दिल्ली-NCR में मानसून का विकराल रूप एक बार फिर देखने को मिला है। तड़के से शुरू हुई मूसलाधार बारिश ने कुछ ही घंटों में देश की राजधानी और उसके आसपास के सैटेलाइट शहरों- नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद को पूरी तरह से थाम दिया। गगनचुंबी इमारतों और हाई-टेक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जाने जाने वाले इस क्षेत्र की सड़कें दरिया में तब्दील हो गईं। सुबह-सुबह दफ्तरों, स्कूलों और अपने गंतव्यों के लिए निकले लोग घंटों तक गाड़ियों के लंबे कतारों में फंसे रहे। जलभराव के इस संकट ने न केवल आम नागरिकों की दैनिक दिनचर्या को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया, बल्कि आधुनिक दिल्ली के शहरी विकास के दावों की भी पोल खोलकर रख दी।
मानसून की इस पहली ही भीषण मार ने दिल्ली की जीवन रेखा माने जाने वाले यातायात नेटवर्क को घुटनों पर ला दिया। मिंटो ब्रिज, आईटीओ, धौला कुआँ, लुटियंस दिल्ली और गुरुग्राम-दिल्ली एक्सप्रेसवे जैसे प्रमुख व्यापारिक और संपर्क मार्ग जलमग्न हो गए। कई जगहों पर जलभराव इतना गहरा था कि सड़कें पानी के नीचे गायब हो गईं और गाड़ियां तैरती हुई नजर आईं। सड़कों पर बंद पड़े वाहनों के कारण कई-कई किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम लग गया, जिससे एम्बुलेंस और अन्य आपातकालीन सेवाएं भी बुरी तरह प्रभावित हुईं। ट्रैफ़िक पुलिस को जगह-जगह मार्ग परिवर्तित करने पड़े, लेकिन हर वैकल्पिक रास्ता भी गाड़ियों के समंदर में डूबता दिखाई दिया।
सड़कों के साथ-साथ आसमान में भी इस बेमौसम आफत का गहरा असर देखने को मिला। इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय (IGI) हवाई अड्डे पर दृश्यता (विजिबिलिटी) बेहद कम हो जाने और तेज तूफानी हवाओं के चलते हवाई यातायात पूरी तरह प्रभावित हुआ। अचानक बिगड़े मौसम के कारण सुरक्षा कारणों से 16 उड़ानों को रद्द करना पड़ा, जबकि 132 से अधिक उड़ानों के परिचालन में भारी देरी हुई। कई उड़ानों को जयपुर, लखनऊ और अहमदाबाद जैसे नजदीकी हवाई अड्डों की ओर डायवर्ट करना पड़ा। टर्मिनल के भीतर हजारों यात्री अपनी उड़ानों की नई समय-सारणी का इंतजार करते नजर आए, जिससे पूरे एयरपोर्ट परिसर में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
यह पहली बार नहीं है जब दिल्ली-NCR को थोड़ी सी बारिश में इस तरह की भयावह स्थिति का सामना करना पड़ा हो। असल में, यह संकट प्राकृतिक आपदा से ज्यादा प्रशासनिक नाकामी और लचर ड्रेनेज सिस्टम का नतीजा है। करोड़ों-अरबों रुपये की लागत से बने नए फ्लाईओवर, अंडरपास और एक्सप्रेसवे थोड़ी सी बारिश झेलने में नाकाम साबित हो रहे हैं। दशकों पुराने और कचरे से पटे पड़े नालों की समय पर गाद (सिल्ट) न निकालना हर साल इस जलभराव का मुख्य कारण बनता है। नगर निगम और स्थानीय प्रशासन के बीच आपसी तालमेल की कमी का खामियाजा हर बार दिल्ली-NCR के टैक्स देने वाले आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है।
हर साल मानसून आने से पहले प्रशासनिक स्तर पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं और कागजों पर मॉक ड्रिल पूरी दिखाई जाती है। लेकिन जैसे ही पहली भारी बारिश होती है, 'स्मार्ट सिटी' के ये तमाम दावे ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। राजधानी का यह हाल केवल जलभराव की समस्या नहीं, बल्कि भविष्य के शहरी नियोजन (अर्बन प्लानिंग) पर एक बड़ा सवालिया निशान है। जब तक कंक्रीट के इस जंगल में ड्रेनेज सिस्टम के आधुनिकीकरण और नालों की नियमित सफाई को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक दिल्ली-NCR के लोग हर बारिश में इसी तरह अपने ही शहर में बंधक बनने को मजबूर रहेंगे।