देश की राजनीति में मानसून सत्र के दौरान गर्माहट अपने चरम पर है। दिल्ली विधानसभा से लेकर संसद के दोनों सदनों तक विपक्षी दलों का उग्र प्रदर्शन जारी है। हाल ही में दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी के छह विधायकों को अध्यक्ष के निर्देश पर सदन से बाहर (मार्शल आउट) निकाला गया, जिसके बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक वाकयुद्ध और तीखा हो गया है।
गठबंधन सरकार के भीतर भी नीतिगत मुद्दों और बजटीय आवंटन को लेकर सहयोगी दलों के तेवर तल्ख नजर आ रहे हैं। बिहार और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों को विशेष आर्थिक पैकेज दिए जाने के बाद अन्य राज्यों से भी इसी तरह की मांगें उठने लगी हैं, जिससे केंद्र सरकार पर आर्थिक व राजनीतिक दबाव बढ़ गया है।
विपक्षी खेमा 'एक देश, एक चुनाव' और नए दलबदल विरोधी सुधारों के खिलाफ एकमुश्त होकर रणनीति बना रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार इन सुधारों की आड़ में क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व को समाप्त करना चाहती है और जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को डराने के लिए किया जा रहा है।
वहीं, सत्तारूढ़ दल ने स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' नीति जारी रहेगी और देश में प्रशासनिक पारदर्शिता लाने के लिए कड़े कानूनों का लागू होना अनिवार्य है। आगामी कुछ महीनों में होने वाले प्रमुख राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए सभी दल अपनी पूरी ताकत झोंकने में लगे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद में जारी गतिरोध से विधायी कामकाज प्रभावित हो रहा है। यदि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद का रास्ता नहीं निकला, तो आने वाले दिनों में यह राजनीतिक खींचतान सड़क तक पहुंच सकती है, जिससे देश के नीतिगत फैसले लंबे समय के लिए अटक सकते हैं।