दिल्ली स्वास्थ्य क्रय ढाँचे की ढाँचागत विफलता,दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री पंकज कुमार सिंह ने जब 6 सरकारी अस्पतालों में "निम्नस्तरीय" शल्य चिकित्सा सामग्रियों (सर्जिकल सामानों) की आपूर्ति करने वाली कंपनियों पर रिपोर्ट मांगी, तो वह केवल एक मामले की जांच नहीं कर रहे थे। वह उस संरचनात्मक विफलता को उजागर कर रहे थे जो जन-स्वास्थ्य को निरंतर संकट में डाल रही है।
इसकी शुरुआत 2024 में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) द्वारा दर्ज एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) से हुई थी। इसमें 13 कंपनियों पर सरकारी अस्पतालों में पट्टियों (बैंडेज), जालीदार पट्टियों (गॉज़) और शल्य चिकित्सा सामग्रियों की आपूर्ति के लिए सिंडिकेट (कार्टेल) बनाने का आरोप लगाया गया था। आरोप अत्यंत गंभीर था: सूती कपड़े के स्थान पर चीनी प्लास्टिक के तारों का उपयोग करना और मूल्यों को दो से तीन गुना तक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना। दो वर्ष व्यतीत हो जाने के पश्चात भी, मंत्री का कहना है कि इनमें से कुछ कंपनियां अब भी निविदाओं (टेंडरों) में भाग ले रही होंगी।
यही मूल समस्या है। स्वास्थ्य क्षेत्र में भ्रष्टाचार पीड़िताविहीन नहीं होता। यदि कोई पट्टी रक्त या स्राव सोखने में विफल रहती है या शल्य चिकित्सा का धागा समय से पूर्व ही गल जाता है, तो इसका दुष्परिणाम सरकारी अस्पताल के बिस्तर पर पड़े उस रोगी को भुगतना पड़ता है जो सामान्यतः निजी चिकित्सा का व्यय उठाने में असमर्थ होता है।
यहाँ तीन प्रश्न उठते हैं। प्रथम, FIR दर्ज होने के तुरंत बाद इन कंपनियों को काली सूची में (ब्लैकलिस्ट) क्यों नहीं डाला गया? क्रय नियमों (प्रोक्योरमेंट रूल्स) में निष्कासन का प्रावधान है, किंतु इसके लिए सुदृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। द्वितीय, आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के बावजूद भुगतानों को स्वीकृति क्यों दी गई? यह कमज़ोर वित्तीय नियंत्रणों तथा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल के क्रय विभागों के मध्य समन्वय के अभाव (साइलोज़) को रेखांकित करता है। तृतीय, इस पर कार्यवाही हेतु उपराज्यपाल (LG) और मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) तक शिकायत पहुँचने की आवश्यकता क्यों पड़ी? नियमित लेखापरीक्षाओं (आडिट) के माध्यम से ही इसे चिन्हित किया जाना चाहिए था।
दिल्ली का स्वास्थ्य मॉडल मोहल्ला क्लिनिकों और नि:शुल्क उपचार की नींव पर निर्मित है। किंतु यदि गुणवत्ता से समझौता किया जाए तो इस "नि:शुल्क" व्यवस्था का कोई औचित्य नहीं रह जाता। आम जनता का इस व्यवस्था से विश्वास शीघ्र ही उठ जाएगा और वे निजी अस्पतालों की ओर पलायन करने को बाध्य होंगे, जिससे असमानता और अधिक बढ़ेगी।
इसका समाधान तदर्थ (अस्थायी) नहीं हो सकता। दिल्ली को तीन प्रमुख सुधारों की आवश्यकता है: भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करने वाली किसी भी कंपनी का दोषमुक्त होने तक स्वतः निष्कासन; भुगतान से पूर्व प्रत्येक बैच का तीसरे पक्ष (थर्ड-पार्टी) से गुणवत्ता परीक्षण; तथा निविदाओं, आपूर्तिकर्ताओं और परीक्षण रिपोर्टों को दर्शाने वाला एक सार्वजनिक डैशबोर्ड।
मंत्री ने अनुबंधों और स्वीकृतियों से संबंधित विवरण मांगे हैं, जो एक सराहनीय कदम है। किंतु केवल रिपोर्टें जीवन नहीं बचातीं; सुदृढ़ प्रणालियाँ जीवन बचाती हैं। जब तक क्रय प्रक्रिया में स्वच्छता और पारदर्शिता नहीं लाई जाएगी, तब तक अगली "निम्नस्तरीय सामग्री" से संबंधित घपले का सूत्रपात होता रहेगा। tender कक्षों में जन-स्वास्थ्य का सौदा नहीं किया जा सकता।