आसमान से आफत: भारत में मानसूनी बारिश का बदलता स्वरूप और चुनौतियाँ, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा देश के 26 राज्यों में एक साथ भारी बारिश और आंधी-तूफान का अलर्ट जारी करना केवल एक मौसमी चेतावनी नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि हमारा मौसम चक्र अब एक नए और गंभीर दौर में प्रवेश कर चुका है। दिल्ली-एनसीआर के शहरी कंक्रीट के जंगलों से लेकर उत्तराखंड और हिमाचल की नाज़ुक पहाड़ियों तक, मानसून का यह उग्र रूप पूरे देश को एक साथ प्रभावित कर रहा है। जब देश का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा एक साथ मूसलाधार बारिश की चपेट में आता है, तो यह केवल जलभराव का मुद्दा नहीं रहता, बल्कि हमारी पूरी बुनियादी व्यवस्था और तैयारियों की परीक्षा बन जाता है।
इस बार के मानसूनी पैटर्न का अगर विश्लेषणात्मक अध्ययन करें, तो 'क्लाउड बर्स्ट' (बादल फटने) और अति-तीव्र बारिश (Extreme Rainfall Events) की घटनाओं में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है। इसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन के चलते अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी है। समुद्र से उठने वाली अत्यधिक नमी जब उत्तर भारत के मैदानी इलाकों और हिमालयी हवाओं से टकराती है, तो कम समय में रिकॉर्ड तोड़ बारिश दर्ज की जाती है। यह स्थिति न केवल कृषि के लिए अप्रत्याशित संकट पैदा करती है, बल्कि ग्रामीण और शहरी दोनों अर्थव्यवस्थाओं की गति को अचानक रोक देती है।
हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में यह बारिश विनाशकारी भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ (Flash Floods) का कारण बन रही है। अनियोजित निर्माण कार्य, नदियों के कैचमेंट एरिया में अतिक्रमण और पहाड़ों की अनियंत्रित कटाई ने प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को कमजोर कर दिया है। जब तेज बारिश इन कच्ची ढलानों पर गिरती है, तो पूरे का पूरा पहाड़ धंस जाता है। इससे न केवल सड़कें और पुल बह जाते हैं, बल्कि हजारों जिंदगियां और स्थानीय पर्यटन उद्योग पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है, जिससे उबरने में महीनों लग जाते हैं।
दूसरी ओर, दिल्ली, लखनऊ और पटना जैसे बड़े शहरों में जलभराव की समस्या हमारे अर्बन प्लानिंग (शहरी नियोजन) की पोल खोल देती है। हमारे ड्रेनेज सिस्टम आधुनिक दौर की इस अत्यधिक बारिश को झेलने के लिए डिज़ाइन ही नहीं किए गए हैं। प्राकृतिक नालों के बंद होने और कंक्रीट के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण पानी ज़मीन में रिस नहीं पाता और सड़कों पर सैलाब बनकर तैरने लगता है। नतीजतन, ट्रैफिक जाम, बिजली कटौती और बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे आम नागरिक का जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि कुदरत के इस मिजाज को हम पूरी तरह बदल तो नहीं सकते, लेकिन अपनी आपदा प्रबंधन नीति और बुनियादी ढांचे को मजबूत करके नुकसान को कम जरूर कर सकते हैं। मौसम विभाग के इस 4-दिनों के अलर्ट को केवल एक सूचना न मानकर प्रशासनिक तत्परता और व्यक्तिगत सतर्कता का जरिया बनाना होगा। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बहाल करना, पहाड़ों में सतत विकास की नीति अपनाना और शहरों में 'स्पंज सिटी' जैसी आधुनिक तकनीकों को लागू करना ही अब एकमात्र रास्ता बचा है, ताकि बारिश जीवनदायिनी बनी रहे, आफत न बने।