ढला लाल साया
संदीप कुमार
| 02 Apr 2026 |
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छत्तीसगढ़ के उन घने, आदिम और रहस्यमयी जंगलों के बीच बसा कुतुल गांव, जो कभी माओवादी विद्रोह की 'अघोषित राजधानी' था, आज एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। यहाँ की हवाओं में अब बारूद की उस तीखी गंध के बजाय, आधुनिकता की एक धीमी लेकिन मद्धम दस्तक सुनाई दे रही है। दशकों तक जहाँ बंदूकों की गूंज और दबे पांवों की आहट ही एकमात्र कानून थी, वहाँ अब 'विकास' की एक नई और शायद थोड़ी डरावनी लहर पहुंच रही है। 2026 की पहली तिमाही तक भारत सरकार का यह दावा एक कठोर वास्तविकता में बदल चुका है—दुनिया का सबसे लंबा और खूनी माओवादी विद्रोह अपने अंतिम सूर्यास्त के करीब है। कुतुल की गलियों से लाल झंडे उतर रहे हैं, लेकिन क्या यहाँ 'न्याय का सूरज' उगेगा, यह आज भी एक यक्ष प्रश्न है।
खौफ का वह काला अध्याय
कुतुल के आदिवासियों के लिए माओवादी 'जंगल राज' कोई क्रांतिकारी स्वप्न नहीं, बल्कि एक दमनकारी कारावास था। उन्होंने आदिवासियों को बड़े प्रोजेक्ट्स और बांधों से बचाने के नाम पर अपने जाल में फंसाया, लेकिन वास्तविकता में उन्होंने इस समुदाय को केवल अपना 'मोहरा' बनाया। स्थानीय स्कूल के हेडमास्टर बताते हैं कि कैसे विद्रोहियों ने शिक्षा का गला घोंट दिया था; वे नहीं चाहते थे कि बच्चा पांचवीं कक्षा से आगे पढ़े, क्योंकि पढ़ा-लिखा आदिवासी सवाल पूछता है, और माओवाद केवल 'आदेश' पर पलता है।
इन 'सिद्धांतों' के ठेकेदारों की कंगारू अदालतों ने मौत के फरमान सुनाने में कभी देर नहीं की। वे समानता की बात करते थे, लेकिन उनके शीर्ष कमांडर बाहरी और ऊंची जाति के वे लोग थे, जो स्थानीय आदिवासियों को तुच्छ काम करने और बोरियत भरे कम्युनिस्ट लेक्चर सुनने पर मजबूर करते थे। यह विचारधारा नहीं, बल्कि खौफ का एक ऐसा तंत्र था, जिसने पूरे क्षेत्र की आत्मा को ही कुचल दिया था।
आत्मसमर्पण और 'पुचकार और फटकार' का खेल
राज्य ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए 'पुचकार और फटकार' की नीति को एक कला की तरह अपनाया है। एक तरफ सुरक्षा बलों ने 2024 से अब तक उन 748 लड़ाकों को मिटा दिया है, जो कभी इस जंगल के 'अजेय' सितारे माने जाते थे, तो दूसरी तरफ आत्मसमर्पण करने वालों के लिए सरकारी तिजोरियां खोल दी गई हैं। आज 'कॉमरेड अरब' जैसे खूंखार कमांडर, जिनके हाथ सैकड़ों हत्याओं के रक्त से सने थे, अब पुनर्वास केंद्रों में फूलों वाली कमीज पहनकर माफी मांग रहे हैं।
यह केवल आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक विजय है। जब पूर्व माओवादी अब 'डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड' की वर्दी पहनकर अपने ही पुराने साथियों का शिकार करते हैं, तो माओवाद की 'वैचारिक रीढ़' टूट जाती है। यह एक ऐसा शतरंज का खेल है, जहाँ सरकार ने विद्रोही के अपने ही प्यादों को उसी के खिलाफ वजीर बना दिया है।
विकास बनाम विस्थापन
जैसे ही जंगलों से माओवादियों के पैर उखड़े, विकास की एक तेज और आक्रामक लहर वहां पहुंची है। कुतुल में इंटरनेट, पक्की सड़कें और आधार कार्ड का पहुँचना डिजिटल इंडिया का सपना तो है, लेकिन इस चमक के नीचे एक गहरा भय भी दबा है। आदिवासियों के भीतर यह शंका घर कर गई है कि विद्रोहियों को खदेड़ने का असली एजेंडा क्या है? क्या यह उनकी ज़मीन को 'कॉर्पोरेट खदानों' के लिए साफ करने की एक सोची-समझी साजिश है?
उन्हें डर है कि माओवादियों का 'जंगल राज' खत्म होने के बाद अब उन पर 'खनन राज' थोपा जाएगा। जंगल, जो उनका भगवान था और उनकी पहचान था, अब लोहे के अयस्क और बेशकीमती खनिजों के एक 'कच्चे माल' की तरह देखा जा रहा है। कुतुल की कहानी आज भारत के उस चौराहे की कहानी है, जहाँ एक तरफ डिजिटल इंडिया का भव्य सपना है और दूसरी तरफ अपनी जड़ों को बचाने की एक आखिरी जद्दोजहद। यदि जंगल से माओवाद खत्म होने के बाद वहां केवल जेसीबी मशीनें ही दिखेंगी, तो 'कॉमरेड अरब' जैसे लोग फिर से पैदा होने में देर नहीं लगाएंगे।
क्या यह वाकई अंत है?
गृह मंत्रालय का 31 मार्च 2026 तक का लक्ष्य एक रणनीतिक और राजनीतिक बयानबाजी का मिश्रण है। 800 जिलों में से केवल सात में ही अब माओवाद की अंतिम सांसे चल रही हैं। लेकिन शांति का अर्थ केवल बंदूकों का शांत होना नहीं है। असली चुनौती यह है कि भारत उस आदिवासी विश्वास को कैसे बहाल करे, जो दशकों से राज्य और विद्रोहियों की इस 'क्रॉसफायर' में पिस रहा है। बंदूकें तो शांत हो जाएंगी, लेकिन अगर न्याय और सम्मान की स्थापना नहीं हुई, तो यह शांति एक 'अस्थायी युद्धविराम' से अधिक कुछ नहीं होगी।
कुतुल आज भारत के उस चौराहे पर खड़ा है, जहाँ उसे यह तय करना है कि वह अपनी जड़ों का सम्मान करता है या केवल खनिजों की खुदाई में अपनी समृद्धि देखता है। जंगल राज खत्म हो रहा है, लेकिन न्याय का राज स्थापित होना अभी बाकी है। बस्तर की फिजा बदल रही है, लेकिन उसका हृदय आज भी धड़कते हुए सवालों से भरा है। विकास आना चाहिए, लेकिन वह विकास आदिवासियों की शर्तों पर होना चाहिए, न कि कॉर्पोरेट घरानों की मशीनरी के नीचे। यह बस्तर के पुनर्निर्माण की अंतिम और सबसे कठिन लड़ाई है।