मद्रास उच्च न्यायालय ने देश की चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी एक महत्वपूर्ण याचिका को खारिज करते हुए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के साथ 100% वीवीपीएटी (VVPAT) पर्चियों की अनिवार्य गिनती कराने के आदेश देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई जा रही मौजूदा औचक (random) 5% वीवीपीएटी सत्यापन प्रणाली पूरी तरह से वैज्ञानिक, सुरक्षित और पर्याप्त है। बिना किसी ठोस सबूत या गड़बड़ी के दावों के पूरी चुनावी प्रक्रिया पर अविश्वास जताना लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मतदाताओं के मन में अपने वोट की शुद्धता को लेकर शत-प्रतिशत विश्वास पैदा करने के लिए सभी वीवीपीएटी पर्चियों की गिनती की जानी चाहिए। उनका दावा था कि केवल 5% वीवीपीएटी पर्चियों की यादृच्छिक गिनती से यह पूरी तरह से साबित नहीं होता कि सभी मशीनों में कोई तकनीकी खराबी या हेरफेर नहीं हुआ है। याचिका में यह मांग की गई थी कि मैन्युअल गिनती को ही अंतिम परिणाम का आधार बनाया जाना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की शंका की गुंजाइश न रहे।
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय पहले ही इस मुद्दे पर विस्तार से सुनवाई कर चुका है और VVPAT पर्चियों की 100% गिनती की याचिका को खारिज कर चुका है। अदालत ने टिप्पणी की कि जब शीर्ष अदालत ने इस विषय पर एक निश्चित कानूनी मिसाल तय कर दी है, तो उच्च न्यायालय उसी मांग पर अलग रुख नहीं अपना सकता। न्यायिक अनुशासन का तकाजा है कि उच्च न्यायालय शीर्ष अदालत के दिशानिर्देशों का पालन करे।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि 100% वीवीपीएटी पर्चियों की गिनती करने से चुनाव परिणामों की घोषणा में कई दिनों की देरी होगी, जिससे प्रशासनिक चुनौतियाँ और मतपत्र युग (Ballot Paper Era) जैसी जटिलताएँ फिर से लौट आएँगी। चुनाव आयोग की वर्तमान व्यवस्था, जिसमें प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के 5 यादृच्छिक पोलिंग बूथों की VVPAT पर्चियों का ईवीएम डेटा से मिलान किया जाता है, अब तक के चुनावों में अत्यधिक सटीक और त्रुटिहीन साबित हुई है।
यह फैसला चुनावी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता को मजबूत करता है और ईवीएम तकनीक पर बार-बार उठाए जाने वाले सवालों पर एक तरह से विराम लगाता है। अदालत के इस सख्त रुख से यह संदेश गया है कि चुनावी सुधारों और पारदर्शिता की मांग स्वागत योग्य है, लेकिन यह ठोस कानूनी तर्कों और तकनीकी प्रमाणों पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल निराधार आशंकाओं पर। इससे आगामी चुनावों के दौरान चुनाव आयोग के सुचारू संचालन में मदद मिलेगी।