देश की राजधानी दिल्ली में एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा को सेंध लगाने की एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश को नाकाम कर दिया गया है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल क्राइम ब्रांच ने एक बेहद गुप्त और सटीक ऑपरेशन चलाकर 'खालिस्तानी नार्को-टेरर' नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। यह कोई साधारण ड्रग रैकेट नहीं, बल्कि सीमा पार से भारत की संप्रभुता को चुनौती देने वाला एक सुव्यवस्थित तंत्र था। इस नेटवर्क के तार सिर्फ मादक पदार्थों की तस्करी तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि इससे होने वाले मुनाफे का सीधा इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों, विशेषकर खालिस्तानी चरमपंथ को बढ़ावा देने और अवैध हथियारों की खेप जुटाने में किया जा रहा था।
अफीम से बारूद तक: कैसे काम कर रहा था यह सिंडिकेट
जांच में सामने आई कार्यप्रणाली (Modus Operandi) हैरान करने वाली है। यह सिंडिकेट अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के जरिए उच्च श्रेणी की अफीम और अन्य नशीले पदार्थों की तस्करी भारत के विभिन्न राज्यों में करता था। इस काली कमाई को 'हवाला' चैनलों के जरिए विदेशों में बैठे खालिस्तानी आकाओं तक पहुंचाया जाता था। वहीं से विदेशी धरती पर बैठे हैंडलर्स भारत में सक्रिय अपने गुर्गों को अत्याधुनिक हथियार—जैसे ऑटोमैटिक पिस्तौलें और ग्रेनेड—सप्लाई करने के निर्देश देते थे। यानी पंजाब और दिल्ली जैसे राज्यों के युवाओं को पहले नशे की गर्त में धकेला जा रहा था और फिर उसी पैसे से देश की शांति भंग करने के लिए हथियार खरीदे जा रहे थे।
डिजिटल शैडो और डार्क वेब: आधुनिक अपराध की नई चुनौती
क्राइम ब्रांच के अधिकारियों के अनुसार, इस सिंडिकेट के सदस्य तकनीक का बेहद चालाकी से इस्तेमाल कर रहे थे। आपस में संपर्क करने के लिए एनक्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स, डार्क वेब और बर्नर फोन्स का उपयोग किया जाता था। हथियारों की डिलीवरी के लिए 'डेड ड्रॉप' तकनीक (जहां दो लोग सीधे मिले बिना पूर्व-निर्धारित गुप्त जगह पर सामान छोड़ देते हैं) अपनाई जाती थी। हालांकि, दिल्ली पुलिस के साइबर और इंटेलिजेंस विंग ने महीनों तक इस 'डिजिटल शैडो' का पीछा किया और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस व जमीनी मुखबिरों के ताने-बाने को जोड़कर इस पूरे जाल की मुख्य कड़ियों को दबोच लिया।
सरहद पार के आका: आईएसआई और खालिस्तानी सिंडिकेट का गठजोड़
यह भंडाफोड़ एक बार फिर इस कड़वे सच को उजागर करता है कि पड़ोसी देश की खुफिया एजेंसी पाकिस्तान की आईएसआई (ISI) भारत को अस्थिर करने के लिए खालिस्तानी समूहों और ड्रग माफिया के नापाक गठजोड़ को पूरी शह दे रही है। सीमा पार से आने वाले ड्रोन्स के जरिए नशीले पदार्थों और हथियारों की लैंडिंग कराई जा रही है। जब से सुरक्षा बलों ने पारंपरिक आतंकी फंडिंग के रास्तों पर नकेल कसी है, तब से इन भारत-विरोधी ताकतों ने 'नार्को-टेररिज्म' को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। यह नेटवर्क देश के आर्थिक और सामाजिक ढांचे को भीतर से खोखला करने की सोची-समझी साजिश है।
आगामी राह: केवल गिरफ्तारी नहीं, पूरे तंत्र का खात्मा जरूरी
दिल्ली क्राइम ब्रांच की यह सफलता निसंदेह काबिले तारीफ है, लेकिन लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। गिरफ्तार किए गए गुर्गे इस विशाल तंत्र के केवल छोटे प्यादे हो सकते हैं, असली मास्टरमाइंड अभी भी विदेशी सरजमीं पर सुरक्षित बैठे हैं। अब समय आ गया है कि हमारी केंद्रीय जांच एजेंसियां (NIA और ED) अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और इंटरपोल के साथ मिलकर इनकी वित्तीय रीढ़ पर हमला करें। जब तक इस नार्को-टेरर की फंडिंग चेन को पूरी तरह से ध्वस्त नहीं किया जाता और इसके विदेशी अड्डों पर दबाव नहीं बनाया जाता, तब तक यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक निरंतर खतरा बना रहेगा।