डिजिटल कुरुक्षेत्र में भारत

मनोज कुमार

 |  02 Feb 2026 |   5
Culttoday

युद्ध और तकनीक का संबंध सभ्यता जितना ही पुराना है, लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में यह रिश्ता एक खतरनाक मोड़ पर आ चुका है। कभी तलवारों से लड़े जाने वाले युद्ध बारूद तक पहुँचे, फिर परमाणु हथियारों ने भय का संतुलन रचा। शीत युद्ध के दौर में रणनीतिक स्थिरता ‘आपसी विनाश की गारंटी’ पर टिकी थी। कोई भी पक्ष पहले हमला इसलिए नहीं करता था क्योंकि जवाब में पूर्ण विनाश तय था। पर आज यह संतुलन एक अदृश्य शक्ति से डगमगा रहा है—कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई।।
दुनिया अब त्रिध्रुवीय हथियारों की दौड़ में उलझ चुकी है, जहाँ अमेरिका, चीन और रूस अपनी परमाणु कमान प्रणालियों को मशीनों के हवाले कर रहे हैं। युद्ध अब केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि डेटा सर्वरों और एल्गोरिदम के बादलों में लड़ा जा रहा है। इसी उथल-पुथल के बीच डोनाल्ड ट्रम्प की सत्ता में वापसी ने भू-राजनीति में नई आग भड़का दी है। ‘अमेरिका फर्स्ट’ अब सिर्फ आर्थिक नारा नहीं, बल्कि आक्रामक सैन्य सिद्धांत बन चुका है। भारत जैसे देशों के लिए यह दौर चुनौती भी है और चेतावनी भी।
रणनीतिक स्थिरता का टूटता ढांचा
शीत युद्ध की स्थिरता दो स्तंभों पर खड़ी थी—पहला, किसी को पहले हमला करने का लाभ न होना; दूसरा, हथियारों की दौड़ पर नियंत्रण। लेकिन समय के साथ इन अवधारणाओं की अलग-अलग व्याख्याएँ भ्रम का कारण बनीं। अब जब परमाणु युद्ध की छाया पारंपरिक संघर्षों पर भी मंडराने लगी है और महाशक्तियों के बीच हथियार नियंत्रण पर सहमति लगभग खत्म हो चुकी है, एआई ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।

एआई-संचालित प्रणालियाँ निर्णय की गति को मानवीय क्षमता से कहीं आगे ले जाती हैं। कल्पना कीजिए हाइपरसोनिक मिसाइलों की, जो ध्वनि से कई गुना तेज चलती हैं और रास्ता बदल सकती हैं। ऐसे हथियार दुश्मन को सोचने तक का समय नहीं देंगे। नतीजा—देश पहले वार के लिए मजबूर हो सकते हैं। यही ‘प्रथम प्रर्वतक लाभ’ रणनीतिक स्थिरता का सबसे बड़ा दुश्मन है। अमेरिका एआई से अपनी काउंटरफोर्स रणनीति को और घातक बना रहा है, जबकि चीन और रूस इस असंतुलन को पाटने में जुटे हैं। इससे सुरक्षा दुविधा पैदा होती है—जहाँ एक की सुरक्षा दूसरे की असुरक्षा बन जाती है।
एआई: सुरक्षा कवच या विनाश का ट्रिगर?
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि एआई युद्ध को अधिक नियंत्रित बना सकती है—बेहतर निगरानी, तेज संचार और सटीक खुफिया जानकारी से गलतफहमियाँ कम होंगी। लेकिन यही तकनीक सबसे बड़ा खतरा भी है। एआई डेटा पर निर्भर करती है, और डेटा से छेड़छाड़ संभव है।
अगर किसी साइबर हमले के जरिए एआई सिस्टम को यह यकीन दिला दिया जाए कि दुश्मन ने परमाणु हमला कर दिया है, तो मशीन बिना भावनात्मक विवेक के जवाबी हमला शुरू कर सकती है। इसे ‘सत्यनिष्ठा हमला’ कहा जाता है। इसके अलावा एल्गोरिदम में छिपे पूर्वाग्रह किसी सामान्य सैन्य अभ्यास को भी आक्रामक हमला मान सकते हैं।
गैर-परमाणु हथियार—जैसे साइबर हमले या इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स—जो बिना विस्फोट के दुश्मन की परमाणु संरचना को ठप कर सकते हैं, परमाणु और पारंपरिक युद्ध की रेखा को और धुंधला कर रहे हैं। संकट की घड़ी में गलती की गुंजाइश कई गुना बढ़ चुकी है।
ट्रम्प 2.0: शक्ति का खुला प्रदर्शन
तकनीकी उथल-पुथल के साथ राजनीतिक नेतृत्व भी अधिक आक्रामक हो चुका है। सत्ता में लौटने के बाद ट्रम्प ने संयम छोड़कर शक्ति-प्रदर्शन की नीति अपनाई है। वेनेजुएला में राष्ट्रपति मादुरो का अपहरण, ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी, पश्चिम एशिया और अफ्रीका में सैन्य अभियानों का विस्तार—यह सब दर्शाता है कि अमेरिका अब संप्रभुता की सीमाओं को अपनी सुविधा से परिभाषित कर रहा है।
कराकस से मादुरो को उठाकर ले जाना आधुनिक इतिहास की असाधारण घटना थी। यह मोनरो सिद्धांत की आक्रामक वापसी जैसा था—जहाँ अमेरिका पूरे लैटिन अमेरिका को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता है। ईरान पर हमलों ने भले उसके परमाणु कार्यक्रम को पीछे धकेला हो, लेकिन पूरे क्षेत्र को अस्थिरता की आग में झोंक दिया।
यमन, सीरिया, सोमालिया और नाइजीरिया में अमेरिकी कार्रवाई यह संकेत है कि वाशिंगटन अब दुश्मनों को दुनिया के किसी भी कोने में निशाना बनाने से नहीं हिचकेगा।
भारत के सामने खड़ी रणनीतिक पहेली
इस बदलती दुनिया में भारत का स्थान बेहद संवेदनशील है। एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति होने के नाते भारत इस तकनीकी दौड़ से अलग नहीं रह सकता।
पहली चुनौती है—एआई को अपनी सुरक्षा संरचना में शामिल करना, लेकिन मानवीय नियंत्रण बनाए रखते हुए। चीन की एआई-सक्षम मिसाइलें और ड्रोन भारत के लिए प्रत्यक्ष खतरा हैं। भारत को अपनी चेतावनी प्रणालियों को आधुनिक बनाना होगा, पर निर्णय का अंतिम अधिकार मनुष्य के पास ही रहना चाहिए।
दूसरी चुनौती अमेरिकी आक्रामकता और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन है। अमेरिका के ईरान जैसे देशों पर हमले भारत की ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों को प्रभावित करते हैं। चाबहार जैसे परियोजनाएँ दांव पर लग सकती हैं। भारत को अमेरिका के साथ साझेदारी रखते हुए भी अपनी स्वतंत्र नीति बचानी होगी।
तीसरा खतरा साइबर युद्ध से है—खासकर पाकिस्तान जैसे अस्थिर पड़ोसी से, जो चीन की मदद से एआई-आधारित हमले कर सकता है। भारत को अपनी साइबर और अंतरिक्ष सुरक्षा को अभेद्य बनाना होगा। चौथा और अहम पहलू है—ग्लोबल साउथ का नेतृत्व। युद्धों का सबसे ज्यादा असर विकासशील देशों पर पड़ता है। तेल महंगा होता है, आपूर्ति शृंखलाएँ टूटती हैं। भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एआई के सैन्य उपयोग पर नियम बनाने की पहल करनी होगी।
भविष्य का धुंधलका और भारत की भूमिका
हम एक नए परमाणु युग में प्रवेश कर चुके हैं—जहाँ यूरेनियम के साथ सिलिकॉन भी हथियार बन चुका है। शीत युद्ध की स्थिरता अब इतिहास है। जबकि ट्रम्प का अमेरिका इस अस्थिरता को और तेज कर रहा है। 


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