डिजिटल इंडिया के दौर में जहां इंटरनेट ने शिक्षा और मनोरंजन की राहें आसान की हैं, वहीं सुरक्षा एजेंसियों ने एक बेहद खौफनाक और नई चुनौती को लेकर अलर्ट जारी किया है। भारतीय खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, सीमा पार बैठे देशविरोधी तत्व और विदेशी हैंडलर्स अब भारतीय युवाओं और किशोरों को निशाना बनाने के लिए पारंपरिक तरीकों को छोड़कर सोशल मीडिया और मल्टीप्लेयर ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म्स का सहारा ले रहे हैं। बच्चों की कच्ची उम्र और ऑनलाइन गेमिंग के प्रति उनके आकर्षण का फायदा उठाकर उन्हें अनजाने में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों की ओर धकेला जा रहा है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, यह पूरी साजिश एक सोचे-समझे 'डिजिटल ग्रूमिंग' (Digital Grooming) मॉडल पर काम करती है। सीमा पार बैठे हैंडलर्स सबसे पहले लोकप्रिय ऑनलाइन गेम्स की वॉइस चैट और इन-गेम मैसेजिंग फीचर्स के जरिए किशोरों से दोस्ती गांठते हैं। शुरुआती दौर में उन्हें गेम में फ्री कॉइन्स, वेपन्स और अन्य प्रलोभन दिए जाते हैं। धीरे-धीरे जब बच्चों का भरोसा जीत लिया जाता है, तो बातचीत को एनक्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स जैसे टेलीग्राम या डिस्कॉर्ड पर शिफ्ट कर दिया जाता है। इसके बाद बेहद चालाकी से उनका मानसिक हेरफेर (Brainwashing) शुरू होता है और उन्हें अतिवादी विचारों की ओर मोड़ दिया जाता है।
इस 'डिजिटल रेडिकलाइजेशन' (Digital Radicalization) का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इसमें गेमिंग के तत्वों (Gamification) का इस्तेमाल कर नफरत और हिंसा को सामान्य बनाकर पेश किया जाता है। वर्चुअल दुनिया में टास्क पूरे करने की आड़ में युवाओं से संवेदनशील इलाकों के फोटो खींचने, फर्जी खबरें फैलाने या देश की सुरक्षा व्यवस्था के खिलाफ असामाजिक गतिविधियों में भाग लेने जैसी मांगें की जाती हैं। माता-पिता और अभिभावक अक्सर यह समझते हैं कि उनका बच्चा कमरे में बैठकर सिर्फ एक गेम खेल रहा है, जबकि पर्दे के पीछे विदेशी साजिशकर्ता उसके दिमाग को एक खतरनाक दिशा में ढाल रहे होते हैं।
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने बहुस्तरीय रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। सरकार साइबर इंटेलिजेंस को मजबूत करने के साथ-साथ गेमिंग कंपनियों पर कड़े सुरक्षा नियम लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है, ताकि इन-गेम चैट रूम्स की संदिग्ध गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सके। इसके साथ ही, स्कूल और कॉलेज स्तर पर साइबर अवेयरनेस ड्राइव चलाने की योजना बनाई जा रही है, जिससे छात्रों को इंटरनेट के छिपे हुए खतरों से आगाह किया जा सके और उन्हें किसी अनजान ऑनलाइन दोस्त के बहकावे में आने से रोका जा सके।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से यह चुनौती केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक भी है। साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि इस खतरे से निपटने के लिए केवल कानून या डिजिटल ब्लॉकिंग काफी नहीं होगी, बल्कि माता-पिता को भी अपने बच्चों के ऑनलाइन व्यवहार के प्रति सतर्क रहना होगा। बच्चों के अचानक बदले स्वभाव, स्क्रीन टाइम में अप्रत्याशित बढ़ोतरी या अज्ञात डिजिटल स्रोतों से मिलने वाले उपहारों पर पैनी नजर रखना बेहद जरूरी है। देश के भावी भविष्य को इस अदृश्य डिजिटल जाल से बचाने के लिए सतर्कता, संवाद और सख्त सुरक्षा नीतियों का एकजुट होना समय की सबसे बड़ी मांग है।