सिवनी में ग्रामीणों ने खोला परमाणु परियोजना के खिलाफ विरोध का मोर्चा

जलज वर्मा

 |  27 Dec 2024 |   477
Culttoday

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में किंन्दरई गांव में एक और नई परमाणु परियोजना प्रस्तावित किए जाने से ग्रामीणों के बीच आक्रोश पैदा हो गया है। ये अकेली एक परमाणु परियेाजना नही है, इसके साथ ही तीन और जिलों के गांव में भी परमाणु परियोजना न्यूक्लियर पॉवर कारपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा मंजूर की गई है। किंदरई गांव चुटका परमाणु परियोजना से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह परमाणु परियोजना अभी तक शुरू नहीं हो सकी है क्योंकि ग्रामीण इसका भी विरोध बीते पंद्रह वर्षों से कर रहे हैं।

इन परमाणु परियोजनाओं में जमीन अधिग्रहण को लेकर सवाल उठ रहे हैं और पानी के बंटवारे को लेकर भी ग्रामीण आश्वस्त नहीं हैं।

इस परमाणु परियोजना के खिलाफ किन्दरई गांव में आसपास के दो दर्जन से अधिक गांवों के लोगों ने एक बैठक आयोजित की। बैठक में इस परियोजना से प्रभावित होने वाले 26 गांव के ग्रामीणों ने समवेत स्वर में इस परियोजना का विरोध किया है। जिन 26 गांव (पौडी, चरगांव, केदारपुर, धुमामाल, पुटरई,पीपरटोला, छिंदवाहा, बखारी, जामनपानी, किन्दरई,चौरई, बरेली, राजगढ़, धर्मुकोल, पिपरिया, कारीथून, गोकला, रोटो, दलका, कुरोठार, चिनगा, अंडिया, कुसुमी, सुदामपुर, गढी, फुलेरा आदि गांव) के ग्रामीण इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं, उनका कहना है कि हम आगामी 26 जनवरी 2025 को सभी ग्राम पंचायत से इस परियोजना के खिलाफ प्रस्ताव पारित करेंगे।  

ग्रामीणों का कहना है कि पिछले 15 सालों से चुटका परमाणु परियोजना तो शुरू हो नहीं पाई है और सरकार अब हम पर भी यहां से विस्थापित करने की कोशिश में है। ग्रामीणों का कहना है कि हम पिछले चालीस सालों से विस्थापन का दंश झेल रहे हैं। पहले बरगी गांध के कारण मूल गांव से विस्थापित हुए और अब परमाणु परियोजना के कारण विस्थापन। आखिर हम कब तक यूं ही दर-दर की ठोकरे खाते रहेंगे और हमारा कब विस्थापन बंद होगा।

ग्रामीणों का कहना है कि हमारा घंसौर क्षेत्र की नर्मदा पट्टी पूर्व में भी बरगी बांध से विस्थापित एवं प्रभावित हो चुका है। विस्थापन के कारण बड़ी संख्या में लोगों की आर्थिक स्थिति दयनीय है और ग्रामीण रोजगार के लिए बाहर पलायन करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बरगी परियोजना से सिवनी जिले के घंसौर क्षेत्र को कोई लाभ नहीं मिला है। केदारपुर और गोरखपुर क्षेत्र के किसानों द्वारा बरगी जलाशय से सिंचाई के लिए पानी की मांग किया जाता रहा है, परन्तु इन मांगों पर प्रशासन द्वारा आज तक विचार नहीं किया गया है। जबकि दूसरी ओर झाबुआ पावर प्लांट को बरगी बांध से ही पानी दिया जा रहा है और इस पावर प्लांट का राखड़ आसपास के किसानों का खेत खराब कर रहा है।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि प्रस्तावित चुटका परमाणु परियोजना के कारण घंसौर का बड़ा क्षेत्र विकिरण से प्रभावित होने वाला है। अब किन्दरई परमाणु‌ परियोजना प्रस्तावित होने से क्षेत्र में स्वास्थ्य संबंधी गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा। इस क्षेत्र के लोगों का मुख्य धंधा खेतीबाड़ी है। अगर परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण किया जाएगा तो आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के लोग बर्बाद हो जाएंगे।

ध्यान रहे कि घंसौर पांचवीं अनुसूची में वर्गीकृत है, जहां पेसा कानून और नियम लागू है। परन्तु ग्राम सभा को अभी तक किसी भी तरह की जानकारी नहीं देना संवैधानिक प्रावधानों का उल्घंन है। आगामी 26 जनवरी को किन्दरई परमाणु परियोजना के खिलाफ गांव- गांव से प्रस्ताव पारित किया जाएगा। उपस्थित ग्रामीणों ने निर्णय लिया है कि विकास के नाम पर विनाश मंजूर नही करेंगे और परियोजना को निरस्त करवाने के लिए एसडीएम घंसौर और कलेक्टर सिवनी को ज्ञापन दिया दिया जाएगा। ग्रामीणों ने बैठक में यहां तक की चेतावनी दे डाली कि अगर निरस्त की कार्यवाही नहीं की जाती है तो आने वाले समय में उग्र आंदोलन किया जाएगा। ग्रामीणों का विरोध प्रदर्शन क्षेत्रीय जन सुरक्षा समिति किन्दरई के अध्यक्ष डी. पी. गिरियाम के नेतृत्व में किया गया।

यहां यह उल्लेखनीय है कि 42 साल पहले मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास चुटका सहित 54 गांव बरगी बांध के कारण विस्थापित हुए थे। पिछले 17 सालों से इन गांवों पर चुटका परमाणु विद्युत परियोजना से विस्थापित होने की तलवार लटक रही है। अब यह तलवार नए परमाणु परियोजना के लिए प्रस्तावित गांवों पर लटक रही है। आखिर कितनी बार कोई आदिवासी अपने घर-द्वार-जल-जंगल और जमीन छोड़ेगा? 

आदिवासियों की जंग में साथ देने वाले “बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ” के वरिष्ठ कार्यकर्ता राजकुमार सिन्हा ने तो सीधे इन परमाणु परियोजनाओं के निर्माण के औचित्य पर ही सवाल उठाते हैं।

उन्होंने डाउन टू अर्थ को बताया, “मध्य प्रदेश में बिजली की औसत मांग 8 से 9 हजार मेगावाट है तथा रबी फसल की सिंचाई के समय उच्चतम मांग 11 हजार 500 मेगावाट रहती है, जबकि उपलब्धता 18 हजार 364 मेगावाट अर्थात प्रदेश में मांग से ज्यादा बिजली उपलब्ध है। इसके बावजूद नर्मदा नदी पर बने बरगी बांध से विस्थापित चुटका गांव में परमाणु ऊर्जा परियोजना प्रस्तावित की गई है और अब चार और इसी प्रकार की योजनाओं को मंजूरी दे दी गई है।”

ध्यान रहे कि मध्य प्रदेश के चार शहरों में परमाणु ऊर्जा के नए प्रोजेक्ट लगेंगे। परमाणु ऊर्जा के प्रोजेक्ट के लिए 1200 मेगावाट की दो से छह यूनिट प्रस्तावित हैं। इसके लिए न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड ने चार नए न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है। परमाणु ऊर्जा के चार नए प्रोजेक्ट के लिए मध्य प्रदेश के जिन चार शहरों का चयन हुआ है, उनमें शिवपुरी, देवास, नीमच और सिवनी शामिल है।

नीमच के बासी और देवास के बावड़ीखेड़ा, सिवनी के किंदराई और शिवपुरी के खाकरोन गांव में जगह का चयन प्रारंभिक रूप से किया गया है। इन्हीं गांवों में प्रोजेक्ट लगाए जाएंगे। यहां पर 1200 से लेकर 2000 एकड़ तक जमीन अधिग्रहित की जाएगी। 

(यह आलेख डाउन टू अर्थ में पूर्व प्रकाशित है, इसे वहीं से साभार लिया गया है।)


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