमणकालीन अध्यक्ष थे। नवीन के रूप में पार्टी एक ऐसा चेहरा सामने लाई है जो अगले एक दशक तक संगठन को ऊर्जा दे सकता है और युवाओं के साथ कनेक्ट कर सकता है। यह भाजपा के 'स्मूथ ट्रांजिशन' (सहज सत्ता हस्तांतरण) की योजना का हिस्सा है।
कायस्थ समीकरण और 'भद्रलोक' की राजनीति
नितिन नवीन कायस्थ समुदाय से आते हैं। यद्यपि वे बिहार से हैं, लेकिन कायस्थों का प्रभाव हिंदी पट्टी के शहरों और विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में महत्वपूर्ण है। बंगाल, जहां भाजपा अपनी जड़ें जमा चुकी है लेकिन सत्ता से दूर है, वहां 'भद्रलोक' वोट बैंक को साधने में नवीन की छवि मददगार हो सकती है। यह एक सूक्ष्म सोशल इंजीनियरिंग है।
क्षेत्रीय संतुलन का पावर-गेम
यह बिंदु सबसे महत्वपूर्ण है। वर्तमान में, भाजपा के संगठन महामंत्री—जो अध्यक्ष के बराबर ही शक्तिशाली पद होता है—बी.एल. संतोष हैं, जो दक्षिण भारत (कर्नाटक) से आते हैं। भाजपा के संविधान और कार्यशैली में क्षेत्रीय संतुलन का बहुत ध्यान रखा जाता है। चूंकि संगठन महामंत्री दक्षिण से हैं, इसलिए अध्यक्ष का उत्तर भारत से होना लगभग तय था। नितिन नवीन, बिहार से आकर, उस संतुलन को साधते हैं।
'गुजराती प्रभुत्व' की धारणा को तोड़ना
पिछले एक दशक में, विपक्ष और आलोचकों ने यह नैरेटिव गढ़ा है कि भाजपा और देश को 'दो गुजराती' (मोदी और शाह) चला रहे हैं। यह धारणा पार्टी के लिए हिंदी पट्टी और अन्य राज्यों में कभी-कभी असहजता पैदा करती है। नितिन नवीन की नियुक्ति इस धारणा को खंडित करने का एक सधा हुआ प्रयास है। एक 'बिहारी' को शीर्ष पद देकर, भाजपा ने संदेश दिया है कि उसका नेतृत्व अखिल भारतीय है और वह किसी एक राज्य के नेताओं तक सीमित नहीं है।
निष्ठा और परफॉर्मेंस
नितिन नवीन ने छत्तीसगढ़ में सह-प्रभारी के रूप में अपनी क्षमता साबित की थी, जहां भाजपा ने कांग्रेस को हराकर सत्ता में वापसी की। उनकी संगठनात्मक क्षमता और विचारधारा के प्रति निष्ठा ने उन्हें हाईकमान का विश्वासपात्र बनाया। यह चयन संदेश देता है कि जो 'डिलीवर' करेगा, उसे इनाम मिलेगा। n


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