जल कूटनीति

संदीप कुमार

 |  02 Apr 2026 |   3
Culttoday

पूर्वोत्तर भारत में अलग-अलग पहचान और स्वभाव वाले आठ राज्य हैं। यह एशिया का सबसे ज्यादा नदियों वाले इलाकों में से एक है। इस इलाके के पहाड़ और जमीन भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट्स की हिमालय में बहुत बड़ी टक्कर के बाद बने। इस विशाल टक्कर से ढलानों और घाटियों का ऐसा जाल बना, जो पानी को उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम की ओर बहने का रास्ता देता है। इससे ये नदियां बाढ़ के साथ हजारों साल से जमा मिट्टी को बहाकर असम, बांग्लादेश और उससे आगे तक उपजाऊ मैदान बनाती हैं।
इस पूरे वॉटर नेटवर्क के केंद्र में ब्रह्मपुत्र नद है, जिसे तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो कहते हैं। यह नदी हिमालय के उत्तरी ढलानों पर अंगसी ग्लेशियर से निकलता है, तिब्बत में पूरब की ओर बहता है फिर नामचा बरवा के पास अचानक तेज मोड़ लेकर अरुणाचल प्रदेश में आ जाता है। वहां से यह असम में घुमावदार रास्तों से होते हुए बांग्लादेश में पद्मा यानी गंगा से मिलकर बंगाल की खाड़ी में गिरता है। अपने रास्ते में इसमें पूर्वोत्तर भारत की कई सहायक नदियां आकर मिलती हैं। इस तरह ब्रह्मपुत्र एक अहम परिवहन मार्ग के रूप में काम करता है। यह खेती, सिंचाई और पानी से बनने वाली बिजली के लिए जीवनरेखा है। यह चीन, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार से भी भारत को कनेक्ट करता है, जिससे पूर्वोत्तर भारत इंडियन सबकॉन्टिनेंट और इंडो-पैसेफिक इलाके के बीच एक रणनीतिक कड़ी बन जाता है। ब्रह्मपुत्र को भारत में नदी नहीं, नद कहते हैं क्योंकि इसे पुरुष माना जाता है।
व्यापार की धमनी हैं ये नदियां
ऐतिहासिक रूप से पूर्वोत्तर भारत में व्यापार, कारोबार और अभियानों के लिए ब्रह्मपुत्र और बराक नदियों का इस्तेमाल होता रहा है। भारत के बंटवारे से पहले व्यापार के ये रोजमर्रा के रास्ते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1844 में ही कोलकाता से डिब्रूगढ़ तक वॉटरवे बना दिया था। 1847 के बाद स्टीमशिप के जरिए असम और कोलकाता के बीच, पूर्वी बंगाल (आज का बांग्लादेश) के रास्ते, चाय और बाकी चीजें ढोई जाती थीं।
उसी समय अंग्रेजों ने दक्षिणी असम के सिलचर को बराक–सुरमा–मेघना जलमार्ग के जरिए कोलकाता बंदरगाह से जोड़ा। लेकिन 1947 में सिलहट पूर्वी बंगाल को दे दिया गया, तो यह रास्ता बंद हो गया। आजादी से पहले ब्रह्मपुत्र घाटी में धुबरी, डिब्रूगढ़, पांडु (गुवाहाटी), नीमाती, तेजपुर और जोगीघोपा अहम बंदरगाह थे। वहीं बदरपुर, करीमगंज और सिलचर बराक घाटी के मुख्य बंदरगाह थे। इन बंदरगाहों से माल नारायणपुर, खुलना, चांदपुर, चिलमारी और ढाका के रास्ते कोलकाता भेजा जाता था। अब ये जगहें बांग्लादेश में हैं।
नेशनल वाटरवेज एक्ट 2016 के तहत ब्रह्मपुत्र और बराक नदी नेटवर्क की हाइड्रो पॉवर और नौवहन क्षमता को फिर से बहाल करने पर खास जोर दिया गया। इसके बाद ब्रह्मपुत्र नद (राष्ट्रीय जलमार्ग NW-2) की व्यापारिक क्षमता काफी बढ़ी है। लगभग 6 लाख टन माल NW-2 के जरिए भेजा जाता है। इसमें जिसमें अनाज, खाद, बांस और निर्माण सामग्री वगैरह हैं।
बराक नदी पारंपरिक तौर पर बराक घाटी और बंगाल के बीच व्यापार का जरिया रही है। 2016 में लखीमपुर से भांगा तक के हिस्से को नेशनल वॉटरवे NW-16 घोषित किया गया। लेकिन इस नदी से राज्यों के अंदर-बाहर व्यापार बढ़े, इसके लिए अभी और कदम उठाने की जरूरत है। ड्रेजिंग और ठीक-ठाक नदी बंदरगाहों की कमी इसकी व्यावसायिक क्षमता को सीमित करती है। फिलहाल NW-2 और NW-16 पर होने वाला व्यापार NW-1 (गंगा–भागीरथी–हुगली) के बरक्स कम है। पूर्वोत्तर के बाकी जरूरी जलमार्गों में सिक्किम की मुख्य नदी तीस्ता भी है। यह उत्तरी सिक्किम के ग्लेशियरों से निकलती है, रंगित और रंगपो नदियों से मिलती है। वहां से दक्षिण की ओर बहते हुए पश्चिम बंगाल की सीमा बनाती है, फिर बांग्लादेश के रास्ते बंगाल की खाड़ी में गिरती है। तीस्ता हाइड्रो पॉवर प्रोडक्शन के लिए अहम है। यह उत्तर बंगाल और बांग्लादेश में खेती और कमाई का सहारा है। कभी यह नदी तिब्बत और हिमालय के अंदरूनी बाजारों के बीच सबसे पुराना नदी व्यापार मार्ग था। इससे व्यापारी चीन से बंगाल की खाड़ी की ओर जाते थे। भारत और बांग्लादेश में तीस्ता के पानी का बंटवारा लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। इससे इसके कमर्शियल उपयोग के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा बनाने में दिक्कत आई है।
मणिपुर नदी का इस्तेमाल अभियानों के लिए होता था। वर्ल्ड वार-II में जापानी सेना ने भी इसका उपयोग किया। यह म्यांमार से होकर बहती है, लेकिन बंगाल की खाड़ी तक यह एक अल्टरनेटिव रूट भी हो सकता है। हालांकि इसकी संभावना अभी तक पूरी तरह नहीं देखी गई, शायद म्यांमार के कठिन भौगोलिक हालात के चलते। वहीं कालादान नदी मिजोरम (पूर्वोत्तर भारत) से निकलकर म्यांमार जाती है। यह सिलीगुड़ी कॉरिडोर के विकल्प के रूप में अहम रोल अदा कर सकती है, जो बांग्लादेश के बाहर से होकर जाएगा। यह नदी कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (KMTTP) के जरिए मिजोरम को म्यांमार के रखाइन के सित्तवे बंदरगाह से जोड़ती है। उम्मीद है कि सित्तवे बंदरगाह 2027 तक पूरी तरह चालू हो जाएगा। ऐसा हुआ तो पूर्वोत्तर भारत और म्यांमार के साथ-साथ नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के लिए भी व्यापार के मौके खुल सकते हैं।
हालांकि बांग्लादेश और म्यांमार में हालिया राजनीतिक उथल-पुथल ने इस बंदरगाह को क्षेत्रीय सहयोग के केंद्र के रूप में विकसित करने की राह को मुश्किल कर दिया है। ऐसे में भारत को सित्तवे बंदरगाह से मिलने वाले रणनीतिक और आर्थिक फायदे पाने के लिए तेजी दिखानी होगी। बांग्लादेश के साथ लंबे और टिकाऊ रिश्ते जरूरी हैं। साथ ही म्यांमार में अलग-अलग हिस्सों पर कंट्रोल रखने वाले पक्षों से बातचीत जारी रखनी जरूरी है। भारत सरकार अपने हित सुरक्षित रखने के लिए म्यांमार की सैन्य सरकार और अराकान आर्मी- दोनों से बातचीत कर रही है। सित्तवे बंदरगाह भारत के पूर्वी तट और पूर्वोत्तर के बीच एक वैकल्पिक समुद्री रास्ता देता है।
कैसे जिंदा हो हमारे फायदे के रास्ते
1991 में शुरू की गई लुक ईस्ट पॉलिसी में शुरुआत में पूर्वोत्तर शामिल नहीं था। बाद में यह धीरे-धीरे केंद्र में आया और एक्ट ईस्ट पॉलिसी के साथ और भी अहम बन गया। वॉटर डिप्लोमेसी इस रणनीति का जरूरी हिस्सा बन गई है। ब्रह्मपुत्र, बराक और कालादान जैसी सीमा पार की नदियों का इस्तेमाल कनेक्टिविटी, आर्थिक जुड़ाव और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ रणनीतिक रिश्ते मजबूत करने के लिए किया जा रहा है। इसमें साझा जल संसाधनों को कुछ यूं संभालना भी शामिल है कि पड़ोसियों से सहयोग बढ़े, टकराव कम हो और ऊर्जा व व्यापार के हित सुरक्षित रहें। इससे क्षेत्रीय स्थिरता को भी ताकत मिलती है। इसी वजह से भारत सरकार ने हाल के वर्षों में पूर्वोत्तर के नदी नेटवर्क में बड़ा इन्वेस्टमेंट किया है। मसलन, कोपिली नदी को इंटर स्टेट ट्रांसपोर्ट के लिए चालू किया गया है। पांडु नदी बंदरगाह को डेवलप कर उसे ईस्ट–वेस्ट कॉरिडोर से जोड़ा गया है। ब्रह्मपुत्र के सदिया–धुबरी हिस्से पर माल ढुलाई बढ़ी है। यहां से हर साल करीब छह लाख टन माल पड़ोसी देशों को भेजा जाता है। 
पूर्वोत्तर की नदियां सिर्फ प्राकृतिक संपत्ति नहीं है। वे जीवन रेखाएं और रणनीतिक धमनियां हैं, जो भूगोल को जियो-पॉलिटिक्स से, पहाड़ों को समुद्र से, देशों को गांवों से और छोटे नदी बंदरगाहों को वैश्विक व्यापार मार्गों से जोड़ती हैं। फिर भी इंटर स्टेट ट्रेड को मजबूत करने के लिए साफ रोडमैप जरूरी है। इसके लिए ड्रेजिंग पूरी करनी होगी, तटबंधों की मरम्मत करके इनमें बांध और बैराज बनाने होंगे। लुक ईस्ट पॉलिसी के तहत भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग, मोरेह-तामू-कलेवा रोड, KMTTP, म्यांमार-भारत-बांग्लादेश गैस पाइपलाइन, तमंथी हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट और ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के बारे में भी सोचना होगा। ये दोतरफा और बहुपक्षीय कनेक्टिविटी व बुनियादी ढांचा परियोजनाएं थीं, जो या तो ठप पड़ी हैं या लंबित हैं। एक्ट ईस्ट पॉलिसी की गति का इस्तेमाल कर इन परियोजनाओं को जल्द ठोस नतीजे तक पहुंचाना जरूरी है।
पूर्वोत्तर भारत में बड़ा कारोबारी केंद्र बनने और इंडो-पैसिफिक से और गहराई से जुड़ने की ताकत है। लेकिन इस ताकत को जमीन पर उतारने के लिए भारत को तुरंत यहां के नदी नेटवर्क को दोबारा मजबूत करना होगा, और उसे देश के बाकी हिस्सों से जोड़ना होगा। बांग्लादेश के साथ रिश्तों में बढ़ते तनाव से चिंता है कि वो शायद अब एक्ट ईस्ट नीति का मुख्य आधार न रह जाए, जैसा पहले सोचा गया था। ऐसे में केएमटीटीपी और सित्तवे बंदरगाह को जल्द से जल्द चालू करना जरूरी है, ताकि पूर्वोत्तर को भरोसेमंद समुद्री पहुंच मिल सके। साथ ही भारत को बांग्लादेश और म्यांमार- दोनों के साथ रिश्ते मजबूत करते रहना होगा, ताकि पूर्वोत्तर को बड़े इंडो-पैसिफिक ढांचे में आसानी से जोड़ा जा सके। 

ज्योति भट्टाचार्य सिलचर स्थित असम (केंद्रीय) विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर हैं और भारत की विदेश नीति और पूर्वोत्तर भारत में विशेषज्ञ हैं।
 


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