सूर्यग्रहण: एक इंसानी आविष्कार?

संदीप कुमार

 |  20 Jun 2025 |   182
Culttoday

16 जून 2025 को पेरिस एयर शो में एक ऐतिहासिक उपलब्धि का प्रदर्शन हुआ जब वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में पहला कृत्रिम सूर्यग्रहण उत्पन्न किया। यह उपलब्धि यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के नेतृत्व में चल रहे Proba-3 मिशन की है, जिसकी लागत करीब 210 मिलियन डॉलर है। इसका उद्देश्य सूर्य के बाहरी वायुमंडल यानी कोरोना का अध्ययन करना है, जिसे सामान्य रूप से केवल प्राकृतिक सूर्यग्रहण के दौरान ही देखा जा सकता है।

Proba-3 मिशन दुनिया का पहला ऐसा प्रयास है जिसमें दो उपग्रह 250 मीटर की दूरी पर मिलीमीटर स्तर की सटीकता के साथ एक-दूसरे के साथ समन्वय में उड़ते हैं। यह तकनीक भविष्य में साझा टेलीस्कोप, ग्रहों की खोज और वैज्ञानिक परीक्षणों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है। दो साल की अवधि में यह मिशन लगभग 200 कृत्रिम सूर्यग्रहण उत्पन्न करेगा और 1000 घंटे से अधिक समय तक सूर्य की कोरोना का अवलोकन करेगा। यह परियोजना 14 देशों की 29 कंपनियों के सहयोग से संचालित की जा रही है, जिससे यह एक वैश्विक वैज्ञानिक प्रयास बन गया है।

Proba-3 मिशन में दो छोटे उपग्रह शामिल हैं — ऑक्लटर (Occulter) और कोरोनोग्राफ (Coronagraph)। दोनों की लंबाई लगभग 5 फीट से कम है और इन्हें 5 दिसंबर 2024 को भारत के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च किया गया था। ये उपग्रह एक अत्यधिक दीर्घवृत्ताकार कक्षा में कार्य करते हैं जिसकी ऊंचाई 600 से 60,000 किलोमीटर तक है। ऑक्लटर में एक 1.4 मीटर चौड़ी डिस्क लगी होती है जो सूर्य की रोशनी को रोकती है, जिससे एक छाया बनती है। यह छाया ठीक 150 मीटर पीछे उड़ रहे कोरोनोग्राफ उपग्रह पर पड़ती है, जिसमें ASPIICS नाम का एक विशेष टेलीस्कोप लगा होता है। यह टेलीस्कोप सूर्य के किनारे से सटी हुई आंतरिक कोरोना की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें लेता है।

इन उपग्रहों को एक-दूसरे से 150 मीटर की दूरी पर रहना होता है और वह भी मिलीमीटर स्तर की सटीकता के साथ। यह अंतरिक्ष में एक विशाल “कोरोनोग्राफ” का निर्माण करता है जो प्रकाश के बिखराव को कम कर कोरोना को सूर्य की सतह के अत्यंत पास से देखने में सक्षम बनाता है। उपग्रह अपने कार्य को कक्षा के सबसे ऊंचे बिंदु पर अंजाम देते हैं, जहां गुरुत्वाकर्षण, वायुमंडलीय दबाव और चुंबकीय प्रभाव कम होते हैं। इससे ईंधन की खपत कम होती है और उपग्रह छह घंटे तक स्वतः संचालन कर सकते हैं।

हालांकि यह सुनने में सरल लगता है, लेकिन यह मिशन अत्यधिक जटिल है। दोनों उपग्रहों को हजारों किलोमीटर प्रति घंटे की गति से उड़ते हुए एक-दूसरे के सापेक्ष मात्र 1 मिलीमीटर की सटीकता से अपनी स्थिति बनाए रखनी होती है। उन्हें अंतरिक्ष के विकिरण, तापीय असंतुलन और प्रकाश के विवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसके लिए उपग्रहों में GPS, स्टार ट्रैकर, लेज़र, स्वचालित नियंत्रण प्रणाली और उन्नत प्रोपल्शन तकनीकें लगाई गई हैं।

सूर्य की कोरोना वैज्ञानिकों के लिए अत्यधिक रुचिकर इसलिए है क्योंकि यह 10 लाख गुना अधिक धुंधली होते हुए भी सूर्य की सतह से कई गुना अधिक गर्म (1 से 3 मिलियन डिग्री सेल्सियस) होती है। वैज्ञानिक अब तक नहीं समझ सके हैं कि इतनी दूर होने के बावजूद यह परत इतनी गर्म क्यों है। Proba-3 इस रहस्य को उजागर करने में सहायक होगा। इसके अलावा यह मिशन सौर हवाओं की गति, उनके पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराने और कोरोनल मास इजेक्शन की उत्पत्ति और दिशा के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देगा।

Proba-3 का कृत्रिम सूर्यग्रहण प्राकृतिक सूर्यग्रहण की तुलना में कहीं अधिक समय (लगभग 6 घंटे) तक चलता है, जिससे वैज्ञानिकों को निरंतर और स्पष्ट अवलोकन मिलता है। इसमें लगे DARA और 3DEES जैसे उपकरण सूर्य के विकिरण और पृथ्वी के रेडिएशन बेल्ट का अध्ययन करते हैं। इसकी तस्वीरें कोरोना की बारीक संरचनाओं को दर्शाती हैं और सौर घटनाओं को समझने में नई दिशा प्रदान करती हैं। यह मिशन सौर अनुसंधान के एक नए युग की शुरुआत है जिसका प्रभाव विज्ञान और समाज दोनों पर दूरगामी होगा।

रिया गोयल कल्ट करंट की प्रशिक्षु पत्रकार है। आलेख में व्यक्त विचार उनके
निजी हैं और कल्ट करंट का इससे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।


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